Categories
बिखरे मोती

‘यमस्य लोका दध्या बभूविथ’ : राही तू आनंद लोक का

vijender-singh-arya111गतांक से आगे….
नाम अनंत है-तरह तरह के नाम मनुष्य अपने पीछे छोड़ सकता है, दिव्य गुण भी अनंत हैं, इन दिव्य गुणों के कारण मनुष्य जैसा चाहे वैसा ही नाम पीछे छोड़ सकता है। जो इस रहस्य को जान जाता है वह मृत्यु को जीत लेता है।
(2.) आर्तभाग ने फिर अगला प्रश्न किया-हे मुनिश्रेष्ठ! अच्छा यह बताओ जब यह पुरूष मर जाता है, और इसकी वाणी अग्नि में, प्राण वायु में, चक्षु आदित्य में, श्रोत्र दिशाओं में, शरीर पृथ्वी में, शरीरवर्ती आकाश ब्रह्मांड में चल देता है, तब जीव का आधार कुछ नही बच रहता है? रहता भी है या नही, या वह भी समाप्त हो जाता है? यदि रहता है तो वह किस आधार से रहता है? मुनिश्रेष्ठ याज्ञवल्क्य ने चेहरे की सौम्यता और होठों की मुदिता के साथ आर्तभाग को उत्तर दिया-हे महाविद्वान आर्तभाग! मनुष्य का सब कुछ छूट जाने पर भी उसका कर्म नही छूटता, कर्म के सहारे ही जीव टिका रहता है। पुण्य कर्म से जीव पुण्य वाला होता है, पाप कर्म से पाप करने वाला होता है। मनुष्य का कर्म ही प्रधान है। शरीर छूटने पर आत्मा का आधार कर्म ही होता है। इसलिए मनुष्य को जीवन पर्यंत कर्म की पवित्रता पर ध्यान देना चाहिए।
मृत्यु की मृत्यु, होती मोक्ष में।
देख रहा है कोई परोक्ष में।।
अपना, लक्ष्य बना निर्वाण,
रे मत भटकै प्राणी……..(7)
व्याख्या:-महाराज जनक की सभा में आर्तभाग ने पूछा-हे मुनिवर! मृत्यु प्राणीमात्र को अपना अन्न बनाये हुए है, तब मृत्यु से छुटकारा कैसे हो? मृत्यु की मृत्यु क्या है? मृत्यु किसका अन्न हे? अगर मृत्यु की मृत्यु नही तो मोक्ष साधन व्यर्थ है, अगर मृत्यु की मृत्यु हे तो वह क्या है?
आर्तभाग ने याज्ञवल्क्य को इस प्रकार घेरा, तो याज्ञवल्क्य ने कहा, अग्नि सब पदार्थों की मृत्यु है, सभी को भस्म कर देती है परंतु जल उसे भी खा जाता है अर्थात उसे बुझा देता है। उसे अपना अन्न बना लेता है। इसलिए ऐसा मत सोचो कि मृत्यु की मृत्यु नही है। ब्रह्म साक्षात्कार (मोक्ष) ही मृत्यु की मृत्यु है। उसे पा लेने से मृत्यु भी मानो मर जाता है। जो इस रहस्य को जान जाता है, वह मृत्यु को जीत लेता है।
दूसरी पंक्ति की व्याख्या:-
हम पाप तभी करते हैं जब ये समझते हैं कि हमें कोई नही देख रहा किंतु ईशावास्योपनिषद का वचन कितना सार्थक है:-
ओउम ईशावास्योपनिषद सर्व यत्किंचजगत्वां जगत।
तेन व्येक्तेन भुंजीथा मा मृथ: कस्य स्विद्घनम।।
अर्थात जब मनुष्य हृदय से यह मान ले कि सब कुछ उसी का है, वह (परमात्मा) अणु अणु में बसा हुआ सब कुछ देख रहा है तो पाप कर नही सकता। इसलिए उपनिषद का ऋषि कहता है, संसार को भोग की भावना से नही त्याग की भावना से जीओ।
आत्म लोक ही ब्रह्मलोक है।
रहता नही कोई, शोक है।।
करले, आत्मा तू त्राण
रे मत भटकै प्राणी……..(8)
आत्मलोक और ब्रह्मलोक के संदर्भ में जनक का संशय दूर करते हुए याज्ञवल्वक्य ने कहा था-हे सम्राट! जब ब्रह्मï ज्ञानी पुत्रैषणा, वितैषणा और लोकैषणा से ऊपर उठ जाता है। तब उसे पाप नही कर सकते अपितु वह पापों को तर जाता है, इसे पाप नही तपाते अपितु वह पापों को तपा देता है। इस अवस्था में ब्रह्मज्ञानी पाप रहित, मलरहित, संशय रहित हो जाता है। आत्मा में परमात्मा के दर्शन कर लेना ही ब्रह्मलोक को पा लेना है, यह आत्मलोक ही ब्रह्मलोक है।
दूसरी पंक्ति की व्याख्या:-
छान्दोग्य उपनिषद के पृष्ठ 570 पर महर्षि सनत्कुमार अर्थात सदा कुमार रूप रहने वाले ऋषि के पास नारद मुनि पहुंचे और उनसे कहा, भगवन! आप मुझे ज्ञान दीजिए। ऋषि ने कहा-जो कुछ तुम पहले जानते हो वह बतलाओ, तब मैं तुम्हें आगे की शिक्षा दूंगा। नारद ने कहा भगवन ! मैंने चारों वेद इतिहास, पुराण, तर्कशास्त्र, निधिशास्त्र दैव विद्या, नक्षत्र विद्या, ब्रह्मविद्या, धनुर्विद्या, निरूक्त इत्यादि को पढ़ा है। इन सबको पढ़कर मैं मंत्रिवित हुआ हूं आत्मवित नही हुआ हूं मुझे शब्द ज्ञान तो हो गया किंतु आत्मज्ञान नही हुआ। हे भगवन। मैंने आप सरीखे महात्माओं से सुना है-तरति शोकं आत्मवित अर्थात जो आत्मा को जान जाता है वह दुख सागर को तर जाता है।
तीन ऋचाओं का यज्ञ कर।
तीन ही आहुति डाल कर।।
ऐसा, बन जा तू यज्ञ मान
रे मत भटकै प्राणी……..(9)
प्रथम पंक्ति की व्याख्या :-महाराज जनक की सभा में ब्रह्मसूत्रों पर चर्चा चल रही थी, महापंडित अश्वल ने याज्ञवल्क्य से पूछा-हे, याज्ञवल्क्य आज जो यज्ञ होने वाला है, इससे कितनी ऋचाओं से होता यज्ञ करेगा?
याज्ञवल्क्य ने कहा-तीन से वे तीन ऋचाएं कौन सी हैं?
याज्ञवल्क्य ने कहा-वे हैं-पुरानेनुवाक्या, याज्या ती शस्या।
यज्ञ के प्रारंभ में जो ऋचाएं पढ़ी जाती हैं, वे हैं पुरानेनुवाक्या, यज्ञ जिन ऋचाओं से किया जाता है वे हैं, याज्या, यज्ञ समाप्ति पर उसकी प्रसन्नता में जो ऋचाएं पढ़ी जाती हैं वे हैं शस्या।
इस यज्ञ की भांति ही मानव जीवन भी एक यज्ञ है। कार्य प्रारंभ करनते हुए जो संकल्प की घोषणा की जाती है वह मानो पुरोनुवाक्या-ऋचा है। सफलतापूर्व कार्य समाप्ति पर जो प्रसन्नता होती है, वह मानो शास्या ऋचा है। इन तीनों से यज्ञमान को क्या लाभ होता है? जो उठाए हुए कार्य को सफलता पूर्वक पूर्ण करता है, वह सब प्राणियों की वाह-वाह जीत लेता है, विजय श्री को प्राप्त होता है सबकी बधाई का पात्र बनता है। महापंडित अश्वल ने अगला प्रश्न किया-आज जो यज्ञ होने वाला है, इसमें कितनी आहुतियों से अध्वर्य यज्ञ करेगा? याज्ञवल्क्य ने कहा तीन से, वे तीन

क्रमश:

Comment:Cancel reply

Exit mobile version
betpark giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betsilin giriş
betsilin giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
savoycasino giriş
savoycasino giriş
savoycasino giriş
savoycasino giriş
betsilin giriş
betsilin giriş
betsilin giriş
betsilin giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
holiganbet giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betpark giriş
grandpashabet
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
holiganbet güncel giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
holiganbet güncel
holiganbet giriş
bettilt giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
klasbahis giriş
klasbahis giriş
klasbahis
holiganbet güncel
imajbet güncel
bettilt giriş
bettilt giriş
holiganbet güncel giriş
betpark giriş
betpark giriş
bettilt giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
grandpashabet giriş