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लॉकडाउन और बच्चों  की शिक्षा 

रामकुमार विद्यार्थी

कोरोना के कारण हुए लॉक डाउन ने अन्य राज्यों सहित मध्यप्रदेश को भी पलायन की हकीकत से रूबरू करा दिया | दिल्ली , मुंबई , पुणे , भरूच , अहमदाबाद , जयपुर से लेकर दक्षिण के राज्यों तक से जो एक ही तस्वीर सामने आयी वह थी बच्चों के साथ पुरे परिवार के पलायन की तस्वीर | रोजी- रोजगार की चिंता में अपने घरों के लिए सड़क पर पैदल चल पड़े और कितने ही यहाँ वहां फंसे मजदूरों के दर्द से वास्ता रखते हुए हमें इस पलायन के बच्चों की शिक्षा पर पड़े सीधे असर को भी देखना चाहिए | कोई यह गिनती ही करता कि अकेले मप्र से मजदूरी के लिए पलायन करने वालों में कितनी संख्या बच्चों की भी रही है | और यह भी कि परिवार के सभी कमाऊ सदस्यों के गाँव से शहरों में चले जाने के बाद कितने बूढ़े व बच्चे घर पर रह गए | पलायन की एक भयावहता तो यह भी है कि जब सभी व्यस्क घर छोड़कर मजदूरी के लिए निकल पड़ते हैं तब वे अपने पीछे बच्चों को काम पर लगा जाते हैं | या यूँ कहें कि तब घर और पशुओं सहित अपने से छोटे बच्चों की देखभाल के काम में लग जाना इन बच्चों की नियति होती है | मप्र के हजारों गाँवों में परिवार के पलायन के कारण बच्चों को अपने शिक्षा अधिकार से वंचित होना पड़ा है |

पलायन की स्थिति का बच्चों की शिक्षा पर क्या प्रभाव पड़ रहा है इसे समझने के लिए राज्य शिक्षा केंद्र द्वारा मध्यप्रदेश शिक्षा पोर्टल पर दिए वर्ष 2019-20 के ड्राप आउट बच्चों से जुडे आंकड़ों को देखा जाना चाहिए | यह आंकलन कोरोना काल के कुछ माह पहले का ही है | इसमें चौकाने वाली बात यह है कि प्रदेश में 4.5 लाख बच्चे स्कूल से इसलिए ड्राप आउट हैं क्योंकि उनके माता – पिता पलायन कर चुके हैं | यह स्थिति सर्वाधिक रूप से बुंदेलखंड के छतरपुर जिले की है जहाँ 27 हजार 870 बच्चे शिक्षा से दूर हैं | यही चिंताजनक स्थिति इंदौर संभाग में है जहां 1.02 लाख बच्चों के परिवार पलायन कर चुके हैं | अकेले बडवानी जैसे आदिवासी जिले में 26 हजार 238 बच्चे पलायन के कारण शिक्षा से वंचित हुए हैं | ये बच्चे या तो परिवार के साथ पलायन कर गए हैं या परिवार खेती , पशु और घरेलू कामकाज, देखरेख के कारण स्कूल तक नहीं पहुँच रहे हैं | इस तरह गरीबी और प्रदेश में रोजगार की कमी का सीधा असर बच्चों के शिक्षा के अधिकार पर पडा है |

सतत विकास लक्ष्य के सन्दर्भ में केंद्रीय नीति आयोग द्वारा जारी इंडेक्स 2019 रिपोर्ट के अनुसार मप्र में देश की 10 प्रतिशत गरीबी का हिस्सा है जिसका बड़ा असर बच्चों के कामकाज में लगे होने के रूप में दिखाई देता है | प्राथमिक एवं माध्यमिक शिक्षा में प्रदेश के ड्राप आउट बच्चों की संख्या 4.7 प्रतिशत है जिसे 2 प्रतिशत पर लाने की चुनौती है , यह सीधे बालश्रम के प्रतिशत को भी प्रदर्शित करता है | कोरोना से हुए आर्थिक और रोजगार के नुक्सान के कारण बालश्रमिकों की संख्या के और अधिक बढ़ने का अंदेशा भी हो गया है |

वैसे भी बच्चों से मजदूरी कराने के मामले में मध्यप्रदेश देश में 5वें नंबर पर है। इसके साथ ही बालश्रम अधिनियम में वर्ष 2016 में किए गए संशोधन के बाद 14 से 18 वर्ष के बच्चों द्वारा किये जा रहे कृषि मजदूरी सहित कई कामों को गैर खतरनाक कामों में रखा गया है जिससे सीधे तौर पर बच्चे शिक्षा से अनियमित होकर वंचित हिने की कगार पर आते जा रहे हैं | यूँ तो प्रत्येक वर्ष जुलाई अगस्त माह में नामांकन दर 90 प्रतिशत तक हो जाता है लेकिन प्रवेश के बाद बीच में उन बच्चों की नियमित शिक्षा और ठहराव को लेकर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया जाता है और न ही परिवार के पलायन की कोई निगरानी व्यवस्था ही है जिससे तुरंत उसके दुष्प्रभावों को रोका जा सके | इसलिए प्रत्येक बच्चे तक गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की पहुँच हो सके इसके लिए उसका स्कूल में ठहराव होना और उससे जुड़े परिवार के व्यस्क सदस्यों को स्थानीय स्तर पर निरंतर रोजगार उपलब्ध कराना अत्यंत आवश्यक है | भारत सरकार द्वारा अंगीकृत सतत विकास लक्ष्य क्रमांक 01 “शून्य गरीबी” की प्रस्तावना कहती है कि विकासशील देशों में सबसे गरीब परिवारों के बच्चों के पढने की संभावना अमीर परिवारों के बच्चों की तुलना में चार गुना कम है | यह सिर्फ गरीबी का सवाल नहीं है बल्कि ये जीवित रह पाने का सवाल भी है | इसी तरह लक्ष्य क्रमांक 04 समावेशी और समान गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सुनिश्चित करना है जोकि सतत विकास लक्ष्य की बुनियाद कही गयी है | ड्रॉप आउट होने वाला हर बच्चा किसी न किसी तरह के कामकाज में लग जाता है और इस तरह वह बालश्रमिक के रूप में तैयार हो जाता है |

बालश्रम विरोधी अभियान मप्र के राज्य समन्वयक राजीव भार्गव की स्पष्ट मान्यता है कि कोई भी बच्चा जो 18 साल से नीचे है और स्कूल से बाहर है वह बालश्रमिक है | इसलिए इस उम्र का कोई भी बच्चा गरीबी या अन्य बहाने से काम में नहीं लगाया जाना चाहिए | साथ ही टिकाऊ आजीविका के संसाधनों तक परिवार की पहुँच एवं नियमित रोजगार के बिना शिक्षा अधिकार की राह आसान नहीं हो पायेगी |

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