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आओ कुछ जाने

आओ जानें, अपने प्राचीन भारतीय वैज्ञानिकों के बारे में-1

सुश्रुत-ईसा पूर्व छठी शताब्दी में हुए। वैद्यराज धनवंतरी के चरणों में बैठकर चिकित्सा शास्त्र सीखा। आप प्रथम वैद्य थे जो शल्य चिकित्सा में पारंगत थे। पथरी निकालने, टूटी हड्डियों का पता लगाने और जोडऩे, आंखों के मोतिया बिंद के आपरेशन करने में अद्वितीय। रोगी को आपरेशन से पहले शराब पिलाकर बेहोश करने की पद्घति के कारण उन्हें निश्चेतीकरण का जनक भी कहा जाता है। अपनी पुस्तक सुश्रुत संहिता में उन्होंने आप्रेशन के लिए प्रयुक्त 101 उपकरणों का भी जिक्र किया है। उनमें से अनेक आधुनिक काल में प्रयुक्त उपकरणों के समान है।
चरक-ईसा की दूसरी शताब्दी के प्रमुख वैद्य चरक संहिता ग्रंथ के लेखक। ये आयुर्वेद चिकित्सा का एक बेजोड़ ग्रंथ है। ये प्रथम वैद्य थे जिन्होंने पाचन तंत्र, शरीर में पोषक पदार्थों का परिवद्र्घन क्षय तथा शरीर की प्रतिरोधक शक्ति के विषय में जानकारी दी। उनके अनुसार शरीर में तीन दोष उपस्थित होते हैं जिन्हें पित्त कफ तथा वायु कहते हैं उन तीनों के अनुपालिक घट बढ़ से ही शरीर में रोग उत्पन्न होते हैं। उन्हें अनुवांशिक गुण दोषों के विषय में भी पता था तथा उन्होंने शारीरिक संरचना का भी अध्ययन किया था।
चकणाद-सन 600 ईं में हुए। आण्विक सिद्घांत का सर्वप्रथम प्रतिपादन किया। उनके अनुसार प्रत्येक पदार्थ परमाणुओं से निर्मित है जो पदार्थ का सूक्ष्मतम कण होता है, किंतु वह स्वतंत्र अवस्था में नही रह सकता। दो या अधिक सम अथवा भिन्न परमाणु आपस में मिलकर नया पदार्थ बना सकते हैं। उन्होंने परमाणु अथवा संयुक्त परमाणुओं के बीच घटने वाले रासायनिक परिवर्तन तथा ताप द्वारा होने वाले परिवर्तनों के विषय में भी जानकारी दी।
पतंजलि-ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी में हुए। अपनी पुस्तक योगशास्त्र में योग का विविध वर्णन प्रस्तुत किया। उनके अनुसार मानव शरीर में नाडिय़ां तथा चक्र विद्यमान होते हैं जिन्हें सही प्रकार से संयोजित करने पर मनुष्य असीम शक्ति प्राप्त कर सकता है। उनके द्वारा प्रतिपादित अनेक बातें अब विश्व में वैज्ञानिकों द्वारा सिद्घ की जाा रही हैं।
आर्य भट्ट-सन 476 ई. में केरल में पैदा हुए। नालंददा विश्वविद्यालय में विद्याध्ययन किया बाद में इसी विश्वविद्यालय के अध्यक्ष बने। उन्होंने सर्वप्रथम प्रतिपादित किया कि धरती गोल है तथा अपनी धुरी पर घूमती है जिसके कारण दिन व रात होते हैं। यह भी बताया कि चंद्रमा में अपनी रोशनी नही है, वह सूर्य के प्रकाश से ही प्रकाशित है। सूर्य ग्रहण तथा चंद्र ग्रहण का वास्तविक कारण भी इन्होंने बताया। खगोल वैज्ञानिक के साथ साथ ये प्रसिद्घ गणितज्ञ भी थे। इन्होंने (पाई) का मान बताया, साइन की तालिका भी इन्होंने तैयार की
ax-by=c जैसी समीकरणों का हल निकाला जो आज सर्वमान्य है। आर्यभट्टीय नामक पुस्तक की रचना की। जिसमें अनेकों गणितीय तथा खगोलीय गणमानएं हैं जो ज्यामिति, मैंसुरेशन, वर्ग मूल, घनमूल, आदि। आर्य भट्ट सिद्घांत उनकी दूसरी पुस्तक है। भारत के प्रथम उपग्रह को इनका नाम दिया गया। क्रमश:

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