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भारतीय संस्कृति

परोपकार की लक्ष्मण रेखा

जगदीश बत्रा लायलपुरी
जब किसी पर कोई उपकार करता है तो हम उसे देवता कहते है। उसके प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट करते है, उसका अभिनन्दन, पूजा-पाठ, प्रार्थना आदि करते हैं। ऐसे ही देवताओं में एक देवता है जो प्रतिदिन कर्म का संदेश लेकर आते हैं। उनके आते ही सोया हुआ संसार उठ जाता है और उठ कर केवल अपने लिए नहीं बल्कि औरों के लिए चेष्टाशील हो जाता है। वह देवता प्रकाश तथा उष्मा लेकर आता है, जागरण का संदेश लेकर आता है तथा नियमित रुप से बिना किसी भेदभाव से, सबको बिना कुछ बदले की इच्छा से, किरणों का संसार बांटता है। वही देवों का देव महादेव ‘सूर्य’ भगवान है जो केवल अपने लिए जीता है, वह तो दिन में भी सो रहा है। जो अपनी आंखें बन्द रखेगा उसको सूर्य देव संदेश कैसे देंगे। पृथ्वी सूर्य के इस उपकार को नहीं भूलती। वह सूर्य की परिक्रमा नियमित करती है, दिन रात करती है। प्रात:काल का सूर्य बचपन की तरह कितना प्यारा होता है, दोपहर की जवानी की तरह उसका तेज पूर्ण यौवन पर होता है। सायंकाल में वृद्धावस्था की तरह वह शान्त और गम्भीर हो जाता है। उसके निकलने तथा डूबने में समय लाली सी छिटक जाती है, प्रभु के यश के रूप में। उसका अन्त होना उदय होने के लिए है। यही पुर्नजन्म सृष्टि को चला रहा है। जिस तरह लोटा यदि पारस से छू जाये तो सोना बन सकता है तथा साधारण व्यक्ति का सत्संग करे तो सज्जन बन जाता है। उसी प्रकार चन्द्रमा में जबकि अपनी कोई चमक नहीं होती लेकिन वह सूर्य का प्रकाश पाकर खिल उठता है। उसकी चांदनी संसार को शीतलता देती है। चन्द्रमा सूर्य के उपकार से कृतज्ञ होकर पृथ्वी को परिक्रमा करने लगता है। वह जानता है कि यह पृथ्वी सूर्य का ही अंश है। इस रुप में पृथ्वी को सम्मान देना सूर्य को सम्मान देना है। प्रत्येक जीवात्मा परमात्मा का ही अंश है इसीलिए मानव पूजा ही सच्ची ईश्वर पूजा है। इसी से चन्द्रमा पूर्ण मासी को पूर्ण आकार लेता है तथा देवों की तरह पूजा जाता है जिस दिन उसे प्रकाश नहीं मिलता, वह अमावस की रात में भी अंधमार में परीक्रमा जारी रखता है। जिससे फिर प्रकाश पाता है। उसका प्रयत्न परोपकार के लिए है इसलिए निष्फल नहीं जाता। जो दूसरों के भले के लिए कार्य करते हैं वे सदैव लक्ष्य को प्राप्त होते है। चाहे कितनी भी बाधाएं आएं निष्काम कर्म उनका धर्म बन जाता है। सूर्य, चन्द्रमा, पृथ्वी के द्वारा अपने किये गये उपकार को मानव कभी नहीं भूलता। हमारे ऋषि-मुनियों ने आदि काल से काल गणना इन्हीं ग्रहों की चाल में आधार पर की है। सुबह, दोपहर, सांप, रात्रि इन्हीं के प्रताप से होती है। कृष्णपक्ष और शुक्लपक्ष इन्हीं के कर्म का फल है। दिवस, पक्ष, मास, वर्ष, संवत, युग तथा युगान्तरों तक इनका क्रम हमारे जीवन को संचालित करता आया है और करता रहेगा। यही क्रम सृष्टि का संचालन कर रहा है। अग्नि, जल और वायु इनका सहयोग कर रहे हैं। आकाश इनको आशीर्वाद दे रहा है।
इसी कारण भारत का साधारण मनुष्य भी बड़े भक्तिभाव से एकादशी, पूर्णिमा, अमावस्या, सक्रान्ति को आदरपूर्वक व्रत रखता है। त्यौहार मनाता है, उत्सव करता है, कथा-वार्ता, पूजा-पाठ करता है, सूर्य को हर सुबह जल चढ़ाता है। जब वह व्यायाम भी करता है तो सूर्य नमस्कार करना नहीं भूलता। वह अपने सांस लेने में भी सूर्य स्वर तथा चन्द्र स्वर मानता है। वह जानता है, उसका जीवन जो कि एक दिन समाप्त होने वाला है, यौपन भी ढल जाने वाला है। शरीर को बिमारीयां घेर सकती है, वृद्धावस्था आने वाली है। मृत्यु पता नहीं कब आ जाये। इसीलिए परोपकार के आदर्श को सामने को सामने रखकर अपना जीवन औरों के भले के लिए लगा देता है। इसी के बाद देवी देवताओं की सच्ची उपासना मानता है। सूर्य तो हमसे बहुत दूर है लेकिन हमारी पृथ्वी पर गऊ के उपकार हम कभी नहीं भूल सकते, उसकी सेवा में ही सच्चा स्वर्ग है। मरने के बाद स्वर्ग-नरक का तो पता नहीं लेकिन गरीबी के नर्क से छुटकारा तो गो-पालन से ही हो सकता है।
वृक्ष, पौधे, वनस्पति के उपकारों को हम कभी भूल नहीं सकते। ईश्वर ने जो कुछ बनाया है उसका उपयोग होता है। हमें अपने स्वार्थ के लिए उन्हें नष्ट नहीं करना चाहिए। लोकोपकारी प्रकृति की गरिमा के बारे में लिखना तो सूर्य को दीपक दिखाना है। उसके अनुसार आचरण करना सूर्य मणि धारण करना है। स्वाभीमानी, परिश्रमी, संयमी, भेदभाव करने वाले ही सच्चे परोपकारी हो सकते हैं। ”मेरा विश्वास है कि गौ हत्या बन्दी और शराब बन्दी लागू न होने में भ्रष्ट विलासिता की सोच है।”भारत के रिकार्ड से अधिक गेहूं उत्पादन होने के बावजूद पिछले वर्ष 3000टन गेहूं रखरखाव न होने के कारण बरसात में नष्ट हो गया। भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा फल और सब्जी का उत्पादक देश है वर्ष 2010-2011 में सात करोड़ अड़तालीस लाख सत्तर हजार टन फल का उत्पादन तथा चौदह करोड़ पेंसठ लाख चउअन हजार टन सब्जियां उगाई गई। लेकिन पर्याप्त भंडारन न होने तथा किसानों को लागत मूल्य न मिलने और बाजार में महंगे बिकने के कारण चवांलीस हजार करोड़ की बर्बादी हुई। अनाज के बोरे और गोदाम न होने के कारण सड़ता है फिर भी किसान आत्महत्याएं कर रहे हैं उनका कर्जा माफी करना परोपकार नहीं है, हालात सुधारने चाहिए। प्राचीन काल में राजे-महाराजे विवाह हेतु स्वयम्बरों का आयोजन करते थे, आज कम्प्यूटर, मैरिज ब्यूरो ओर समाचार-पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित विज्ञापनों का बढ़ता चलन देखकर ब्राह्मण सभा, पंजाबी सभा, वैश्य सभा, यादव सभा आदि सामाजिक संगठन विवाह योग्य युवक-युवती परिचय सम्मेलन रूपी स्वयंवरों में आयोजन करने लगे हैं। उसमें पंजीकरण शुल्क भी लिया जाता है। आज संयुक्त परिवार टूट रहे हैं। घर में बड़े-बूढ़े मां-बाप की इज्जत नहीं है। युवा पीढ़ी को सही शिक्षा और मार्गदर्शन नहीं मिल रहा उन्हें नौकरी की तलाश में फिरना पड़ता है। समाज में असमानता के बढ़ते कारणों से तथा दिखावे की दुनिया में लड़कियां तीस साल तक कुंवारी बैठी रहती है। इस कारण विवाह का बाजारीकरण हो रहा है। क्यों नहीं सामाजिक संस्थाएं केवल उन लोगों का नि:शुल्क पंजीकरण करती जो व्यक्ति और परिवार मांसाहारी न हो, शराब का सेवन न करते हों तथा मां-बाप का सम्मान करते हों। तभी ये सामाजिक संस्थाएं परोपकार के सच्चे धर्म का संदेश देने में सफल होगी नहीं तो इन आयोजनों का कुछ भी महत्व नहीं रह जायेगा। आज यदि कन्या भ्रूण हत्याएं रोकना चाहते है तो समाज को विधवाओं को सम्मानित जीवन जीने का अवसर देने होंगे। परिवार में बांझ स्त्रियों की इज्जत करनी होगी। जिन लड़कियों के भाई नहीं है, उन्हें योग्य बनाने तथा उच्च नौकरियों में प्राथमिकता देनी होगी।
सामाजिक संस्थाओं में महिलाओं की भागीदारी बढ़ानी होगी तथा उन्हें सम्मानित करना होगा। यह सत्य है कि जिस घर में पति-पत्नी के विचार मिलते हैं और दोनों एक-दूसरे से सन्तुष्ट है तथा सन्तान आज्ञाकारी है उनके लिए इस पृथ्वी पर ही स्वर्ग है। भारत में पूर्वजों की श्रद्धा में श्राद्धपर्व मनाते है और परिवार को चलाने का धर्म पूर्वक यत्न करते हैं वे ब्राह्मण गौ के साथ कुत्ते और कौवे को भी आदर देते हैं। समाज में जो कुछ है वह अनगिनत लोगों का योगदान है। पर वे नहीं भूलते मृत्यु सत्य नहीं है कर्म सत्य है। राम का नाम निष्काम कर्म सत्य है।

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