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आओ कुछ जाने

आओ जानें, अपने प्राचीन भारतीय वैज्ञानिकों के बारे में-2

वाराहमिहिर-उज्जैन के निकट कपित्था नामक ग्राम में 499 ई में पैदा हुए। प्रसिद्घ खगोल शास्त्री तथा गणितज्ञ आर्य भट्ट के संपर्क में आने के कारण खगोल तथा ज्योतिष शास्त्रों में अनुराग पैदा हुआ। शीघ्र ही इन विद्याओं में पारंगत हो गये तथा चंद्र गुप्त विक्रमादित्य के दरबारर में उनके नवरत्नों में शामिमममल हो गये। इन्होंने ही सर्वप्रथम घोषित किया कि पृथ्वी में एक आर्षण शक्ति है जिनके कारण सभी पदार्थ उससे चिपके रहते हैं। इसे ही आज गुरूवाकर्षण के नाम से जानते हैं। उनका वास्तविक नाम मिहिर था। वाराह चंद्रगुप्त द्वारा दी गयी उपाधि थी। उन्होंने कई पुस्तकों की रचना की जिनके नाम हैं-पंचसिद्घांतिका, बृहत संहिता, ब्रहज्जातक आदि जिनमें ज्योतिष का खजाना भरा पड़ा है। सन 587 ई में स्वर्गवास हुआ।
ब्रह्मगुप्त-गुजरात के भिनमाल ग्राम में सन 598 में जन्म हुआ। छापावंश के राजा व्याघ्रमुख के दरबारी ज्योतिष रहे। ये विख्यात ज्योतिषि एवं गणितज्ञ थे। उन्होंने प्रथम बार शून्य के उपयोग करने के नियम प्रतिपादित किये। इनके अनुसार शून्य के साथ किसी भी संख्या को जोडऩे अथवा घटाने से उसका मान अपरिवर्तित रहता है। गुणा करने पर संख्या शून्य, तथा किसी भी संख्या को शून्य से भाग करने प वह असीम हो जाती है। उन्होंने ax+b=0,ax२+bx+c=0 तथा ax२+1=4२ जैसे समीकरणों को हल करने के नियम बताए। वे प्रथम गणितज्ञ थे जिन्होंने बीजगणित को अंक गणित से अलग विषय प्रतिपादित किया। अंकीय विश्लेषण नामक उच्च गणित के ये आविष्कारक थे। इनको महान गणितज्ञ भास्कर द्वारा गणकचूड़ामणि का खिताब दिया गया। इनकी लिखी पुस्तकें ब्रहस्फुट सिद्घांत तथा करण खण्ड खाद्यका अत्यंत प्रसिद्घ है। इनका देहावसान सन 680 ई. में हुआ।
नागार्जुन-गुजरात में सोमनाथ के निकट फोर्ट देहक में सन 931 ई में हुए। अपने समय के प्रसिद्घ रसानयज्ञ थे। इनकी प्रसिद्घ पुस्तक रसरत्नाकर में रजत, स्व्र्ण, टिन तथा ताम्बा जैसी धातुओं के उनके स्रोतों सेस निष्कर्षण, आसवन, द्रवीकरण, ऊध्र्वपातन आदि की विस्तृत व्याख्या की गयी है। इन्होंने अमृत बनाने तथा धातुओं को स्वर्ण में परिवर्तित करने के लिए भी अनेक प्रयोग किये। इनकी पुस्तक में अनेक उपकरणों के चित्र भी दिये गये हैं। एक अन्य पुस्तक उत्तरतंत्र प्रसिद्घ पुस्तक सुश्रुत संहिता की पूरक के रूप में जानी जाती है, जिसमें इन्होंने अनेक दवाईयों को बनाने के प्रयोग लिखे हैं। इनकी अन्य पुस्तकें हें आरोग्य मंजरी कक्ष पुतातंत्र योग सार तथा योग शतक।
भास्कर प्रथम-आप सातवीं शताब्दी के प्रमुख खगोल शास्त्रियों में से एक थे जो ब्रह्मगुप्त के समकालीन थे। भारत का दूसरा उपग्रह उनके नाम पर है।
भास्कर द्वितीय-आप का जन्म बीजापुर कर्नाटक में 1114 ई में हुआ। ब्रहमगुप्त से पे्रेरणा लेकर ये प्रसिद्घ ज्योतिषी तथा गणितज्ञ बने। इनकी प्रसिद्घ पुस्तक सिद्घांत शिरोमणि में एक अध्याय लीलावती नाम से अंकगणित दूसरा अध्याय बीजगणित, गोलाध्याय नाम के अध्याय में गोलको तथाा गृहगणित नाम के अध्याय में सौर मंडल की भीमांसा करता है। बीजगणित के समीकरणों को हल करने के लिए इन्होंने चक्रवाल नाम से एक विधि विकसित की जो यूरोपियन गणितज्ञों द्वारा 600 वर्षों बाद इनवर्स साइकल नाम से विकसित हो गयी है, इनकी पुस्तक में गोलकों के क्षेत्रफल तथा आयतन, त्रिकोणमिति तथा क्रमपरिवर्तन संयोग से संबंधित अनेक समीकरणों का वर्णन है। इन्हें अवकलन गणित का जन्मदाता भी कहा जा सकता है क्योंकि इन्होंने इस विद्या को न्यूटन तथा लिब-निज से कई शताब्दी पूर्व विकसित किया था। आज जिसे (Rolls Theorem) कहा जाता है, इसकी झांकी भी इनकी पुस्तक में है।

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