डॉक्टर अंबेडकर की जयंती पर विशेष : जब डॉक्टर अंबेडकर को कांग्रेस ने जानबूझकर हरवाया था चुनाव

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अत्यंत विषम सामाजिक परिस्थितियों के घेरे को तोड़कर भारतीय राजनीति में अपना महत्वपूर्ण और सम्मानित स्थान बनाना सचमुच डॉक्टर अंबेडकर के ही वश की बात थी । उन परिस्थितियों में उनके स्थान पर यदि कोई और होता तो इस स्थान और सम्मान को प्राप्त नहीं कर सकता था । उनके व्यक्तित्व का यह निराला गुण ही उन्हें भारतीय राजनीति के एक शिखर पुरुष के रूप में स्थापित करता है। इसके उपरांत भी कांग्रेस ने उनके व्यक्तित्व को केवल एक दलित नेता के रूप में स्थापित करने का काम किया । यद्यपि उन्हें राष्ट्रीय और राष्ट्रवादी नेता के रूप में स्थापित करने की आवश्यकता थी , क्योंकि मुस्लिम लीग की हर अनुचित बात का उन्होंने विरोध किया था, देश विभाजन को लेकर भी उनका राष्ट्रवादी सकारात्मक दृष्टिकोण था और पाकिस्तान की संभावित मांग पर भी वह कांग्रेस के दोगले नेताओं की अपेक्षा बहुत अधिक स्पष्ट थे । इसके उपरांत भी कांग्रेस ने एक परिवार की आरती उतारने की अपनी चिर परिचित शैली के कारण डॉक्टर अंबेडकर के साथ अपमानजनक व्यवहार करना ही श्रेयस्कर समझा।
कांग्रेस ने डॉक्टर भीमराव अंबेडकर के नाम पर दलित समाज का बहुत अधिक देर तक शोषण किया और उन्हें अपने ‘वोट बैंक’ के रूप में साथ जोड़े रखा । परंतु जैसे ही सत्य और तथ्य की जानकारी दलित समाज को हुई तो उसने कांग्रेस से अपना नाता तोड़ लिया । अब कॉंग्रेस के राहुल गांधी कभी डॉक्टर भीमराव अंबेडकर के नाम पर अनशन पर बैठते हैं और कभी कोई दूसरा नाटक करते हैं , पर इस सबके उपरांत भी दलित वोट उनके साथ आने को तैयार नहीं है । देश का दलित समाज यह समझ चुका है कि डॉक्टर भीमराव अंबेडकर ने स्वतंत्रता के उपरांत जिस सामाजिक ताने-बाने और जातिविहीन समाज की संकल्पना के आधार पर सामाजिक समरसता स्थापित करने का संकल्प लिया था , उसे कांग्रेस ने ही पूरा नहीं होने दिया । यही कारण रहा कि कांग्रेस ने कभी अपना अध्यक्ष किसी दलित को नहीं बनाया और जगजीवनराम जैसे दलित नेता के भीतर प्रधानमंत्री के सभी गुण होने के उपरांत भी उन्हें उस ओर फटकने तक नहीं किया।
कांग्रेस ने दलितों को सदा यह आभास कराए रखा कि डॉक्टर भीमराव अंबेडकर एक बड़े नेता अवश्य थे , परंतु वह नेहरू की बराबरी के नेता नहीं थे। इसलिए कांग्रेस की दृष्टि में डॉक्टर भीमराव अंबेडकर ‘भारत रत्न’ के भी पात्र नहीं बन पाए। कांग्रेस की दृष्टि में ‘भारत रत्न’ के सभी गुण सबसे अधिक पंडित नेहरू के भीतर थे ,फिर इंदिरा और राजीव के भीतर थे , परंतु डॉक्टर भीमराव अंबेडकर के भीतर ‘भारत रत्न’ का कोई गुण नहीं था। यद्यपि डॉक्टर भीमराव अंबेडकर को ‘भारत रत्न’ देने की मांग 1956 से ही प्रारंभ हो गई थी , परंतु पंडित जवाहरलाल नेहरू ने अपने प्रधानमंत्री रहते हुए और उसके पश्चात इंदिरा गांधी व उनके पुत्र राजीव गांधी ने अपने प्रधानमंत्री रहते हुए कभी यह नहीं सोचा कि डॉक्टर भीमराव अंबेडकर को भी यह सम्मान दे दिया जाए ? इसका कारण केवल एक ही था कि यदि डॉक्टर भीमराव अंबेडकर को यह सम्मान दिया जाता है तो वह अपनी समकालीन राजनीति में पंडित जवाहरलाल नेहरू के बराबर के कद के नेता दिखाई देने लगेंगे जो कि किसी भी दृष्टि से उचित नहीं होगा।
सच यही है कि मर्यादाओं का बांधना बड़ा आसान है, परंतु मर्यादा पथ पर चलना बड़ा कठिन है । संविधान में सामाजिक समरसता की कल्पना कर लेना तो बड़ा आसान है , परंतु सामाजिक समरसता के नाम पर प्रत्येक व्यक्ति को फूलने फलने का और अपनी प्रतिभा के प्रदर्शन का अवसर देना दूसरी बात है। आदर्श कागजों में बंद होकर रह जाते हैं और जब उन्हें व्यावहारिक स्वरूप देने का समय आता है तो लोग आदर्शों पर कड़ा पहरा बैठा देते हैं , फिर बात अपने हित की की जाती हैं। कांग्रेस का इतिहास इसी प्रकार की मानसिकता को प्रकट करने वाला इतिहास है । इस पार्टी ने भीमराव अंबेडकर के साथ अन्याय करते हुए उनकी प्रतिभा और प्रतिष्ठा को दलित नेता के एक संकीर्ण दायरे में कैद किए रखा , परंतु यह सौभाग्य और हर्ष की बात रही कि 1990 में भारतीय जनता पार्टी के सहयोग से जब केंद्र में राष्ट्रीय मोर्चा की सरकार बनी तो अटल बिहारी वाजपेई जी के उदारतापूर्ण प्रयास के चलते डॉ भीमराव अंबेडकर को ‘भारत रत्न’ का सम्मान देने का निर्णय देश की सरकार ने लिया ।
कांग्रेस ने स्वतंत्रता के उपरांत जितने भी स्मारक बनाए वे सब भी गांधी नेहरू और इस परिवार के लोगों के नाम पर ही बनाए । दूसरे लोगों को बहुत कम स्थान दिया गया । डॉक्टर भीमराव अंबेडकर के नाम से भी कांग्रेसी सरकारों ने कभी कोई स्मारक बनाने का निर्णय नहीं लिया । दलित बस्तियों में कहीं गंदी सी जगह पर लोगों ने अंबेडकर की मूर्तियां स्थापित कीं – यह एक अलग बात है । परंतु सरकारी स्तर पर ऐसा कोई निर्णय नहीं लिया गया । डॉक्टर अंबेडकर की मूर्ति बनाकर उसको किसी भी बड़े शहर के किसी पार्क में स्थापित कराने का सम्मान किसी भी महानगर की किसी नगर पालिका या नगर निगम द्वारा भी नहीं लिया गया । यही कारण रहा कि यदि किसी गंदी सी जगह पर डॉक्टर भीमराव अंबेडकर की मूर्ति नजर आ जाए तो लोग समझ लेते हैं कि यह बस्ती दलितों की होगी । बस , डॉक्टर भीमराव अंबेडकर को गंदी सी बस्ती के लोगों का नेता बना देना ही कांग्रेस का लक्ष्य था। आज कांग्रेस यह कहती है कि डॉ आंबेडकर को हमसे भाजपा ने छीन लिया है । ऐसा कहकर कांग्रेस अपने दुर्भाग्य और अपनी करनी पर ही रोती है , जिसे वह कह नहीं सकती । जबकि सच यह है कि डॉक्टर अंबेडकर पहले उसके थे और जब वह उसके थे तो उसने उन्हें क्या दिया था ? – उसे यह स्पष्ट करना चाहिए।
गिले-शिकवे को लोग अक्सर किसी की मृत्यु के पश्चात त्याग देते हैं , परंतु कांग्रेस की सोच में ऐसा भी नहीं है । डॉक्टर अंबेडकर की मृत्यु के पश्चात उनके राष्ट्रीय स्मारक की मांग उठी थी तो उसे भी कांग्रेस ने निर्ममता से त्याग दिया था । हां , भाजपा की सरकार ने उनके जन्म स्थान महू में बाबा साहेब का राष्ट्रीय स्मारक बनवाया। इसके साथ ही नरेन्द्र मोदी देश के पहले प्रधानमंत्री बने जिन्होंने महू जाकर बाबा साहेब को श्रद्धांजलि दी।
कांग्रेस डॉक्टर भीमराव अंबेडकर की प्रतिभा से प्रारंभ से ही आशंकित थी। उसे भय था कि यदि वह एक महानायक के रूप में संसद में स्थापित हो गए तो वह नेहरू से अधिक श्रेष्ठ सिद्ध हो सकते हैं ।अतः बहुत से लोगों का गंभीर आरोप यह भी है कि कांग्रेस ने डॉक्टर भीमराव अंबेडकर को जानबूझकर चुनावों में पराजित करवाया था , जिससे कि वह लोकसभा में पहुंचने न पाएं । जबकि अपने पसंद के मौलाना अबुल कलाम आजाद जैसे नेता को कांग्रेस के नेहरू ने हारने के पश्चात ही विजयी घोषित करवाया था। उदाहरण वह भी है और उदाहरण यह भी है कि जीतते हुए नेता डॉक्टर बी आर अंबेडकर को पंखविहीन कर घर बैठा दिया था। जैसा कि सभी जानते हैं कि 1952 में जब देश में पहले आम चुनाव हुए थे तो उस समय डॉक्टर भीमराव अंबेडकर ने अनुसूचित जाति संघ के टिकट पर उत्तरी मुंबई से चुनाव लड़ा था।तब उन्हें कांग्रेस पार्टी के उम्मीदवार नारायण काजोलोलर ने हराया था। 1954 में भंडारा में हुए लोकसभा उपचुनाव एक बार फिर अम्बेडकर लोकसभा का चुनाव लड़े, लेकिन इस बार भी अम्बेडकर को अपमानजनक ढंग से हरवा दिया गया था ।
आपको यह भी जानकर आश्चर्य होगा कि देश की संसद के केंद्रीय कक्ष में डॉक्टर भीमराव अंबेडकर जी का चित्र लगाने की मांग भी संसद में रह रहकर उठती रही थी । जिसे कांग्रेस सदा यह कहकर ठुकराती रही थी कि केंद्रीय कक्ष में अब किसी अन्य नेता का चित्र लगाने के लिए स्थान उपलब्ध नहीं है। परंतु 1989 में देश के लोगों की इस अपेक्षा को भी लालकृष्ण आडवाणी और अटल बिहारी वाजपेई द्वारा राष्ट्रीय मोर्चा की सरकार के कार्यकाल में पूर्ण करवाया गया था। जब डॉक्टर भीमराव अंबेडकर का चित्र संसद के केंद्रीय कक्ष में स्थापित कराया गया।
अंत में यह बात स्पष्ट करना भी आवश्यक है कि नेहरू के समय से ही कॉन्ग्रेस डॉक्टर अंबेडकर की इतनी उपेक्षा और अपमान क्यों करती आ रही थी ?
इस प्रश्न का उत्तर यह है कि पंडित जवाहरलाल नेहरु जब राष्ट्रविरोधी धारा 370 को संविधान में स्थापित करवा रहे थे , तब डॉक्टर अंबेडकर ही थे जो उनका तीखा विरोध कर रहे थे । उन्होंने इस धारा को न केवल असंवैधानिक बताया था अपितु देश के लिए इसके घातक परिणाम आने की चेतावनी भी पंडित जवाहरलाल नेहरू को दी थी । पंडित जवाहरलाल नेहरू को डॉक्टर अंबेडकर से ऐसे तीखे विरोध की अपेक्षा धारा 370 को लेकर नहीं थी । बस , यही वह दंश था जिसे नेहरू ने अपने कलेजे में छुपा लिया और जब-जब भी डॉक्टर अंबेडकर को सम्मान देने की बात आई तो उन्होंने उन्हें न केवल अपमानित करने की योजनाओं पर काम किया बल्कि उन्हें अपने रास्ते से हटाने का भी हरसंभव प्रयास किया । उसी परम्परा को उनकी बेटी इंदिरा और फिर दोहिते राजीव गांधी ने भी अपने शासनकाल में निरंतर जारी रखा ।
आशा है अब आप समझ गए होंगे कि नेहरू के लिए धारा 370 कितनी प्रिय धारा थी ? जी हां, वही धारा जिसके कारण हमने कश्मीर में अपने लाखों लोगों और सेना व सुरक्षाबलों के जवानों को खोया है । इसके अतिरिक्त बहुत बड़ी धनराशि कश्मीर के आतंकवाद को खत्म करने के लिए खर्च की है । यदि नेहरू दूरदर्शी और समदर्शी राष्ट्रवादी नेता डॉक्टर अंबेडकर की बात को मान लेते तो निश्चय ही इस सारी दुर्भाग्यपूर्ण परिस्थितियों से हम बच सकते थे । आज अपने उसी दूरदर्शी और समदर्शी नेता डॉक्टर भीमराव अंबेडकर की जयंती के अवसर पर हम उन्हें श्रद्धा पूर्ण नमन करते हैं । साथ ही देश के लेखकों व इतिहासकारों से अपेक्षा भी करते हैं कि इतिहास के तथ्यात्मक लेखन में इस सत्य को भी स्थान दिया जाए कि नेहरू अपने द्वारा राष्ट्रविरोधी धारा 370 को संविधान में स्थापित कराने का विरोध करने के कारण डॉ अम्बेडकर से घृणा करते थे।

डॉ राकेश कुमार आर्य
संपादक : उगता भारत

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