शांता कुमार
गतांक से आगे….
वह सामने से हट गया। नरेन्द्र भागकर प्राण बचाने का प्रयत्न करने लगा। अब तक नरेन्द्र काफी दूर निकल गया था। कन्हाई भी अपनी पिस्तौल से बिलकुल तैयार था। नरेन्द्र को भागते देख वह भूखे सिंह की भांति उसकी ओर लपका। नरेन्द्र जोर जोर से चिल्लाता शोर मचाता भाग रहा था। मार दिया….पकड़ो-बचाओ के कोलाहल से जेल प्रतिध्वनित हो उठी। सब लोग भय के मारे कांपने लगे। बेचारे जेलर को बड़ी कठिनाई हुई। उसे अपना भारी भरकम अति मोटा शरीर छिपाना कठिन हो गया थ। वह लकड़ी की एक बड़ी तिपाई के नीचे घुस गया। जेल की खतरे की घंटी जोर से बज उठी। हस्पताल की नर्स आतंकित हो रोने लग पड़ीं। आखिर स्त्रियां जो ठहरीं। चहुं ओर कुहराम मच गया।
कन्हाई पिस्तौल साधे सामने के फाटक पर नरेन्द्र का पीछा करते हुए गया। हाथ में पिस्तौल देख फाटक के पहरेदार ने फाटक ही नही खोल दिया अपितु हाथ के इशारे से बता भी दिया कि नरेन्द्र किधर गया है। तब तक सत्येन्द्र भी उसके साथ आ मिला था। दोनों के पिस्तौलों की दनदनाती गोलियों ने उस द्रोही का शरीर छलनी छलनी कर दिया। वह धरती पर धड़ाम से आ गिरा उन्होंने अपने पैरों की ठोकर मारकर उसके प्रति अपनी शेष क्रोधाग्नि को शांत किया। इस प्रकार साम्राज्यवाद के गढ़ उस जेल में साम्राज्यवाद का वह पिट्ठू सदा की नींद सुला दिया गया।
सारे देश ने विशेषकर बंगाल ने, इस घटना का राष्ट्रीय विजय के रूप में स्वागत किया। अंग्रेजी दैनिक बंगाली के दफ्तर में सुरेन्द्रनाथ बैनर्जी ने मिठाई बांटी। दूसरे दिन सारे समाचार पत्रों में अलीपुर जेल में पिस्तौल की गोलियों की इस गूंज को सारे देश में पहुंचा दिया। कुछ समाचार पत्रों ने उस समाचार का शीर्षक दिया। देश घातकों का अंत।
कन्हाई सचमुच क्रांति युग का कन्हाई निकला। संयोग की बात कि उसका जन्म भी कृष्णाष्टमी की काली अंधेरी रात को हुआ था। उसने अभी बीए की परीक्षा दी थी। पर इन परीक्षाओं से उसे क्या! वह तो महान राष्ट्रीय परीक्षा में एक योद्घा की भांति सफल हो चुका था। यही कारण था कि अपनी सफलता की प्रसन्नता में फांसी से पूर्व इन दोनों का वजन 16पौण्ड बढ़ गया था। उसके बाद वही कहानी दुहराई गयी। वही अदालत, फिर अभियोग, न्याय का उपहास, और फांसी। 10 नवंबर 1908 को कन्हाई को फांसी देना तय हुआ।
कन्हाई फांसी की कोठरी में बंद था। उसका बड़ा भाई मिलने आया। आज की कन्हाई की बीए की परीक्षा का परिणाम निकला था। कन्हाई बड़े अच्छे अंक लेकर पास हुआ था। आंखों से आंसू भरकर बड़े भाई ने यह समाचार कन्हाई को सुनाया। बड़े धैर्य से बोल उठा कन्हाई, उस डिग्री को भी मेरे साथ फांसी पर लटका देना। मां मिलने आई। कन्हाई ने कहला भेजा, यदि मां तुझे मिलते समय आंसू न बहाये, तभी उसे मिलंूगा। पता नही कन्हाई तुम्हें भगवान ने किस देश भक्ति व दृढ़ता के इस्पात से बनाया था?
अंग्रेजी न्यायालय ने इन नर श्रेष्ठों को अपराधी ठहराकर, अपराधियों के कठघरे में खड़ा करके दण्ड विधान की धाराएं उन पर थोपीं। परंतु भारतवासियों ने उन्हें दैवी पुरूष के रूप में पूजा। फांसी के बाद कन्हाई के शब की यात्रा बंगाल के इतिहास में सदा स्मरण रहेगी।
लाखों नर नारियों ने उस शव यात्रा में शामिल होकर अपना अंतिम नमस्कार किया। उसकी चिता की लपटें जब आकाश की ओर बढऩे लगीं तो लोगों ने गीता की प्रतियां चिता में डालीं। लक्षाधिक नर नारियों के हृदय की व्यथा अश्रु बन आंखों में टपक पड़ीं। उसकी चिता की भस्म लेने के लिए छीना झपटी हुई। नवयुवक व नवयुवतियों ने सोने चांदी व हाथी दांत की डिबियों में उस भस्म को घर के पूजास्थानों में सुरक्षित रखा।
कन्हाई की इस अंतिम यात्रा की अपूर्व शोभा अंग्रेजों से देखी न गयी। अत: सत्येन्द्र बसु की फांसी के बाद उसकी लाश को बिना किसी शोभा यात्रा के जेल के अहाते में ही जलाने पर विवश किया गया।
फांसी से दो दिन पूर्व सत्येन्द्र की पत्नी उससे मिलने जेल में आई। दो कलियां, जो अभी पूरी खिल भी न पाई थीं, जिन्होंने सदा एक दूसरे के साथ इकट्ठे रहने की न जाने कितनी उमंगें भरी कल्पनाएं की थीं, आज परस्पर बिछुडऩे जा रही थीं। दो दिन के बाद उसका सुहाग रेशमी डोर से झूलकर सदा के लिए समाप्त हो जाएगा। तब उस हृदय द्रावक मार्मिक समय पर भी कितने उत्साह व धैर्य से सत्येन्द्र ने अपनी पत्नी को ढाढस व संतोष दिया था और वह फिर चला गया वहां, जहां से कभी लौटेगा नही।
राष्ट्रीय अपमान का बदला चुकाना। क्रांतिकारियों का धर्म होता है। इसलिए एक दिन प्रफुल्ल चाकी को पकडऩे का प्रयत्न करने वाले नंदलाल की लाश किसी क्रांतिकारी की गोली का शिकार होकर, कलकत्ता की सड़क पर तड़पने लगी थी। अलीपुर षडयंत्र का सरकारी वकील जान से मार दिया गया। जब हाईकोर्ट में सुनवाई हो रही थी, तब दिन दहाड़े डीएसपी को गोली मार दी गयी। बैनर्जी नामक पुलिस अधिकारी क्रांतिकारियों के विरूद्घ गवाही देने आ रहा था। अदालत पहुंचने से पूर्व ही उसका काम तमाम कर दिया गया। उन दिनों बंगाल सुलगती हुई आग का गढ़ था।
ये कलियां थीं, इनमें कुछ तो अभी अभी खिली थीं। कुछ तो ऐसी भी थीं, जो पूर्णरूप से कली न बन पाई थीं। अभी पुष्प की सुगंध व सौरभ उसमें बंद पड़े थे। उनकी भी उमंगें थीं, हृदय की चाह थी। पर मां की आवाज पर सब न्यौछाबर कर वे आगे बढ़ीं। गुरू गोलवलकर ने एक स्थान पर कहा था, जीवन रूपी पुष्प, यौवन की सुगंध से जब पूर्ण विकसित हो, तभी राष्ट्रदेव के चरणों में चढ़ा देना चाहिए। पर ये वीर तो विकसित होने की प्रतीक्षा भी कर पाए।
उनके शरीर समाप्त कर, अंग्रेजी साम्राज्य हंसा। पर उसे क्या पता कि अमर हो गये हैं। बंगाल की माताओं की लोरियों में साहित्य में कविताओं में, ग्र्र्र्र्रामीणों की किंवदंतियों में उनके त्याग व बलिदान की गाथाएं अमर हो गयीं, जिन्हें आने वाली इतिहास की असंख्य परतें और कुछ लोगों की प्रयत्नपूर्व उपेक्षा भी धूमिल न कर सकेगी।
क्रमश:

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