राष्ट्रवादी पत्रकारिता के आदर्श:श्री वि.स. विनोद

शिवकुमार गोयल
श्री वि.सं. विनोद जी पश्चिमी उत्तर प्रदेश के पत्रकारों के पितामह के रूप में पूरे देश में चर्चित रहे। वे एक ऐसे तेजस्वी, निर्भीक व मिश्नरी पत्रकार थे, जिन्होंने अपनी लेखनी के माध्यम से न केवल स्वस्थ पत्रकारिता के आदर्श उपस्थित किये अपितु राष्ट्र की एकता और अखंडता के लिए समय समय पर आने वाली चुनौतियों पर अलगाववाद पर कड़े प्रहार कर जनमानस में राष्ट्रवाद की भावनाएं जागृत करने में अविस्मरणीय योगदान दिया।
सन 1905 की बसंत पंचमी के पावन दिन बागपत क्षेत्र के दौझा जगानगढ़ गांव में अग्रवाल वंशी लाला गेंदनमल के पुत्र में जन्मे विनोद जी को बालपन में ही आर्य समाज, राष्ट्रवाद तथा स्वदेश भक्ति के संस्कार मिले थे। प्रारंभिक शिक्षा के बाद उन्हें कानपुर में डीएवी कालेज में दाखिला दिलाया गया। उन दिनों प्रताप के संपादक श्री गणेश शंकर विद्यार्थी एक स्वाधीनता सेनानी व तेजस्वी राष्ट्रवादी पत्रकार के रूप में ख्याति अर्जित कर चुके थे। विनोद जी उनके विचारों से प्रभावित हुए।
विद्यार्थी जी से प्रेरणा
एक दिन विद्यार्थी जी के निवास स्थान पर पहुंचकर उनसे कहा मैं मेरठ जिले के ग्रामीण अंचल से कानपुर पढऩे आया हूं। आर्य समाज के राष्ट्रीय जागरण से प्रभावित हूं क्या मैं पत्रकार बनकर राष्ट्रीय जागरण में योगदान कर सकता हूं। विद्यार्थियों ने उन्हें आशीर्वाद देते हुए कहा अपने डीएवी कालेज में होने वाली गतिविधियों का समाचार प्रताप को भेजा करो। ज्यादाा से ज्यादा साहित्य का अध्ययन करो। पत्रकार अवश्य बन सकते हो।
श्री विनोद जी ने डीएवी कालेज के अपने साथी छात्रों के साथ मिलकर हस्तलिखित पत्रिका खुल्लमखुल्ला का प्रकाशन-संपादन शुरू कर दिया। इस पत्र में वे राष्ट्रीयता से ओतप्रोत लेखों के अंश ओजस्वी कविताएं देने लगे। शिक्षा विभाग के अधिकारी ने पत्रिका में प्रकाशित कुछ रचनाओं को आपत्तिजनम बताकर अंग्रेज कलक्टर से इसके विरूद्घ नोटिस भी जारी कराया।
कानपुर से बीए करते समय ही विनोद जी को विद्यार्थी जी ने कांग्रेस के राष्ट्रीय अधिवेशन की रिपोर्टिंग करने की प्रेरणा दी। बाद में तो उन्होंने कराची में हुए कांग्रेस अधिवेशन की भी रिपोर्टिंग की। उनके लिखे समाचारों की कांग्रेस के अनेक वरिष्ठ नेताओं ने प्रशंसा की थी।
कानपुर के कालेज से बीए करने के बाद विनोद जी की दिल्ली से प्रकाशित हिंदुस्तान टाइम्स में रिपोर्टर के रूप में नियुक्त हो गयी। वे जाने माने पत्रकारों श्री देवदास गांधी तथा श्री दुर्गादास के संपर्क में आए। एक वर्ष बाद ही स्वाधीनता की घोषणा होते ही उन्होंने निर्णय लिया कि मेरठ को अपना कार्यक्षेत्र बनाकर कोई स्वतंत्र पत्र निकाला जाए। मेरठ से उन्होंने सण्डे टाइम्स (अंग्रेजी) तथा प्रभात हिंदी नामों से पत्रों का प्रकाशन संपादन शुरू किया।
श्री विनोद जी भारत विभाजन विरोधी अभियान से प्रभावित हुए। हिंदू महासभा के नेता व स्वाधीनता सेनानी वीर सावरकर तथा भाई परमानंद जी आदि ने दिल्ली में अखंड भारत सम्मेलन का आयोजन किया था। विनोद जी उसकी रिपोर्टिंग करने दिल्ली गये। वीर सावरकर तथा भाई परमानंद जी आदि के विचारों से प्रभावित हुए। संडे टाइम्स व प्रभात में उन्हेांने भारत विभाजन कर पाकिस्तान बनाए जाने के षडयंत्र के विरोध में कई लेख लिखे। श्री मदनगोपाल सिंहल, पं. श्यामसुंदर वाजपेयी तथा पं. कालीचरन पौराणिक धर्मसंघ के दैनिक राज्यराज्य का प्रकाशन करते थे। उन्होंने भी कांग्रेस की भारत विभाजन स्वीकार करने की नीति की रामराज्य में धज्जियां उड़ाई। दो सितंबर 1947 को विनोद जी व ंिसघल को आपत्तिजनक सामग्री प्रकाशित करने का आरोप लगाकर जेल भेज दिया गया।
जेल से रिहा होने के बाद विनोद जी ने पंजाब व बंगाल से मारकाट करके भगाए जाने वाले शरणार्थी हिंदुओं की सेवा के कार्य में सक्रिय भाग लिया। हिंदू महासभा, आर्य समाज तथा धर्म संघ की ओर से कई सहायता शिविर स्थापित किये गये।
सन 1950 में पाकिस्तान के बंगांल क्षेत्र में वहां के अल्पसंख्यक हिंदुओं का व्यापक स्तर पर धर्मांतरण तथा उत्पीडऩ किया गया। मेरठ में बंगाल दिवस मनाकर आक्रोश व्यक्त किया गया।
विनोद जी तथा सिंघल जी को उत्तेजना फेेलाने के आरोप में गिरफ्तार करके जेल भेज गया। पं. गजाधर तिवारी वैद्य तथा विश्व प्रकाश दीक्षित बटुक भी जेल में रखे गये।
विनोद जी ने 1955 में संडे टाइम्स में विदेशी ईसाई मिशनरियों की धर्मांतरण जैसी राष्ट्र विरोधी गतिविधियों के विरोध में एक लेख प्रकाशित किया। बाइबिल के कुछ उद्घरण भी उसमें दिये गये थे। ईसाई पादरी ने विनोद जी के विरूद्घ मुकदमा दायर कर दिया। अदालत ने उन्हें सजा सुना दी। हिंदू महासभा के तत्कालीन अध्यक्ष श्री निर्मलचंद्र चटर्जी (लोकसभा के पूर्व अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी के पिताश्री) देश के जाने माने वकील थे। वे स्वयं विनोद जी की पैरवी करने मेरठ आए। श्री धर्मवीर प्रेमी एडवोकेट विनोद जी की पहले ही पैरवी की थी। श्री चटर्जी के अकाट्य तर्कों का न्यायालय ने सम्मान करते हुए विनोद जी को आरोप मुक्त कर दिया।
गोआ सत्याग्रह में
गोआ पर पुर्तगालियों का कब्जा चला आ रहा था। गोआ की मुक्ति के लिए 1954 में सत्याग्रह आंदोलन चलाया गया। महाराष्ट्र की सर्वदलीय गोवा मुक्ति समिति के तत्वाधान में सभी दलों के नेताओं व कार्यकर्ताओं ने देश भर से गोवा पहुंचकर सत्याग्रह किया। मेरठ हिंदू महासभा ने श्री गजाधर तिवारी वैद्य तथा श्री विनोद जी के नेतृत्व में सत्याग्रही जत्था गोवा भेजा। इस जत्थे में हिंदू के संपादक महावीर प्रसाद शशि देवी दयाल सेन तथा रामनिवास गोयल भी थे।
श्री विनोद जी तथा अन्य सभी सत्याग्रही मुंबई पहुंचकर अपने प्रेरणास्रोत वीर सावरकर जी से आशीर्वाद लेने उनके निवास स्थान पर पहुंचे। सावरकर जी ने कहा आप तो क्रांति भूमि मेरठ के निवासी हैं। आपको हाथों में शस्त्र लेकर पुर्तगालियों को खदेडऩे के लिए गोवा जाना चाहिए था। खाली हाथों उन साम्राज्यवादियों की गोलियों से प्राण देने से क्या होगा। कुछ क्षण रूक कर उन्होंने कहा-आप लोगों का उद्देश्य पवित्र है। अपने राष्ट्र के भूभाग को विदेशी दासता से मुक्त कराना। मेरा आशीर्वाद तो साथ है ही।
15 अगस्त 1954 के पावन स्वाधीनता दिवस पर सत्याग्रहियों ने गोवा की सीमा में प्रवेश किया। श्री बसंतराव ओक तथा श्री चितले के नेतृत्व में जैसे ही सैकड़ों सत्याग्रही आगे बढ़े कि पुर्तगाली सैनिकों ने अंधाधुंध गोलियां बरसानी शुरू कर दीं। उज्जैन के आरएसएस के स्वयंसेवक राजाभाऊ महाकाल, सरदार करनैल सिंह तथा मधुकर चौधरी के सीनों को गोलियों से बेध डाला। तीनों शहीद हो गये।
श्री गजाधर तिवारी वैद्य जी की जांघ में गोलियां गलीं थीं। वे भी जमीन पर गिर पड़े। सनसनाती हुई गोली से श्री विनोद जी तथा शशि जी बाल बाल बचे गये। सभी घायलों को बेलगांव के अस्पताल में दाखिल कराया गया। स्वस्थ होने पर लगभग एक माह बाद सितंबर में श्री तिवारी जी विनोद जी आदि मेरठ लौटे तो हजारों व्यक्तियों ने उनका स्वागत किया।
श्री मदन गोपाल सिंघल, रतन कुमार प्रेमी, आदि ने माल्यार्पण कर इन स्वाधीनता सेनानियों का भव्य स्वागत किया।
पत्नी सुवीरा जी भी अग्रणी
श्री विसं विनोद जी तथा उनकी धर्म पत्नी श्रीमति सुवीरा विनोद आर्य समाज के प्रति निष्ठावान थे। आर्यसमाज शताब्दी समारोह के कानपुर अधिवेशन में श्री प्रकाशवीर शास्त्री तथा अन्य आर्य नेताअेां ने श्री विनोद जी का अभिनंदन किया।
सन 1966 में दिल्ली में हुए गोरक्षा सत्याग्रह में श्रीमति सुवीरा विनोद ने महिलाओं के जत्थे का नेतृत्व करते हुए सत्याग्रह कर जेल यातनाएं सहन की थीं। श्रीविनोद जी एक सिद्घांत निष्ठ व मिश्नरी पत्रकार थे। दैनिक प्रभात के माध्यम से उन्होंने समाज सुधार व राष्ट्रीय भावनाएं पनपाने में योगदान किया। मुझे व बंधुवर जय प्रकाश भारतीय आदि को विनोद जी के चरणों में बैठकर पत्रकारिता का प्रशिक्षण लेने का सौभागय मिला। प्रभात की गणना पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सर्वाधिक लोकप्रिय दैनिक अखबारों में थी। श्री लालबहादुर शास्त्री श्री अलगूराय शास्त्री, प्रकाशवीर शास्त्री, सर्वोदयी नेता मास्टर सुंदर बाल जी, प्रो. राम सिंह, रामशरण विद्याथी, आचार्य क्षेमचंद सुमन, विश्वभंर सहाय प्रेमी आदि श्री विनोद जी की राष्ट्रभक्ति व स्वदेशी निष्ठा के सदैव कायल रहे। मेरे पिता जी भक्त रामशरण दास के वे अनन्य मित्र थे।
श्री विनोद जी के दोनों पुत्र प्रमोद कुमार विनोद भी अनेक वर्षों तक पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय रहे।
श्री विनोद जी के लिखे संपादकीय लेख अत्यंत तथ्यपूर्ण होते थे। वे सरकार की राष्ट्रहित के प्रति ढुलमुल नीति पर प्रहार करने से नही चूकते थे।
वोटों व सत्ता के लिए तुष्टिकरण की नीति को वे राष्ट्रघाती मानते थे। उनका स्पष्ट मत था कि अलगाववाद को किसी भी कीमत पर सहन नही किया जाना चाहिए। राष्ट्र को प्राथमिकता के आधार पर सैन्यशक्ति से संपन्न किया जाना चाहिए। राजनीति को अपराधियों भ्रष्टाचारियों से मुक्त रखकर ही राष्ट्र का सर्वांगीण विकास संभव है। श्री विनोद जी का 31 दिसंबर 1987 को निधन हो गया। उनके अभाव की पूर्ति आज तक नही हो पाई है और न भविष्य में हो सकेगी।`

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