शक्कर की मिठास में कड़वाहट

सतीश सिंह
मिठास में कड़वाहट घोलने की तैयारी लगभग पूरी हो चुकी है। उत्पाद शुल्क फिलहाल तो नहीं बढ़ाया गया है, लेकिन महज इसकी चर्चा मात्र से बीते सप्ताह में इसके वायदा भाव में 2.5 प्रतिशत और हाजिर भाव में 1 प्रतिशत का इजाफा हुआ है। तत्पश्चात उत्तर प्रदेश में शक्कर का भाव (मिल कीमत) तकरीबन 1 प्रतिशत बढ़कर 3200-3275 रुपये प्रति किवंटल हो गया, वहीं महाराष्ट्र में यह कीमत 3100-3150 रुपये और दिल्ली में 3400-3450 रुपये किवंटल हो गया है। जानकारों का मानना है कि जल्द ही इसकी कीमत में 3 प्रतिशत की और भी बढ़ोतरी हो सकती है। उल्लेखनीय है कि हाल ही में केंद्रीय कृषि मंत्री शरद पवार ने शक्कर पर उत्पाद शुल्क को 71 पैसे बढ़ाकर 1.5 रुपये प्रति किलो करने के खाध मंत्रालय के प्रस्ताव का समर्थन किया था विश्लेषको का यह भी कहना है कि शक्कर की कीमत में बढ़ोतरी का अंदेशा पहले से ही था, क्योंकि किसी भी जिंस की कीमत को उत्पादन लागत से कम नहीं रखा जा सकता है। ध्यातव्य है कि मौजूदा समय में शक्कर की कीमत इसके लागत भाव से कम है। वैसे शक्कर की कीमत में उबाल आने का कारण सिर्फ शक्कर पर उत्पाद शुल्क की बढ़ोतरी को नहीं माना जा सकता है। इसके मूल में शक्कर उधोग के नियंत्रण मुक्त होने की संभावना का प्रबल होना है। माना जा रहा है कि सरकार बहुत ही जल्द शक्कर उधोग को नियंत्रण मुक्त करने वाली है। गौरतलब है कि वर्ष, 2010 में भी कृषि मंत्री श्री शरद पवार प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह के समक्ष शक्कर उधोग को विनियंत्रित करने की योजना को प्रस्तुत कर चुके हैं। इसके बरअक्स दिलचस्प तथ्य यह है कि विगत 15 सालों से इस योजना को अमलीजामा पहनाने के लिए कवायद की जा रही है। फिर भी नतीजा सिफर है। जानकारों के मुताबिक इस योजना को मूत्र्त रुप नहीं देने के पीछे शक्कर की कीमत में होने वाला उतार-चढ़ाव, आयात-निर्यात में व्याप्त असंतुलन, प्रर्याप्त भंडारण की कमी आदि को महत्वपूर्ण कारण माना जा सकता है। इस संदर्भ में ध्यान देने योग्य बात है कि प्रधानमंत्री के आर्थिक सलाहकार परिषद (पीएमईएसी) के अध्यक्ष सी रंगराजन की अगुआई वाली समिति ने पिछले साल ही शक्कर से जुड़े हुए दो तरह के नियंत्रण, मसलन-निर्गम प्रणाली और लेवी शक्कर को अविलंब समाप्त करने की सिफारिश की थी। इतना ही नहीं, इस समिति ने शक्कर उधोग पर आरोपित अन्यान्य नियंत्रणों को भी क्रमश: समाप्त करने की बात कही थी। बावजूद इसके इस मामले में अग्रतर कार्रवाई करने में सरकार फिसी रही। खाध मंत्री के वी थामस की मानें तो इस बार विनियंत्रण का मुद्दा टलेगा नहीं। सरकार की कोशिश है कि आगामी एक-दो पखवाड़े के अंदर 80000 करोड़ रुपये के शक्कर उधोग को नियंत्रण मुक्त करने के बाबत कोई निर्णायक फैसला ले लिया जाए। श्री थामस द्वारा दिये गये हालिया बयान में कहा गया है कि सी रंगराजन समिति की सिफारिशों का हाल अन्य समितियों की मानिंद नहीं होगा, क्योंकि शक्कर के विनियंत्रण के संबंध में दो सबसे बड़े उत्पादक राज्य उत्तरप्रदेश और महाराष्ट्र को छोड़कर अन्य 10 राज्यों ने अपने मंतव्य से केंद्रीय सरकार को अवगत करा दिया है। अब इस दिशा में तीव्रतर कार्रवाई करने का रास्ता साफ है।
श्री पवार का कहना है कि शक्कर क्षेत्र को विनियंत्रित करने से किसानों को लाभ होगा। वे अपनी मर्जी से सबसे अधिक कीमत देने वाले शक्कर मिल मालिक को अपना गन्ना बेच सकेंगे। श्री पवार का यह भी कहना है कि विनियंत्रण के बावजूद सरकार गन्ना के लिए एफआरपी तय करना जारी रखेगी। एफआरपी उस न्यूनतम मूल्य को कहते हैं जो किसानों को शक्कर के मिल मालिकों के द्वारा गन्ने की कीमत के रुप में अदा की जाती है। इस फ्रंट पर शक्कर उधोग से जुड़े हुए पूँजीपति भी सरकार के साथ खड़े हैं। शक्कर उधोग के विनियंत्रण के लिए व्यापक स्तर पर लाबीइंग भी की जा रही है। शक्कर उधोग के पेड विश्लेषको का कहना है कि शक्कर उधोग में विनियंत्रण लाकर गन्ना के उत्पादन में स्थिरता लाई जा सकेगी, जबकि सच ठीक इसके उलट है। भारत में गन्ना या किसी भी दूसरे फसल का उत्पादन मानसून पर निर्भर करता है। दूसरे परिप्रेक्ष्य में इसे देखें तो विगत वर्षों में किसानों के मन में पनपने वाली निराशा के भाव ने भी गन्ना के उत्पादन को प्रभावित करने में अपनी महती भूमिका निभाई है। दरअसल, गन्ना किसानों को बीते सालों में गन्ना की फसल से उनका लागत भी नहीं निकल सका है। कम या अल्प उत्पादन के साथ-साथ आमतौर पर बिचौलियों और कृत्रिम बाजार के दो पाट में पिसकर किसान आत्महत्या करने पर मजबूर हो जाते हैं। गन्ने का अच्छा उत्पादन हो या कम दोनों स्थितियों में किसानों को व्यापारियों और शक्कर मिल मालिकों की मर्जी से ही गन्ने की कीमत मिलती है। बीते दिनों इस वजह से महाराष्ट्र और उत्तरप्रदेश के कुछ गन्ना किसानों ने मौत को भी गले लगा लिया था। जाहिर है वर्तमान परिवेष में गन्ना किसानों के पास गन्ना बोने से तौबा करने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं है। इसलिए यह कहना कि शक्कर के क्षेत्र को विनियंत्रित करने से गन्ना के उत्पादन में स्थिरता आयेगी, पूर्णरुपेण गलत संकल्पना है। फिलहाल शक्कर उधोग पूरी तरह से सरकार के नियंत्रण में है। उत्पादन से लेकर वितरण तक सरकार का इसपर नियंत्रण है। मूलत: दो तरीके से इस पर नियंत्रण रखा जाता है। निर्गम प्रणाली के अंतर्गत सरकार शक्कर का कोटा तय करती है, जिसे खुले बाजार में बेचा जाता है। लेवी प्रणाली के तहत सरकार शक्कर मिलों के उत्पादन का 10 प्रतिशत हिस्सा राशन दुकानों को उपलब्ध करवाती है। वर्तमान में सरकार 20 रुपये प्रति किलो की दर से शक्कर मिलों से खरीदकर राशनकार्ड धारकों को 13.50 रुपये प्रति किलो की दर से बेचती है। यदि शक्कर क्षेत्र को विनियंत्रित किया जाता है तो गन्ने की कटाई के मौसम यानि अक्टूबर से सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत खुले बाजार से शक्कर खरीदकर सरकारी राशन की दुकानों को बेचा जाएगा। वर्तमान में सरकार हर महीने मिलों के लिए खुली बिक्री और लेवी शक्कर के लिए कोटे की घोषणा करती है। इस आलोक में खुले बाजार में शक्कर बेचने के लिए कोटा व्यवस्था को समाप्त करने का प्रस्ताव है। रंगराजन समिति ने भी कहा है कि शक्कर मिलों को खुले बाजार में शक्कर बेचने की स्वतंत्रता दी जाए। साथ ही, एक स्थिर आयात-निर्यात नीति का भी निर्धारण किया जाए। समिति का मानना है कि इस संबंध में जिंस वायदा बाजार के समुचित विकास को भी प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए। वर्ष, 2010 का एफसीआरए संशोधन विधेयक भी वायदा बाजार आयोग (एफएमसी) को वित्तीय स्वायत्तता और संस्थागत निवेशकों को बाजार में कारोबार करने की सहूलियत देने की वकालत करता है।
अर्थशास्त्र के सिंद्धात के अनुसार मांग और आपूर्ति के बीच होने वाले उतार-चढ़ाव के द्वारा बाजार की दशा और दिशा को आकार मिलता है। यदि मांग ज्यादा और आपूर्ति कम हो तो जिस की कीमत अधिक होती है, जिसे विक्रेता का बाजार कहते हैं। इसी तरह जब आपूर्ति अधिक होती है तथा मांग कम तो जिस की कीमत कम होती है, जिसे हम क्रेता का बाजार कहते हैं। अर्थशास्त्र के इस स्थापित सिंद्धात को भी अक्सर व्यापारी अपने फायदे के लिए बदल देते हैं। इस खेल का सबसे बड़ा हथियार कालाबाजारी को माना जा सकता है। शक्कर के मामले में भी इसी खेल को खेला जाता रहा है। इस कारण शक्कर का बाजार अक्सर असंतुलित हो जाता है। अभी जब शक्कर पर सरकार का नियंत्रण है, तब डायन मँहगाई की आग से मिठास में कड़वाहट आ गया है। ऐसे में शक्कर क्षेत्र के विनियंत्रण के बाद हमारी जिह्वा से मिठास का लोप होना लाजिमी है।

Comment:

betpark giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
holiganbet güncel giriş
holiganbet güncel
holiganbet giriş
bettilt giriş
betpark giriş
klasbahis giriş
klasbahis giriş
holiganbet güncel
imajbet güncel
holiganbet güncel giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
bettilt giriş
betpark giriş
casinolevant giriş
casinolevant giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betyap güncel
betpark giriş
betpark giriş
betyap giriş
betpark giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
vaycasino giriş
bettilt giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
casinolevant giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpuan giriş
betpuan giriş
matbet giriş
matbet giriş
betpuan giriş
betpuan giriş
matbet giriş
matbet giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
holiganbet giriş