आर्य समाज स्थापना दिवस पर : आर्य समाज ही ईश्वर प्रदत्त ज्ञान चार वेदों का प्रतिनिधि और प्रचारक है

ओ३म्

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आर्यसमाज की स्थापना वेदों के महान विद्वान ऋषि दयानन्द सरस्वती जी ने 10 अप्रैल, 1875 को मुम्बई में की थी। ऋषि दयानन्द के माध्यम से ही देश के अधिकांश लोगों को इस तथ्य का ज्ञान हुआ कि वेदों का ज्ञान सृष्टि के आरम्भ में ईश्वर से प्राप्त हुआ। वेदों में मनुष्य जीवन को सर्वांगीण रूप से जीने का पूरी योजना व विधान निहित है। वेद मार्ग पर चलकर ही मनुष्य सद्ज्ञान को प्राप्त होता है तथा उसे जीवन के सभी लक्ष्यों की प्राप्ति भी होती है। वेद से ही ईश्वर का सत्य स्वरूप विदित होता है। आत्मा और प्रकृति का सत्यस्वरूप भी हमें वेदों से ही प्राप्त होता है। ईश्वर, जीवात्मा और आत्मा के स्वरूप पर वेदों से अनभिज्ञ कोई मनुष्य वा धर्माचार्य यथावत प्रकाश डाल नहीं सकता। इसका कारण यह है कि मनुष्यों की उत्पत्ति से पूर्व परमात्मा सृष्टि को रच चुका था। परमात्मा ने सृष्टि क्यों, किसके लिये, किस पदार्थ से बनाई, उस परमात्मा को ज्ञान व शक्ति कहां से प्राप्त हुई आदि अनेक प्रश्नों का समाधान भी वेद एवं वेदों पर आधारित ऋषियों के ग्रन्थों यथा दर्शन, मनुस्मृति, उपनिषद आदि से होता है। वेद का ज्ञान ईश्वर ने किन मनुष्यों वा ऋषियों को दिया था, इसका समाधान भी ऋषि दयानन्द ने अपने सद्विद्या के विश्व विख्यात ग्रन्थ ‘सत्यार्थप्रकाश’ तथा ‘ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका’ में किया है। वेदों में किन विषयों का वर्णन है और उनकी संक्षिप्त व्याख्या भी ऋषि दयानन्द जी ने ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका ग्रन्थ के वेदोत्पत्ति प्रकरण में की है। ऋषि दयानन्द ने एक नया तथ्य यह उद्घाटित किया है कि वेद ईश्वर का नित्य ज्ञान है। वह अनादि काल से अनादि व नित्य ईश्वर में निहित है व सदैव रहता है। उसमें न्यूनाधिक नहीं होता। ज्ञान का न्यूनाधिक उस चेतन सत्ता में होता है जिसमें न्यूनता व त्रुटि होती है। ऐसी सत्ता जीवात्मा की है। ईश्वर अनादि, नित्य, अजर, अमर, अविनाशी, अनन्त व सर्वज्ञ है। अतः उसके ज्ञान में कभी न्यूनाधिक नहीं होता। ईश्वर ने वेदों का ज्ञान चार ऋषियों को किस पद्धति से दिया था, इसका प्रकाश भी ऋषि दयानन्द जी ने सत्यार्थप्रकाश में किया है। इतना महत्वपूर्ण ग्रन्थ मनुष्यों के लिये संसार में दूसरा कोई नहीं है। अतः संसार के लोगों को परमात्मा की प्राप्ति, उसकी कृपा व आशीर्वाद ग्रहण करने के लिये वेदों का अध्ययन कर उसके बताये मार्ग से ही ईश्वर की शरण में आना में चाहिये।

आर्यसमाज की स्थापना परमात्मा के नित्य व अमर ज्ञान के देश देशान्तर में प्रचार व प्रसार के लिये की गई थी। जिन दिनों आर्यसमाज स्थापित किया गया था उन दिनों हमारा देश अंग्रेजों का पराधीन था। अंग्रेज देश को लूट रहे थे और देश के देशभक्तों पर नानाविध अत्याचार करते थे। वेद सहित धर्म व संस्कृति को नष्ट करने के प्रयत्न भी किये जा रहे थे। विदेशों से ईसाई पादरी भारत में आकर छल, बल व प्रलोभन आदि से ग्रामीण व दूर-दराज के क्षेत्रों यथा नागालैण्ड, मिजोरम, गोवा सहित देश के सभी भागों में जाकर निर्धन, अपढ़ लोगों का धर्मान्तरण करते थे। इनको बचाना अत्यावयक था। देश में सर्वत्र अज्ञान व अन्धविश्वासों सहित फलित ज्योतिष के मिथ्या ज्ञान का प्रचार व प्रसार था। ईश्वर के सत्यस्वरूप को भूलकर उसकी पाषाण की मूर्ति बनाकर बौद्ध व जैनियों की देखा देखी पूजा अर्चना की जाती थी। इन सबसे मनुष्य आध्यात्म के फलों व लाभों की प्राप्ति में असफल हो रहे थे। देश इन अन्धविश्वासों से कमजोर व विखण्डित हो रहा था।

समाज में प्रचलित जन्मना जातिवाद ने भी देश को जातियों में विभाजित कर अत्यन्त कमजोर किया था। बड़ी जातियों के लोग छोटी कही व मानी जाने वाली जातियों पर अत्याचार करते थे। डा. भीमराव अम्बेडकर जी जैसे प्रतिभाशाली व्यक्ति के साथ भी अनेक प्रकार के अत्याचार व उत्पीड़न धर्म व जातिवाद के नाम पर लोगों ने किये। समाज में सतीप्रथा भी प्रचलित थी जिसमें पति की मृत्यु होने पर पत्नी को जीवित जला दिया जाता था। हमने लगभग तीस वर्ष पूर्व अपने जीवन में ही देखा कि राजस्थान में एक विवाहित अबोध युवती रूपकंवर के पति की मृत्यु होने पर समाज व उसके पति के परिवार ने उसको उसकी इच्छा के विरुद्ध जीवित जला दिया गया था। बाल विवाह भी पूरे देश में प्रचलित थे जिसमें अल्पायु में ही विवाह कर दिये जाते थे जिसका कुप्रभाव बच्चों की शिक्षा व जीवन उन्नति पर विपरीत रूप में पड़ता था। समाज में बेमेल विवाह होते थे। विधवा विवाह की बात तो कोई सोच भी नहीं सकता था। बाल व अन्य विधवाओं का जीवन नरक से भी अधिक दुःखजन्य था।

छुआछूत इस कदर था कि काशी के उच्च कोटि के विद्वान पंडित नीलकण्ठ शास्त्री ने इसी कारण वैदिक सनातन धर्म का त्याग कर ईसाई मत ग्रहण कर लिया था। हमारी स्त्रियां व शूद्र बन्धु वेद पढ़ना तो दूर वेद के मन्त्रों व शब्दों को सुन भी नहीं सकते थे। यदि सुन भी लें तो उनके कान में गर्म रांगा पिघलाकर डालने का विधान किया गया था। वेदमन्त्र बोलने पर जिह्वा काट देने की मिथ्या परम्परायें थी। ऐसी कुप्रथायें व अन्धविश्वास प्रचलित थे कि यदि कोई किसी ईसाई या मुसलमान के हाथ का लगा हुआ पानी अनजाने में भी पी ले तो वह धर्म से च्युत कर दिया जाता था। ज्ञान व विज्ञान की दृष्टि से देश पिछड़ा हुआ था। किसी को इसका विचार ही नहीं आता था कि सबको पढ़ने का अवसर दिया जाये जिससे देश में ज्ञान व विज्ञान की उन्नति हो। इन सब बुराईयों का अन्त ऋषि दयानन्द ने अपने वैदिक ज्ञान के आधार पर किया और समाज के लोगों को बताया कि यह सब बातें वेद विरुद्ध एवं अग्राह्य हैं। वेद पढ़ने का मानव मात्र को अधिकार है। स्त्रियां और शूद्र वेद पढ़ सकते हैं। वह पण्डित व पण्डिता बन कर बड़े बड़े यज्ञों के ब्रह््मा भी बन सकते हैं।

ऋषि दयानन्द ने अपने समय में जन्मना जाति का विरोध कर गुण, कर्म व स्वभाव पर आधारित वैदिक वर्ण व्यवस्था की वकालत की थी। ऋषि दयानन्द ने वेद व मनुस्मृति आदि अनेक ग्रन्थों के उदाहरण देकर वेद को शीर्ष आसन पर प्रतिष्ठित किया और बताया कि संसार में जितने भी मत प्रचलित हैं वह सब विष के समान अविद्या से युक्त हैं। इनका त्याग कर वैदिक धर्म का ग्रहण करना ही संसार के सभी लोगों के लिये श्रेयस्कर है। देश की आजादी के लिये भी ऋषि ने सत्यार्थप्रकाश में प्रेरणा की और डिण्डिम घोष कर कहा ‘कोई कितना ही करे किन्तु जो स्वदेशी राज्य होता है वह सर्वोपरि उत्तम होता है। अथवा मत-मतान्तर के आग्रह रहित, अपने और पराये का पक्षपातशून्य, प्रजा पर पिता माता के समान कृपा, न्याय और दया के साथ विदेशियों (अंग्रेजांे व मुसलमानों) का राज्य भी पूर्ण सुखदायक नहीं है।’ ऋषि के इन वाक्यों से प्रेरणा लेकर ही देश में सहस्रों लोगों ने देश की आजादी के आन्दोलन में भाग लिया और अपने जीवन व प्राणों का उत्सर्ग किया। प्रमुख ऋषिभक्तों में स्वामी श्रद्धानन्द, लाला लाजपतराय, भाई परमानन्द, पं. राम प्रसाद बिस्मिल, भगत सिंह आदि का नाम लिया जा सकता है।

देश से मूर्तिपूजा, फलित ज्योतिष, अवतारवाद तथा मृतक श्राद्ध आदि को दूर करने में भी आर्यसमाज का महनीय योगदान है। कोई ऐसा अन्धविश्वास नहीं जिसका ऋषि दयानन्द ने अपने जीवन में उपदेशों द्वारा तथा सत्यार्थप्रकाश के ग्यारहवें समुल्लास में प्रमाण पुरस्सर खण्डन न किया हो। आधुनिक भारत के निर्माण में सबसे अधिक योगदान यदि किसी का है तो वह ऋषि दयानन्द और उनके अनुयायी स्वामी श्रद्धानन्द, पं. लेखराम, पं. गुरुदत्त विद्यार्थी, महात्मा हंसराज, स्वामी दर्शनानन्द सरस्वती आदि का है। ऋषि के भक्तों ने ही डी.ए.वी. एवं गुरुकुल शिक्षा आन्दोलन के द्वारा देश से अज्ञान मिटाने सहित अन्धविश्वासों को दूर करने में महत्वपूर्ण योगदान किया है।

आज आर्यसमाज का 145वा स्थापना दिवस है। हम अपने सभी आर्यसमाज के मित्रों को इस अवसर पर शुभकामनायें एवं बधाई देते हैं। ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि वह समाज से जुड़े सभी विद्वानों व नेताओं को संगठित होने की प्रेरणा करें। आर्यसमाज के सभी लोग अपनी महत्वाकांक्षाओं का त्याग कर मन, वचन व कर्म से आर्यसमाज को एक संगठित एवं बलशाली संस्था बनाने में सहयोग करें। सब मिलकर ऋषि दयानन्द के स्वप्नों को साकार करने के लिये त्याग व बलिदान की भावना से युक्त होकर पूरे देश में वेदों के जागरण का अभियान चलायें और ‘कृण्वन्तो विश्वमार्यम्’ करने में सफल हों। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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