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धर्म-अध्यात्म

मृत्यु : लोग कहेंगे कि हमारा हवाई जहाज ‘गुजर गया’

सुबुद्धपाठक वृंद ! मैंने अपने पिछले लेख में लिखा था कि मनुष्य ब्रह्म और काया को देख नहीं पाता। आज इससे आगे की चर्चा करता हूँ कि क्यों नहीं विमोचन या देख पाता ?

हमें ध्यान रखना चाहिए कि शरीर में छिपे हुए चेतन एवं विभु दिखाई नहीं देते। लेकिन चेतन चेतना करता रहता है अर्थात् चेतावनी देता रहता है ,परंतु विषय भोगों में फंसकर मनुष्य चेतावनी को अर्थात चेतन की चेतना को अनसुनी कर देता है , उपेक्षा कर देता है। अब प्रश्न आता है कि विषय भोगों में मन क्यों लगा रहता है ? पर विचार करते हैं तो पता चलता है कि विषय भोगों में मन इसलिए लगा रहता है कि मृत्यु याद ही नहीं आती।

यहीं पर दूसरा प्रसन्न हो सकता है कि मनुष्य छल कपट आदि क्यों करता है ?

इसका उत्तर यही है कि अज्ञानतावश परमात्मा को सर्वव्यापक नहीं समझता अर्थात ईश्वर सभी जगह विद्यमान हैं, सर्वत्र उपस्थित है, इसमें नासमझी कर देता है। इसलिए पाप करता है। अगर यह समझ ले कि ईश्वर यहां भी उपस्थित है , वहां भी उपस्थित है और सभी जगह उपस्थित है अर्थात वह सब जगह मुझे देख रहा है तो पाप कर ही नहीं सकता, पाप हो ही नहीं सकता।

अब अपनी मूल समस्या की ओर चलते हैं । किसी मनुष्य की मृत्यु हो जाए तो लोग कहते हैं कि ‘वह’ चला गया । अब प्रश्न यह है कि चला कौन गया और कहां चला गया , क्यों चला गया ?

वास्तव में उत्पत्ति एवं नाश है ही नहीं ,यह केवल प्रतीति मात्र है यह केवल भ्रांति मात्र है । यह ऐसा हमको होता हुआ केवल दिखाई पड़ता है। इसी प्रकार जन्म मृत्यु दोनों ही प्रतीति अर्थात भ्रांति मात्र हैं।

जल में आपने तरंग उठती हुई देखी , वह तरंग कुछ समय तक जल में बनी रहती है ,और हमको दिखाई देती रहती है ,लेकिन किनारे की तरफ पहुंचते-पहुंचते समाप्त हो जाती है । जल फिर शांत हो जाता है और जल जल ही रह जाता है।

एक और उदाहरण से इस बात को और समझा जा सकता है । आपके पास सोना है । सोना को आप सुनार के पास लेकर जाते हैं । सुनार से कहते हैं कि इसमें से अबकी बार कंठी बना दे। फिर कुछ समय बाद कहते हैं कंठी तोड़कर माला या मोहर बना दे ।अब देखिए सोना तो सोना है कुछ समय के लिए कंठी में और कुछ समय के लिए मोहर् में अर्थात कंठी के शरीर में मोहर के शरीर में आपको दिखाई पड़ रहा था , लेकिन सोना तो सोना ही था। सुनार के पास गया तो सुनार ने उसे नए-नए सांचों में ढालकर नया – नया स्वरूप अर्थात नया- नया शरीर दे दिया। यहां सुनार ईश्वर है जो भिन्न-भिन्न रूप में हमारे शरीरों को बना रहा है। जिसके साथ बना रहा , वह केवल जीव है। जो अमर है , अनादि है ,अचल है।

अपनी इसी बात को स्पष्ट करने के लिए हम एक और उदाहरण ले सकते हैं । मिट्टी को लीजिये । मिट्टी को कुम्हार लाता है और उसमें से नाना प्रकार के बर्तन बना देता है – घड़ा, नाद ,सकोरा आदि- आदि । जब मिट्टी से बर्तन बना वह बर्तन एक दिन फूट जाता है तो फिर मिट्टी मिट्टी में मिल जाती है अर्थात वह तो कुछ समय के लिए घड़े में और कुछ दिन के लिए सकोरा में दिखाई पड़ रही थी। शक्ल में, आकृति में थी। अब कुछ भी नहीं रहा ।यथार्थ था कि जो मिट्टी थी मिट्टी ही रह गई।

इसीलिए कहा गया :–

माटी कहे कुम्हार से तू क्या रौंदे मोय ।

एक दिन ऐसा आएगा मैं रो दूंगी तोय ।।

चौथा एक उदाहरण और लेते हैं । मान लीजिए एक ट्यूबवेल चलता होता है । पानी की हौज बनी होती है। पानी उसमें पाइप से आता है ।हौज से बाहर जाता है। पानी में अनेकों बुलबुला बनते हैं । कुछ दूर तक पानी में बहते हुए बुलबुलों की आकृति हमें दिखाई देती है पर कुछ क्षणों पश्चात वे बुलबुले स्वयं ही मिट जाते हैं। इन बुलबुलों को देखकर भी कभी की लेखनी से यथार्थ कुछ इस प्रकार फूट पड़ा :–

पानी कैसा बुदबुदा अस मानस की जात।

देखत ही छुप जाएंगे जो तारे प्रभात।।

इससे स्पष्ट होता है की उत्पत्ति अर्थात पैदा होना या मृत्यु हो जाना और स्थिति यानि शरीर यह तो मात्र प्रतीति होती है। जैसा देह में उत्पत्ति, स्थिति, विनाश प्रतीत होता है , किंतु वास्तव में ऐसा है नहीं।

अब यहां भी प्रश्न पैदा होता है कि ऐसा क्यों होता है ?

क्योंकि जीवात्मा का नाश कभी नहीं होता। क्योंकि आत्मा अमर है। यदि आत्मा सत ना होता तो असत भान पड़ता और असत की तीन काल में प्रतीति नहीं होती , किंतु आत्मा था ,आत्मा है, और आत्मा रहेगा। यह इसलिए तीन काल में प्रतीति उसकी होती रहती है। हम यूं भी कह सकते हैं कि आत्मा सत है और आत्म चित अर्थात चेतन है । क्योंकि यदि आत्मा चेतन न होता और जड़ होता तो जड़ आदि शरीर को कैसे जान सकता, किंतु जानता है ,इसलिए आत्मा चेतन है । आत्मा स्वभाव से जिज्ञासु है , वह अनेकों प्रश्न खड़े करता है और उनके उत्तर खोजता है । उसकी यह जिज्ञासा इसलिए है कि वह बड़ा बनना चाहता है , और बड़ा बनकर वह आनंद को प्राप्त कर लेना चाहता है । यदि ऐसा न होता तो उसे सुषुप्ति और समाधि में आनंदानुभूति न होती। किंतु उसे ऐसे आनंद की अनुभूति होती है ।

चारों ओर ,एक ही शोर है कि ‘मैं हूं’, ‘मैं ये कर दूंगा’ , ‘मैं ऐसानहीं होने दूंगा’। लेकिन ऐसा कहने वाला भी यह नहीं जानता कि ‘मैं’ हूं कौन,? अब कोई कहता है ये मेरा हाथ है , यह मेरा सिर है , मेरा पैर है । इससे पता चलता है कि ना हाथ मैं हूं , ना पैर मैं हूं , ना सिर मैं हूं ,अर्थात मैं तो कोई और ही है, वह मैं जो है यह वही जीवात्मा है जो अंदर बैठी हुई यह कह रही है कि यह मेरा सिर है , यह मेरे हाथ हैं । इस जन्म में मेरा नाम अमुक है, मुझे इस नाम से जाना जाता है, अर्थात इस शरीर में को जीवात्मा आई है , इस शरीर की पहचान अमुक नाम से है।

इस देह स्थूल में नाम रूप , जाति ,संबंध आदि में अहम भाव न इस देह का जो प्रकाशक अर्थात प्रकाश करने वाला या ज्ञाता अर्थात इसको जानने वाला जो साक्षी रूप में अंदर बैठा है जो परमात्मा तत्व है, जो चेतन है , उसी में अहम भाव करना और उसे ही “मैं” समझना आत्मनिष्ठा का सुगम साधन है।

संसार में बिजली का तार दिखाई देता है । लेकिन उसके अंदर व्यापक बिजली दिखाई नहीं देती। उसी प्रकार शरीर में आत्मा दिखाई नहीं दे रही है, शरीर दिखाई देता है जैसे मुस्लिम औरतें बुर्का पहनकर चलती हैं तो बुर्का दिखाई देता है ,औरत नहीं । परंतु औरत बुर्के में से सबको देख रही होती है ।ऐसे ही जीवात्मा इस शरीर के अंदर बैठी हुई सारे कार्यों को देख रही होती है। इसीलिए उसको साक्षी कहा गया है। वह आपको अर्थात मनुष्य को सही मार्ग पर चलने की चेतना देती है , प्रेरणा देती है इसलिए उसको चेतन कहा गया।

एक और उदाहरण से इसको समझ लें। हमारे शरीर में नेत्र होता है वह हमारे शरीर का एक अंग है ।लेकिन नेत्र सब को देखता है किंतु बाकी अंग उसे नहीं देख सकते । ऐसे ही चेतन आत्मा शरीर में वह तत्व है जो सबको जानता है।

अब प्रश्न उठता है कि आत्मा को साक्षी कैसे कह सकते हैं ?

साक्षी के 3 लक्षण होते हैं समीपवर्ती ,निष्पक्ष और चेतन। यह तीनों लक्षण आत्मा के अंदर विद्यमान हैं वह समीपवर्ती भी है , निष्पक्ष भी है और चेतन भी। इसलिए आत्मा साक्षी है।

संसार में रह कर भी जो लोग इसकी रसना और वासना से अपने आप को बचाते हैं , दुर्व्यसनों से स्वयं को बचाते हैं और मोक्ष की तैयारी करने के लिए अपने किले को रोज मजबूती देते जाते हैं अर्थात आत्मा का परिष्कार करते रहते हैं , वास्तव में सच्चे ज्ञानी वही कहलाते हैं । वह बहुत कम लोग होते हैं जो यह समझ पाते हैं कि मैं कौन हूं ? मैं कहां से आया हूं ? मुझे कहां जाना है ? यह मेरी एक अनंत यात्रा है ? जिसका मैं एक राही हूं ?और मैं आनंद का रही हूं, मुझे ईश्वर से मिलना था, क्योंकि ईश्वर ही सत् , चित् और आनंद है । उसमें सत है ,चित् है और आनंद भी उसके अंदर है ।इसलिए मनुष्य को चाहिए कि वह आनंद की प्राप्ति करने के लिए प्रयासरत रहे। उसी की यात्रा सफल होती है । उसी का जीवन सफल और सुफल होता है। क्योंकि आत्म तत्व चल तथा शरीर चल है। आत्मा नित्य और शरीर अनित्य है। आत्मा चेतन और शरीर अचेतन है। आत्मा निर्विकार और शरीर विकारवान है।

आत्मबोध करिए ।जिसके बिना ज्ञान नहीं मिल सकता ।

यह सब कुछ पाया जा सकता है – आत्मानुशासन से क्योंकि आत्मानुशासन से असीम नियंत्रण शक्ति प्राप्त होती है और जो व्यक्ति अपने आपको आत्म नियंत्रण से सही सही समझ लेता है , वह अपना सच्चा साथी बन जाता है।यहां तक कि मंत्रविद होने से आत्मविद होना ज्यादा अच्छा है अर्थात अपने आपको पहचानना कि मैं कौन हूँ।

अर्जुन ने श्रीकृष्ण से पूछा था कि अध्यात्म क्या है ? श्री कृष्ण ने बहुत सुंदर जवाब दिया कि स्वभाव ही अध्यात्म है। मनुष्य मनुष्य बने पशु न बने। पशु को नहीं पता कि मैं कहां से आया हूं , कहां जा रहा हूं ? मनुष्य को तो ईश्वर ने बुद्धि दी है । मनुष्य को यह पता होना चाहिए कि उसकी यात्रा चल रही है ।वह कुछ समय के लिए यहां पर इस शरीर में आया है।

इसलिए ज्ञानी बनकर वर्तमान शरीर में ठीक प्रकार से समझकर परिस्थिति के अनुसार आचरण करते हुए ईश्वर की प्राप्ति की ओर अग्रसर होते रहें। यही मनुष्य जीवन का लक्ष्य है। इसीलिए मैं इस संसार में आया हूं।

क्योंकि ज्ञानी तन से निस्वार्थ भाव से जनहित के कार्य करता है। सर्वभूतेहित: की भावना रखता है। मन से प्राणी मात्र के प्रति प्रेमभाव रखता है। तथा बुद्धि से आत्म वृद्धि, आत्म रमण ,आत्म क्रीडा करता हुआ जीवन यात्रा करता है। इसलिए दृश्य मान जगत को मिथ्या समझते हुए बस जो अदृश्य है , उसको सत्ता मानना और ग्रहण करना चाहिए।

एक कवि ने कितना सुंदर लिखा है —

जो आज नया वह कल पुराना।

आजकल में फंसा जमाना।।

किसी को आना किसी को जाना।

ना कोई नया न कोई पुराना।।

आज को पकड़ो न इसे गंवाना।

कल काल का कहते खाना।।

आजकल को जिसने जाना।

खुशियों का भर लिया खजाना।।

जिसने आज मनुष्य देह को पकड़कर सदुपयोग कर लिया उसका खजाना खुशियों से भर गया।

जैसे अंगूर किसमिस का कलेवर है इस शरीर को भी आत्मा का कलेवर मान लो ना। अपने बारे में स्वयं जानने को ही आत्मज्ञान कहते हैं ।आत्मबोध कहते हैं और सुनो ! इस आत्मज्ञान का बहुत महत्व है । जो हमारे ऋषियों ने मनीषियों ने र्णित किया है। मानव को आत्मज्ञान की परम आवश्यकता है । आत्मज्ञान होने पर वह सुख-दुख, राग द्वेष आदि में समान रहेगा ।आत्मज्ञान उसकी इच्छाएं और चिंताएं दूर करता है ।मनुष्य को संसार चक्र में भ्रमित न होने की आवश्यकता है । यह तभी संभव है जब हम स्वयं को ,आत्मा को और अपने निर्माता परमात्मा को जान लेंगे। शरीर सुख न देखकर आत्मा की उन्नति हेतु प्रयास करें ,क्योंकि शरीर क्षणिक है और आत्मा स्थाई।

आत्मा को जाने बिना अपने अस्तित्व का ज्ञान और आत्मिक ज्ञान के बिना आज मनुष्य मानवता को भूल रहा है। वह स्वयं को और अपने अस्तित्व को भूल चुका है ।वह भूल गया है कि हम ईश्वर की संतान हैं और यह भी कि हम सब के संचालक परमपिता परमेश्वर हैं। ऐश्वर्य प्राप्ति के लिए मनुष्य आज हर तरह के काम में लिप्त है। ऐसी विषम परिस्थितियों में उसे आत्मज्ञान की अत्यधिक आवश्यकता है। क्योंकि ईश्वर प्राप्ति का अवसर सिर्फ मनुष्य को ही मिलता है ।इस महत्वपूर्ण शरीर को प्राप्त करके भी जीवन को हमने विषय वासनाओं में बिता दिया। दिव्य शक्ति के द्वारा जागृत करने पर भी आत्मा के संबंध में ज्ञान प्राप्त नहीं किया है। मनुष्य भौतिक सुखों के नहीं मिलने पर जीवन को व्यर्थ समझता है ।हमें विचार करना चाहिए कि इंद्रिय और विषयों के संग जो सुख प्राप्त होता है क्या वही वास्तविक सुख है ? यदि वही वास्तविक सुख होता तो सदैव विद्यमान रहता । उसका कभी नाश नहीं होता । पतंगे दीपशिखा में सुख वृद्धि करने हेतु उसके निकट जाते हैं और फिर जलकर नष्ट हो जाते हैं ।

यही दशा विषय भोगों को भोगने से है । जैसे-जैसे हम मोह, राग द्वेष से निकलकर ऊपर उठना चाहते हैं वैसे_ वैसे हम इनमें और फंसने लगते हैं ।जब हम जानेंगे कि यह संसार मिथ्या है, और शारीरिक सौंदर्य नश्वर है ,तभी हमारी आत्मिक उन्नति हो पाएगी ।

जब हम आत्मा की बात करते हैं तो हमारा धर्म होता है कि चेतन की विशुद्ध तम और विराटतम स्थिति में आयें। ऐसे में हमारे चित के सागर में इच्छाएं की लहरें नहीं उठती । हम हर कोने से पूर्ण हो जाते हैं , जब हम अपने आपको आत्मा के रूप में पाते हैं ,तभी हम इन इच्छाओं का जाल तोड़ पाते हैं। तभी शांति की गंगा अवतरित होती है ।जब हम आध्यात्मिक रूप से शांत होते हैं। तभी हम आनंदित हो सकते हैं।

इसके लिए प्रभु से जब जब भी कुछ मांगो तो उससे यही प्रार्थना करो कि हे दयानिधे ! मुझे भक्ति का दान दो , सन्मार्ग पर चलने की प्रेरणा दो मेरी बुद्धि को पवित्र रखो और मुझे धर्मानुरागी बनाओ। उससे धर्मानुसार अर्थ और काम करते हुए मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करने के लिए प्रार्थना करें। हम अपने हृदय मंदिर को इस प्रकार साफ स्वच्छ करके सजाएं कि वहां परमात्मा का वास सहजता से हो जाए।

इस संसार में मुसाफिर थे सभी।

कोई जल्दी और कोई रुक कर गया।

जाना सबको है, गुजरना सबको है। समझो कि जैसे आकाश से हवाई जहाज गुजर जाता है , कुछ समय के लिए दिखाई पड़ता है और ओझल हो जाता है वैसे ही हम भी कुछ समय के लिए दिखाई पड़ रहे हैं एक दिन आएगा कि हम भी ओझल हो जाएंगे । जब ओझल हो जाएंगे तो लोग कहेंगे कि – ‘गुजर गया’, मान लो कि तब लोग कहेंगे कि हमारा हवाई जहाज ‘गुजर गया’ ।

जीवन में सबसे बड़ा प्रश्न ही मृत्यु है और मृत्यु का उत्तर जीवन है। क्योंकि जिसका जीवन है उसकी ही मृत्यु है।

देवेंद्र सिंह आर्य

चेयरमैन उगता भारत

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