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धर्म-अध्यात्म

खल संग कलह भल नहीं प्रीति

डा. विक्रम साराभाई के जीवन की घटना है। सन 1948 में अहमदाबाद के महात्मा गांधी विज्ञान संस्थान में दो विद्यार्थी प्रयोगशाला में प्रयोग कर रहे थे। तभी प्रयोग करते समय अधिक विद्युत प्रवाह हो जाने से यंत्र जल गया। दोनों विद्यार्थी यह देखकर डर गये। उन्हें लगा कि अब गुरू जी की डांट पड़ेगी। थोड़ी देर में गुरूजी भी उधर ही आते दिखायी दिये। उनमें से एक बोला गुरूजी आ रहे हैं, उन्हें बता दो कि यंत्र में आग लग गयी है।”

दूसरे ने कहा कि मैंने यह नुकसान नहीं किया है इसलिए तुम स्वयं बता दो।

तब तक गुरूजी और भी निकट आ गये थे। उन्होंने दोनों विद्यार्थियों के बीच संवाद सुन लिया था। इसलिए उन्होंने स्वयं ने ही कहा-क्या बात है?

डरते-डरते एक विद्यार्थी ने कह दिया कि ”विद्युत प्रवाह अधिक हो जाने से विद्युत मोटर जल गया है गुरूजी।”

”गुरूजी ने बड़ा प्रेरणास्पद उत्तर दिया। बस इतनी सी बात है? इसकी चिंता मत करो। यह तुम्हारी परीक्षा का काल है, प्रयोगों के समय ऐसा अक्सर होता है, गलतियों से हमें कुछ सीखना चाहिए। भविष्य में सावधानी रखना।”

प्रेम ने संकीर्णताओं को काट दिया, चिंतन और बौद्घिक क्षमताओं को खुला छोड़ दिया, उन्हें और भी विस्तार दे दिया। कह दिया कि विद्युत मोटर जल गया तो कोई बात नहीं-विद्युत मोटर के स्वार्थभाव को छोडक़र तुम अपना बौद्घिक विस्तार करो। ऐसे महान विचार के पीछे गुरूजी के हृदय में अपने विद्यार्थियों के प्रति प्रेम का अथाह सागर लहरा रहा था। यदि वह उस सागर में न सराबोर होते या उस प्रेमरस के रसिक न होते तो उनके अनेकों विद्यार्थियों का निर्माण बाधित हो जाता, या विक्रजी के लिए विद्युत मोटर ही महत्वपूर्ण हो जाती तो उनके द्वारा अनेकों प्रतिभाओं का निर्माण किया जाना संभव नही होता। इस प्रकार प्रेम प्रतिभा निर्माण कराता है, प्रतिभाओं के निर्माण के सारे अवसर उपलब्ध कराता है। व्यक्ति को एक दूसरे के प्रति संवेदनशील, सहयोगी ओर शुभचिंतक बनाकर जोड़ता है।

जब प्रेम हृदय को अपने रंग में पूर्णत: रंग लेता है तो हृदय से निकले शब्द दूसरे के हृदय को प्रभावित करते हैं। लोककल्याण से अभिभूत महात्मा बुद्घ चले जा रहे थे, किसी जंगल की ओर। अचानक कुछ लोगों ने उन्हें जंगल की ओर जाने से रोका। कहने लगे-”इधर एक भयानक राक्षस डाकू अंगुलिमाल रहता है। वह लोगों को मारकर उनकी एक अंगुली काटकर उसे अपनी माला में पिरो लेता है, इस प्रकार वह सौ व्यक्तियों की माला बनाकर पहनना चाहता है। अब तक वह अनेकों लोगों की हत्या कर चुका है।…..आप इधर न जाइये, कहीं अंगुलिमाल मिल गया तो कुछ भी संभव है।”

महात्मा बुद्घ रूके नहीं। उन्होंने विनम्रता से उन लोगों को अपने सामने से हटा दिया, और पूर्ववत अपने गंतव्य की ओर बढऩे लगे। अंगुलिमाल भी अपने शिकार की खोज में ही था। उसने दूर से महात्मा बुद्घ को आते देख, मन ही मन प्रसन्नता व्यक्त की। उसे लगा कि शिकार सीधा आ रहा है, इसे तो मारने के लिए भागना दौडऩा भी नहीं पड़ेगा। जैसे महात्मा बुद्घ अंगुलिमाल के निकट आये, अंगुलिमाल ने उन्हें रूकने के लिए कहा पर बुद्घ रूके नहीं। अंगुलिमाल को क्रोध आ गया उनके ना रूकने को उसने अपनी प्रतिष्ठा के विरूद्घ समझा। इसलिए वह महात्मा बुद्घ को मारने के लिए दौड़ पड़ा। वह चिल्लाकर बोला-‘ठहरो!’ महात्मा बुद्घ ने तुरंत बड़ी विनम्रता से प्रेमपूर्ण शब्दों में कहा-”मैं तो ठहर गया पर तुम कब ठहरोगे?” बुद्घ के शब्दों में जो आकर्षण था वह आज से पूर्व अंगुलिमाल ने किसी के भी शब्दों में देखा सुना नहीं था। बुद्घ के शब्द कानों में गूंजते हुए उसे भीतर तक हिला गये। आज उसे पहली बार लगा कि शब्दों की शक्ति क्या होती है ?

महात्मा बुद्घ ने आगे कहा- ”विश्व के समस्त प्राणियों केे प्रति हिंसाभाव को अपने आपसे दूर कर देने के कारण ही मैं ‘स्व’ में स्थित हूं, स्वस्थ हूं। पर तुम प्राणियों के प्रति हिंसाभाव रखने के कारण अस्थिर हो। अस्वस्थ हो, एक स्थान पर ठहरते नहीं हो, तुम्हारे भीतर अशांति है, जो तुम्हें व्याकुल किये रखती है। तुम्हारे हिंसा के भाव तुम्हें कहीं पर भी तुम्हें ठहरने नहीं देते हैं।”

अंगुलिमाल भीतर तक हिल गया था। उसे इस प्रकार का उपदेश करने वाला कोई महात्मा अब से पूर्व नहीं मिला था। उसने समझ लिया कि जीवन में परिवर्तन के क्षण आ चुके हैं, इसलिए अंगुलिमाल ने अपने शस्त्र फेंक दिये। उसने बुद्घ से भिक्षु बनने की दीक्षा ली। उसकी हिंसा अब अहिंसा में परिवर्तित हो चुकी थी।

कहते हैं एक दिन महात्मा बुद्घ अंगुलिमाल को जेतवन में लेकर भ्रमण कर रहे थे। तभी कौशल नरेश प्रसेनजित उनके पास आ पधारे। कुशलक्षेम की प्रक्रियापूर्ण कर प्रसेनजित ने वन में अपने आने का प्रयोजन बताते हुए कहा कि अंगुलिमाल के आतंक से प्रजा को मुक्त करने के लिए उसे पकडऩे के प्रयोजन से वन में आया हूं। महात्मा बुद्घ ने पास बैठे अंगुलिमाल की ओर संकेत कर कहा कि यही अंगुलिमाल है।

प्रसेनजित महात्मा बुद्घ के आत्मबल से प्रसन्नचित हो अपनी राजधानी लौट आया। सचमुच प्रेम में हिला देने की शक्ति है। क्योंकि वास्तविक प्रेम नि:स्वार्थ होता है, उसमें किसी प्रकार का कोई स्वार्थ भाव नहीं होता। वह कल्याण से उपजता है, कल्याण में विकसित होता है और कल्याण में ही समाप्त होता है। इसी को ‘प्रेमपथ’ कहा जा सकता है।

अब आते हैं ‘स्वार्थभाव’ पर कि ये मिटेगा कैसे? इसके विषय में यह ध्यान रखने की आवश्यकता है कि यह तभी मिट सकता है जब व्यक्ति देने की प्रवृत्ति रखेगा। इस संसार में लोग आपको मूर्ख बनाकर लेने वाले भी आएंगे और आपसे प्रेम से मांगने वाले भी आएंगे। हमारे पास यदि कुछ है तो हमें देने की प्रवृत्ति रखनी चाहिए। हां, पात्रता और व्यक्ति की मांगने की प्रवृत्ति और मानसिकता का ध्यान भी रखना चाहिए। जो लोग आपको मूर्ख बनाकर आपको ठगने के उद्देश्य से आपसे मांगने के लिए आ रहे हैं-उनसे सावधान रहना चाहिए। ऐसे लोगों से तो दूरी बनाकर चलना ही उचित है। तुलसीदास जी कहते हैं-

कवि कोविद गावहिं अस नीति।

खल सन कलह न भल नहिं प्रीति।।

उदासीन नित रहिय गुसाईं।

खल परिहरिय स्वान की नाईं।।

अर्थात कवि और बुद्घिमान लोगों की नीति है कि दुष्ट व्यक्ति के साथ न लड़ाई रखनी चाहिए न प्रीति। ऐसे व्यक्ति के प्रति हमें उदासीन रहना चाहिए। दुष्ट व्यक्ति को कुत्ते की भांति छोड़ देना चाहिए।

इसके अतिरिक्त जो लोग भले हैं, सत्पुरूष हैं, जिन्हें हमारे सहयोग की आवश्यकता है और जिन्हें सहयोग देने से उनका कल्याण हो सकता है, उनका हमें सहयोग अवश्य करना चाहिए। ऐसे पात्र लोगों को दिया गया दान ही वास्तव में दान कहलाता है। इस प्रकार के दान से हमारा स्वार्थभाव समाप्त होता है और लोगों में परस्पर सहयोग पूर्ण प्रेम में वृद्घि होती है।

डॉ राकेश कुमार आर्य

संपादक : उगता भारत

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