किसान कर्ज घोटाले पर कांग्रेसी सांसदों को भी आया गुस्सा!

संसद के इस बजट सत्र में भी घोटालों के चलते लग रहे राजनीतिक निशानों से यूपीए सरकार हलकान हो गई है। पिछले वर्षों से यह सिलसिला चला आ रहा है कि संसद के लगभग हर सत्र में सरकार नए-नए घोटालों की चपेट में आ जाती है। मंगलवार को संसद में नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की एक रिपोर्ट रखी गई। किसान कर्ज माफी की योजना में अरबों रुपए के घोटाले की आशंका जाहिर की गई है। क्योंकि इस योजना के बहाने तमाम फर्जीवाड़ा किया गया है। कैग ने कुछ मामलों को नमूनों के तौर पर परखा था, परीक्षण में पाया गया है कि करीब 20-22 प्रतिशत मामलों में भारी गड़बड़ी हुई है।
इसको लेकर विपक्ष ने दोनों सदनों में खूब हंगामा किया है। इस नए घोटाले ने मनमोहन सरकार की राजनीतिक किरकिरी एक बार फिर से बढ़ा दी है। सत्तारूढ़ कांग्रेसी सांसदों में भी इस मामले को लेकर काफी गुस्सा दिखाई पड़ा। संसद के सेंट्रल हॉल में कल कई सांसदों ने अनौपचारिक संवाद में वरिष्ठ मंत्रियों से अपनी नाराजगी दर्ज करा दी है। कहा है कि घोटालों का यही सिलसिला चलता रहा, तो वे किस मुंह से चुनाव में जाएंगे? मुख्य विपक्षी दल भाजपा को सरकार के खिलाफ आक्रामक रुख अपनाने का एक नया हथियार मिल गया है। लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज यही कहती हैं कि मनमोहन सरकार के कार्यकाल में कोई भी योजना बगैर घोटाले के पूरी नहीं होती। सरकार के कामकाज की शैली इतनी खराब हो गई है कि इसके चलते नीचे से ऊपर तक भ्रष्टाचार का बोलबाला हो गया है। पूरे तंत्र में सडऩ होने लगी है। पिछले वर्षों में एक से बढ़कर एक घोटाले सामने आए हैं। चाहे मामला राष्ट्रमंडल खेलों के आयोजन का हो या 2जी स्पेक्ट्रम का। बहुचर्चित कोयला घोटाले में भी सरकार के कई वरिष्ठ मंत्रियों की भूमिका शक के घेरे में रही है। लेकिन, सरकार का रुख इस मामले में अब तक लीपा-पोती का ही लग रहा है। भाजपा प्रवक्ता प्रकाश जावड़ेकर कहते हैं कि यूपीए-2 सरकार ने घोटालों का नया रिकॉर्ड बना लिया है। इनकी हर योजना में कोई न कोई घोटाला जरूर पलता है। किसान कर्ज घोटाले में कुल कितने अरब रुपए की रकम डकारी गई है, अभी इसका ठीक-ठीक आकलन नहीं हो पाया है। जरूरत है कि सरकार इस मामले की जिम्मेदारी स्वीकार करे। इस फर्जीवाड़े के खेल में जो बैंक दोषी हैं, उनके खिलाफ सख्त कदम उठाए जाएं। जिन पात्र किसानों को कर्ज माफी योजना का लाभ नहीं मिला, उन्हें चिन्हित किया जाए। जरूरत है कि ऐसे किसानों को कर्ज माफी का लाभ दिया जाए। वैसे भी देश के विभिन्न हिस्सों में तमाम किसान कर्ज से दबे होने के कारण मौत को अपने गले लगा लेते हैं।
उल्लेखनीय है कि 2008 में यूपीए की पहली सरकार ने किसानों की कर्ज माफी योजना का ऐलान किया था। उद्देश्य यही था कि सीमांत श्रेणी वाले किसानों के 50 हजार रुपए तक के बैंक कर्ज माफ कर दिए जाएं। व्यवस्था यह की गई थी कि बैंकों को इस कर्ज की भरपाई केंद्र सरकार की तरफ से की जाएगी। बैंकों को ही पात्र कर्जदारों को चिन्हित करने की जिम्मेदारी दे दी गई थी। मार्च, 2012 तक करीब 52 हजार करोड़ रुपए की कर्ज माफी की गई है। दावा किया गया है कि इस योजना के तहत 3.69 करोड़ छोटे एवं सीमांत किसानों को योजना का लाभ मिला है। जबकि 60 लाख दूसरी श्रेणियों के किसानों को भी लाभ दिया गया है। लेकिन, कैग ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि उसने नमूनों के तौर पर 9,334 खाता धारकों के मामलों का परीक्षण अपने स्तर पर कराया था। इनमें काफी फर्जीवाड़े के मामले पाए गए थे। इसके बाद उसने 80,299 अन्य खाता धारकों के मामलों का परीक्षण कराया। परिणाम यही रहा कि करीब 20 प्रतिशत मामलों में बड़ी गड़बडिय़ां पाई गई हैं।
कैग की रिपोर्ट में जानकारी दी गई है कि बैंक अधिकारियों की मिलीभगत से कर्ज माफी योजना का लाभ कई जगह कारोबारियों ने उठा लिया है। कई लोगों ने फर्जीवाड़े के जरिए अपने लाखों के कर्ज माफ करा लिए हैं। जबकि हजारों पात्र किसानों के प्रार्थना पत्र लंबित ही पड़े रहे। कैग की रिपोर्ट आने के बाद बुधवार को संसद के दोनों सदनों में भारी हंगामा हुआ था। प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने यही सफाई देने की कोशिश की है कि यदि इस मामले में कोई घोटाला वाकई में हुआ होगा, तो किसी भी दोषी को बख्शा नहीं जाएगा। सरकार मामले की पूरी जांच करा लेगी।
इस मामले में भारी राजनीतिक हंगामा होने के बाद रिजर्व बैंक ने अपनी कार्रवाई तेज कर दी है। उसने कर्ज माफी योजना से जुड़े बैंकों से 15 दिन के अंदर तमाम ब्यौरा तलब किया है। वित्त मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी भी हैरान हैं कि रिजर्व बैंक की कड़ी निगरानी के बाद भी इतने बड़े पैमाने पर चूक कैसे हो गई? संसदीय कार्य मंत्री कमलनाथ ने तो कैग रिपोर्ट के संदर्भ में कह दिया है कि यह मामला सरकार के लिए बड़े शर्म की बात है। क्योंकि, गरीब किसानों की योजना का लाभ कई जगह फर्जीवाड़े का शिकार हो गया है। जबकि, सरकार ने इस योजना के जरिए गरीब किसानों को राहत देने का बड़ा प्रयास किया था।
दरअसल, 2009 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने मनरेगा के साथ किसान कर्ज माफी योजना को राजनीतिक रूप से भुनाने की कोशिश की थी। चुनाव प्रचार में उसे इन योजनाओं के चलते भारी राजनीतिक लाभ भी हुआ था। भाजपा प्रवक्ता शाहनवाज हुसैन सवाल करते हैं कि अब जनता कैसे विश्वास करेगी कि यूपीए सरकार आम आदमी के कल्याण के लिए वाकई में कुछ करती है? कर्ज माफी योजना के बहाने अरबों रुपए ‘अपात्रों’ की जेब में चले गए। अब सरकार के लोग जांच कराने का स्वांगभर कर रहे हैं। सवाल यह है कि यूपीए सरकार के दौर में ही इतने घोटाले क्यों होते हैं? केंद्रीय कृषि मंत्री शरद पवार का मानना है कि कर्ज माफी योजना में ज्यादा गड़बडिय़ां नहीं हुई हैं। उन्होंने कैग के जांच तरीकों पर ही सवाल उठा दिए हैं। पवार ने कह दिया है कि कैग ने नमूने के तौर पर महज 0.25 प्रतिशत मामलों का परीक्षण कराया है। इतने कम परीक्षणों के आधार पर अरबों रुपए के घोटालों की आशंका खड़ी करना उचित नहीं लगता। प्रधानमंत्री ने पहले ही कह दिया है कि संसदीय परंपराओं के हिसाब से कैग की इस रिपोर्ट को भी संसद की लोक लेखा समिति को परीक्षण के लिए भेज दिया जाएगा। किसानों से जुड़े इस मामले को लेकर वोट बैंक की राजनीति भी गरम हो गई है। विपक्षी दलों के साथ सरकार को बाहर से समर्थन देने वाले सपा और बसपा जैसे दलों ने भी संसद में आक्रामक रुख अपना लिया है। सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह ने संसद में भी काफी तीखे तेवर दिखाए थे। उन्होंने कहा कि इस फर्जीवाड़े में जिन अधिकारियों की भूमिका हो, उन्हें जेल में डाल देना चाहिए। बसपा सुप्रीमो मायावती ने तो नाराज होकर सरकार की नीयत पर ही सवाल खड़ा किया। उन्होंने कहा है कि केंद्र सरकार, गरीब किसानों और कामगारों को कभी भी वास्तविक लाभ नहीं लेने देती। सरकारी तंत्र साजिश करके कोई न कोई खेल कर देता है। इस मामले में भी सरकार की जिम्मेदारी बनती है। यही कहना काफी नहीं है कि सरकार मामले की जांच कराएगी। जदयू अध्यक्ष शरद यादव ने दावा किया है कि संसद से सड़क तक एनडीए नेतृत्व इस मामले को उठाएगा। गांव-गांव में यह बताया जाएगा कि मनमोहन सरकार के कार्यकाल में बस अरबों-खरबों रुपए के घोटालों का इतिहास ही बना है। ऐसे में, जरूरी हो गया है कि जनता वोट के जरिए ऐसी सरकार को उखाड़ फेंके। वैसे भी इस सरकार की खराब आर्थिक नीतियों के चलते आम आदमी का जीवन बहुत कठिन हो गया है। राजद सुप्रीमो लालू यादव भी किसान कर्ज माफी योजना के घोटाले को लेकर काफी गुस्से में आ गए हैं। अनौपचारिक बातचीत में उन्होंने कहा कि यूपीए-1 की जिस सरकार में यह योजना बनी थी, उसमें वे भी मंत्री थे। किसानों को बड़ी राहत दिलाने के लिए यह योजना लागू कराई गई थी। उन्हें कैग की रिपोर्ट से यह जानकार हैरानी हुई है कि कर्ज माफी योजना में इतना फर्जीवाड़ा हो गया है। जबकि कर्ज में दबे होने के कारण लाखों किसान हर साल आत्महत्याएं करने के लिए मजबूर हो जाते हैं। जरूरी हो गया है कि घोटालेबाजों को जेल भिजवाया जाए। सरकार का फर्ज है कि कम से कम इस मामले में वह लीपा-पोती न करे। वरना, गरीब किसानों की बहुत ‘हाय’ लग जाएगी। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, विपक्ष के आक्रामक रवैए से तल्ख तेवर अपनाने लगे हैं। बुधवार को उन्होंने संसद में अपनी नाराजगी जता दी थी। आम तौर पर प्रधानमंत्री गुस्सैल टिप्पणियां नहीं करते। बहुत कम ऐसे मौके आए हैं, जब उन्होंने विपक्ष को खुलकर कोसा हो। लेकिन, प्रधानमंत्री ने नाराजगी में भाजपा नेतृत्व के लिए काफी कुछ कह दिया है।
वे यहां तक बोले थे कि भाजपा नेताओं को ज्यादा घमंड हो गया है। ऐसे में, उनकी सरकार की तमाम बड़ी उपलब्धियों को भी ये लोग हवा में उड़ाने की राजनीति कर रहे हैं। यदि इनका यही रवैया रहा, तो 2009 की तरह 2014 में इनके हाथ से सत्ता फिसल जाएगी। राजनीतिक हलकों में माना जा रहा है कि ऐसी टिप्पणी करके मानो प्रधानमंत्री ने भाजपा को ‘शाप’ दे दिया हो।भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह कहते हैं कि इस तरह की टिप्पणियां सरकार के मुखिया की घोर निराशा के ही संकेत माने जाने चाहिए। लेकिन, सरकार देश को यह तो बताए कि आखिर गरीब किसानों के वाजिब हिस्से को कौन लील गया है?

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