लोक देवता कल्ला जी राठौड़ : जिनके सिरविहीन धड़ ने भी काटी थी अकबर की सेना

अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व समर्पण करने वाले देशभक्तों से भारत का इतिहास पटा पड़ा है । यहां पर अनेकों ऐसे ‘दधीचि’ हुए हैं जिन्होंने समय आने पर सहर्ष अपनी अस्थियों का दान लोककल्याण और देश व धर्म की रक्षा के लिए कर दिया । ऐसे ही देशभक्तों में से एक हैं राजस्थान के लोक देवता के नाम से प्रसिद्ध – कल्ला जी राठौड़ ।

राजस्थान में उनका जन्म मेड़ता राजपरिवार में आश्विन शुक्ल 8, विक्रम संवत 1601 को हुआ था।

अपनी अनन्य भक्ति भावना के लिए भारतीय इतिहास में प्रसिद्ध मीराबाई उनकी बुआ थीं।इनके पिता मेड़ता के राव जयमल के छोटे भाई आसासिंह थे। भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों के प्रति निष्ठावान कल्ला जी राठौड़ बचपन से ही योग , शस्त्र अभ्यास , औषधि विज्ञान और वेद विद्या के प्रति अधिक रुचि रखते थे । प्रसिद्ध योगी भैरवनाथ से इन्होंने योग की शिक्षा पायी।

इस समय मुगल बादशाह अकबर भारतीय धर्म और संस्कृति का हत्यारा बनकर सर्वत्र अपना आतंक मचा रहा था । उसकी कोप दृष्टि मेड़ता पर भी पड़ी । स्वभाव से संत कल्ला जी राठौड़ ने अकबर के आक्रमण की सूचना मिलने पर राव जयमल के नेतृत्व में और आशा सिंह जैसे योग्य योद्धा के साथ मिलकर अकबर का सामना किया । अकबर के सामने हमारे इन महान योद्धाओं को सफलता तो नहीं मिली , परंतु वह भी हार मानने वाले नहीं थे । फलस्वरूप उन्होंने अकबर का प्रतिरोध करने के लिए चित्तौड़ में जाकर राणा उदय सिंह से भेंट की । जिससे कि भारतीय संस्कृति और धर्म के हत्यारे अकबर के विरुद्ध एक अच्छी रणनीति बनाकर काम किया जा सके ।

राणा उदयसिंह अपनी वीरता और साहस के लिए प्रसिद्ध थे ।उन्होंने मां भारती की सेवा के लिए संकल्पित इन योद्धाओं का अपने दरबार में सार्वजनिक स्वागत और अभिनंदन किया । राणा ने इन दोनों योद्धाओं का उचित सम्मान कर इनकी वीरता और साहस का देश की रक्षा के लिए उपयोग करते हुए उन्हें बदनौर की जागीर प्रदान की। कल्ला जी को रणढालपुर की जागीर देकर गुजरात की सीमा से लगे क्षेत्र का रक्षक नियुक्त किया।

कल्ला जी राठौड़ उस समय अपने भरपूर यौवन में थे । फलस्वरुप उनका विवाह शिवगढ़ के राव कृष्णदास की पुत्री कृष्णा से निश्चित हुआ। यह घटना 1567 की है । इसी समय अकबर ने चित्तौड़ पर आक्रमण किया था । अकबर के हमले की सूचना मिलते ही महाराणा उदय सिंह ने इस आक्रमण का संदेश कल्लाजी राठौड़ के पास पहुंचवाया। द्वाराचार के समय जब उनकी सास आरती उतार रही थी, तभी राणा उदयसिंह का सन्देश मिला कि अकबर ने चित्तौड़ पर हमला कर दिया है, अतः तुरन्त सेना सहित वहाँ पहुँचें। कल्ला जी ने विवाह की औपचारिकता पूरी की तथा पत्नी से शीघ्र लौटने को कहकर चित्तौड़ कूच कर दिया।

महाराणा ने जयमल को सेनापति नियुक्त किया था। अकबर की सेना ने चित्तौड़ को चारों ओर से घेर लिया था। मेवाड़ी वीर किले से निकलकर हमला करते और शत्रुओं को हानि पहुँचाकर फिर किले में आ जाते। हमारे वीर योद्धाओं के गुरिल्ला पराक्रम को देखकर अकबर सिहर उठता था। उसकी सेना के अनेकों सैनिकों और योद्धाओं का खात्मा हमारे वीर योद्धा को प्रतिदिन करते जा रहे थे । परंतु अकबर के विशाल सैन्यदल के सामने हमारे मुट्ठी भर योद्धा अंततः कितने समय संघर्ष कर पाते ? स्थिति बड़ी विकट थी । इसके उपरांत भी साहस और देशभक्ति का जज्बा हमारे प्रत्येक योद्धा के सिर चढ़कर बोल रहा था । कई दिनों के संघर्ष के बाद जब क्षत्रिय वीरों की संख्या बहुत कम रह गयी, तो सेनापति जयमल ने निश्चय किया कि अब अन्तिम संघर्ष का समय आ गया है। उन्होंने सभी सैनिकों को केसरिया बाना पहनने का निर्देश दिया।

इस सन्देश का अर्थ स्पष्ट था। 23 फरवरी, 1567 की रात में चित्तौड़ के किले में उपस्थित सभी क्षत्राणियों ने जौहर किया और अगले दिन 24 फरवरी को मेवाड़ी वीर किले के द्वार खोल कर भूखे सिंह की भाँति मुगल सेना पर टूट पड़े। भीषण युद्ध होने लगा।

राठौड़ जयमल के पाँव में गोली लगी। उनकी युद्ध करने की तीव्र इच्छा थी; पर उनसे खड़ा नहीं हुआ जा रहा था। कल्ला जी ने यह देखकर जयमल के दोनों हाथों में तलवार देकर उन्हें अपने कन्धे पर बैठा लिया। इसके बाद कल्ला जी ने अपने दोनों हाथों में भी तलवारें ले लीं।

चारों तलवारें बिजली की गति से चलने लगीं। मुगल लाशों से धरती पट गयी। अकबर ने यह देखा, तो उसे लगा कि दो सिर और चार हाथ वाला कोई देवता युद्ध कर रहा है। युद्ध में वे दोनों बुरी तरह घायल हो गये। कल्ला जी ने जयमल को नीचे उतारकर उनकी चिकित्सा करनी चाही; पर इसी समय एक शत्रु सैनिक ने पीछे से हमला कर उनका सिर काट दिया। सिर कटने के बाद के बाद भी उनका धड़ बहुत देर तक युद्ध करता रहा। यह दिनांक 24 फ़रवरी1567 थी।

इस युद्ध के बाद कल्ला जी का दो सिर और चार हाथ वाला रूप जन-जन में लोकप्रिय हो गया। आज भी लोकदेवता के रूप में चित्तौड़गढ़ में भैंरोपाल पर उनकी छतरी बनी है। माना कि अकबर 1567 में महाराणा प्रताप के पिता महाराणा उदयसिंह से चित्तौड़ को छीनने में सफल हो गया था , परन्तु इन पराक्रमी योद्धाओं के बलिदानों को भुलाया नहीं जा सकता । जिन्होंने अंतिम क्षणों तक अपने देश , अपने धर्म और अपनी संस्कृति के लिए प्राणपण से डटकर शत्रु का मुकाबला किया और अपना सर्वोत्कृष्ट बलिदान देकर अमर हो गए। आज राजस्थान के लोग कल्ला जी राठौड़ को अपना लोकदेवता मानकर पूजते हैं। हमारा मानना है कि यह कल्लाजी राठौड़ जैसे लोग राजस्थान के नहीं बल्कि सारे भारतवर्ष के लोक देवता हैं , जिनका सम्मान पूरे देश में होना चाहिए।

डॉ राकेश कुमार आर्य

संपादक : उगता भारत

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