भगवान करते हैं अपने भक्तों पर कृपावृष्टि

यह भावना हृदय से निकलती है तो अपने समक्ष साक्षात खड़े ईश्वर को भी कृपादृष्टि और दयावृष्टि करने के लिए बाध्य कर देती है। भगवान अपने भक्त पर अपनी कृपा की वर्षा करते हैं – अर्थात उसके दोष निवारण करते हैं। इस भावना से यह स्विष्टकृताहुति यज्ञ में दी जाती है। दोष निवारण की जहां भावना होती है , वहां व्यक्ति के गुणों में वृद्घि होते जाते रहने से पाप और अत्याचार की दुष्ट भावनाएं अपने आप ही नष्ट होती जाती हैं।

चोरी सर्वत्र निदिंत की जाती है। चोरी का भाव ही ऐसा है जिसे लोग घृणा की दृष्टि से देखते हैं। पर संसार में एक चोरी ऐसी है जो आपको यश और कीत दिलाती है। उसको जिसने अपना लिया-मानो उसका बेड़ा पार हो गया, सारे भवबंधनों पर वह विजय प्राप्त कर लेता है, और वह चोरी है-‘गुणचोर’ बन जाने की। संसार के जितने भी महापुरूष हुए हैं वे सभी अपने से पूर्ववर्ती महापुरूषों के ‘गुणचोर’ रहे हैं। इसीलिए कहा जाता है-‘महाजनो येन गत: स पन्था:’ अर्थात जिस मार्ग से महापुरूष निकले हों उसी को पंथ कहा जाता है। कहने का अभिप्राय है कि संसार में बड़ा बनने के लिए बड़ों के ‘गुणचोर’ बनो,-कल्याण होगा।

महर्षि पतंजलि जी महाराज ने अपने पूर्ववर्ती महान ऋषियों के जन्मों-जन्मों के अनुभवजन्य ज्ञान को निचोडक़र अपने योगदर्शन में अष्टांग योग के रूप में रख दिया। उनका कितना बड़ा उपकार था ? हम सब पर। आज तक उनका वह ज्ञान चिर नवीन है-सनातन है। जब से पतंजलि का योगदर्शन लोगों को मिला तब से उसे पढ़-पढक़र व अपनाकर करोड़ों लोगों ने अपने जीवन का उद्घार कर लिया। वर्तमान में स्वामी रामदेव जी महाराज इस योगदर्शन के अष्टांगयोग के केवल प्राणायाम नामक विभाग को बता व समझाकर ही करोड़ों लोगों का कल्याण कर चुके हैं। एक पतंजलि के गुणों की चोरी की गयी तो रामदेवजी इस काल के महानायक हो गये और करोड़ों लोगों को जीवन दान मिल गया।

कैसी-कैसी विभूतियां इस सनातन वैदिक धर्म के पास हैं ? मरकर भी व्यक्ति मरता नहीं है-सनातन हो जाता है चिरनवीन हो जाता है। इसी को ‘मृत्योर्माम् अमृतमगमय’ की साधना कहा जाता है। आज सारे देश में गली गली में पतंजलि की दुकानें खुल गयी हैं। किसी को नहीं लगता कि पतंजलि कहीं चले गये हैं-सबको लगता है-पतंजलि मेरी गली में हैं और दूसरा कहता है कि मेरी गली में भी है। ऐसा कब होता है? जब व्यक्ति ‘गुणचोर’ बनता है। दूसरों के गुणों को देखता है और उन्हें अपनाता है। क्या अच्छी शिक्षा है :-

”जिंदगी की हुबहू तुम झलकियां देखा करो-

दूसरों के गुण और अपनी गलतियां देखा करो।।”

वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी कौशल विकास पर विशेष ध्यान दे रहे हैं। प्रधानमंत्री के इस विचार का मूल लक्ष्य वास्तव में तो व्यक्ति के बौद्घिक कौशल से है। बौद्घिक कौशल का अभिप्राय है कि प्रत्येक कार्य को भली प्रकार विचारपूर्वक किया जाना चाहिए। कार्य के परिणाम पर विचार किया जाए और करने में पूर्ण विवेक का परिचय दिया जाए। ऐसी स्थिति भी तभी आ सकती है जब व्यक्ति ‘गुणचोर’ बन जाए। वैसे व्यक्ति स्वभावत: ही गुणचोर होता है – इस शब्द को सामान्य बोलचाल की भाषा में नकल करना कहा जाता है। बड़ों की नकल करते-करते एक बच्चा खड़ा होना सीख जाता है, बोलना सीखने लगता है। जीवन व्यवहार सीखने लगता है। मनुष्य को एक समायोजन प्राणी इसीलिए कहा जाता है कि वह बिना समाज या समुदाय के जीवन की पगडंडी पर आगे नहीं बढ़ सकता। यही कारण रहा कि हमारे शिक्षाविदों ने मनुष्य के बच्चे को समूह में ही पढ़ाना लिखाना आरंभ किया। अध्यापक तो पाठ पढ़ाकर कक्षा से चला जाता है पर फिर उसे बच्चा कंठस्थ करता है-अन्य सहपाठियों के साथ मिलकर।

एक अध्यापक एक से सौ तक की गिनती बच्चों को सिखाता है। एक बच्चा बोलता है तो अन्य उसकी नकल करते हुए वैसे ही पीछे से बोलते हैं। …और हम देखते हैं कि एक दिन सारी कक्षा ही गिनती में निष्णात हो जाती है। ऐसे ही बड़ी कक्षाओं में जाकर बच्चों को बालसभा या विचार गोष्ठियों में बोलना सिखाने के लिए ऐसी सभाओं का आयोजन किया जाता है। वहां से बच्चे में या शिक्षार्थी में वक्तृत्व का गुण विकसित हो जाता है।

बच्चा या शिक्षार्थी बड़े शांतभाव से दूसरों को बोलते देखता है और स्वयं एक अच्छा वक्ता बन जाता है। ऐसी शिक्षा भारत की प्राचीन शिक्षा प्रणाली का एक अंग होती थी। यही कारण था कि बच्चों या विद्यार्थियों को गुरूकुलों में अन्य शिक्षार्थियों के साथ रखा जाता था-जिससे कि हर बच्चा गुणचोर बन जाए। आजकल की शिक्षा प्रणाली में इसे ‘ ग्रुप डिस्कशन ‘ के रूप में ज्यों की त्यों मान्यता दी गयी है। पर आजकल की शिक्षा पद्घति में व्यापक दोष है। फलस्वरूप बच्चे अवगुण चोर बन रहे हैं। कारण कि विद्यालयों का परिवेश भी विलासितापूर्ण हो गया है।

शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जो बच्चों को गुण चोर ही बनाए । एक दूसरे के अच्छे गुणों को धारण करने की क्षमता जब बच्चों के भीतर आ जाती है तो वे बड़े होकर उन कार्यों को करना अपने लिए आवश्यक मानने लगते हैं जिनके करने से दूसरे लोगों ने संसार में यश और कीर्ति को प्राप्त किया । भारतीय संस्कृति में समाजवाद इसी बात पर आधारित है कि हर कोई एक दूसरे के गुणों को ग्रहण करते रहें और गुणों के ग्रहण करते जाने से सारा समाज ही एक दूसरे का गुणग्राही हो जाए।

डॉ राकेश कुमार आर्य

संपादक उगता भारत

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