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वैदिक साधन आश्रम में चतुर्वेद पारायण यज्ञ समाप्त: साधक साध्य ईश्वर को प्राप्त करने के लिए साधना करता है : स्वामी मुक्तानंद

ओ३म्

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वैदिक साधन आश्रम तपोवन, देहरादून में रविवार 8 मार्च, 2020 को 20 दिवसीय चतुर्वेद पारायण यज्ञ एवं ध्यान योग एवं स्वाध्याय शिविर का समापन समारोहपूर्वक सम्पन्न हुआ। इस आयोजन का कुछ विवरण हम एक लेख द्वारा उपलब्ध करा चुके हैं। शेष विवरण इस लेख द्वारा प्रस्तुत कर रहे हैं।

आश्रम में आज प्रातः चतुर्वेद पारायण यज्ञ हुआ। इसके साथ ही गायत्री यज्ञ भी सम्पन्न किया गया। यज्ञ की पूर्णाहुति के बाद स्वामी चित्तेश्वरानन्द सरस्वती जी, स्वामी मुक्तानन्द जी तथा आचार्य आशीष दर्शनाचार्य जी के उद्बोधन हुए। इसके बाद 20 दिवसीय यज्ञ के दो पूर्णकालिक शिविरार्थियों के अनुभवों पर आधारित अपने विचार प्रस्तुत करने का अवसर दिया गया। प्रथम वक्ता के रूप में श्रीमती रेखा चौधरी जी ने कहा कि हम यहां आकर भजन गाते हैं। साधना, सेवा तथा ईश्वर के नाम का स्मरण व जप करते हैं। हमें यहां इन सबको करने का अवसर मिला है। इससे हमारी अनेक दुविधायें दूर हुई हैं। ऐसा लगता है कि वह दुविधायें कभी थी ही नहीं। आरम्भ में हमें यहां पर सेवा का कार्य दिया गया। मैं यहां पर 70 वर्ष की महिला के रूप में आयी थी। इस शिविर व यज्ञ के बाद अब मैं 50 वर्ष की होकर यहां से जा रही हूं। मैं यहां अपना जो सामान लाई थी वह लगभग 25 किलोग्राम था। अब मैं यहां से 50 किलोग्राम सामान लेकर जा सकती हूं। मुझे व हम सबको यहां पर शारीरिक एवं सामाजिक उन्नति का लाभ हुआ है। मैं इस यज्ञ के व्यवस्थापकों का धन्यवाद करती हूं। हम बता नहीं सकते कि हमें यहां पर क्या मिला है। हम यहां पर हमें सहयोग करने वालों तथा चतुर्वेद पारायण यज्ञ करने व कराने वालों सभी का धन्यवाद करते हैं।

एक अन्य साधक श्री राममुनि फरीदाबाद ने भी कार्यक्रम में अपने अनुभव बताये। उन्होंने कहा कि हमें यहां आकर ज्ञान, कर्म तथा उपासना साक्षात् रूप में प्राप्त हुई हैं। इसके लिये हम व्यवस्थापकों का धन्यवाद करते हैं। यहां आकर हमने व्यस्त जीवन व्यतीत किया जो परिवारों में रहकर नहीं हो पाता। हमें यहां पर मुख्यतः ज्ञान, कर्म व उपासना का विस्तार से परिचय एवं मागदर्शन मिला है। हम आशा करते हैं कि हमें भविष्य में भी इस प्रकार के अवसर मिलेंगे।

वैदिक साधन आश्रम तपोवन के प्रधान श्री दर्शन कुमार अग्निहोत्री जी ने अपने सम्बोधन में कहा कि सन् 1949 से वह इस आश्रम में आ रहे हैं। इस आश्रम से महात्मा आनन्द स्वामी सरस्वती, स्वामी योगेश्वरानन्द जी एवं महात्मा प्रभु आश्रित जी महाराज जुड़े रहे हैं। प्रधान जी ने कहा कि हमारे परिवार पर भी इस आश्रम व स्थान की कृपा रही। वह भी निरन्तर यहां पर आते रहे और लाभान्वित होते रहे। उन्होंने यहां निवास करने वाले उच्च कोटि के साधकों एवं ऋषिभक्त आचार्यों को नमन किया। इसके साथ ही उन्होंने ईश्वर का धन्यवाद किया और इस चतुर्वेद पारायण महायज्ञ में भाग लेने वाले तथा आयोजन में उपस्थित सभी लोगा का धन्यवाद किया।

यज्ञ के ब्रह्मा स्वामी मुक्तानन्द जी ने कहा कि आप सब साधकों ने तप पूर्वक इस महान उपक्रम को पूरा किया है। उन्होंने कहा कि साधना करने वाले को साधक कहते हैं। साधना करने से साधक साध्य को प्राप्त होता है। साधना व साध्य क्या हैं, इन्हें प्रत्येक साधक को जानना है। इन्हें जान लेने पर हमारी जीवन की यात्रा ठीक हो जाती है। इन्हें जान लेने और साधना करने से हमारी जीवन यात्रा सफल भी होती है। साधना क्या होती है और इसे कैसे किया जाता है, इसे हमें जानना है। यहां रहकर आपको साधक के लक्षणों का परिचय भी कराया गया है। वेदों में कहा गया है दान देने वाले मनुष्य का परमात्मा कल्याण करते हैं। स्वामी जी ने कहा कि भगवान का व्रत कभी भंग नहीं होता। परमात्मा का सत्य व्रत है कि वह दान देने वाले मनुष्य वा साधक का कल्याण करते हैं। स्वामी जी ने कहा कि आर्याभिवनय पुस्तक के एक मन्त्र का अर्थ करते हुए ऋषि दयानन्द ने दान का विशेष अर्थ किया है। ऋषि ने लिखा है कि हमें अपनी आत्मा आदि पदार्थों का दान करना है। ऋषि का किया हुआ दान का यह विशेष अर्थ है। हम दान में धन व भौतिक पदार्थों को तो दे सकते हैं परन्तु दान में आत्मा आदि को देना किसी गहन अर्थ का परिचायक प्रतीत होता है। स्वामी मुक्तानन्द जी ने कहा कि जो आत्मा का दान करता है उसका कल्याण होना सुनिश्चित है। स्वामी जी ने एक उदाहरण दिया और कहा कि कुछ लोग अपराध करते हैं और पुलिस को जानकारी हो जाने पर वह आत्म समर्पण कर देते हैं। पहले वह अपनी इच्छा के अनुसार पाप व अपराध कर्मों को करते हैं परन्तु जब उनका वश नहीं चलता तो उन्हें आत्मसमर्पण करना पड़ता है। इस आधार पर स्वामी जी ने कहा कि अपनी आत्मा का दान वह होता है कि जब मनुष्य परमात्मा की इच्छा के अनुसार कार्य व पुरुषार्थ करता है। स्वामी जी ने कहा कि आत्मा का दान करने पर हम मनमानी नहीं कर सकते। हमें ईश्वर की इच्छा व आज्ञाओं का पालन करना होता है। आत्मा का दान करने पर हमें परमात्मा की इच्छा के विपरीत अपनी इच्छाओं को छोड़ना होगा। यही आत्मा का दान है। प्रत्येक व्यक्ति को स्वाध्याय करना होगा। सत्यार्थप्रकाश का प्रत्येक व्यक्ति को स्वाध्याय करना चाहिये। स्वामी मुक्तानन्द जी ने आचार्य सत्यानन्द वेदवागीश जी का उल्लेख कर बताया कि उन्होंने बताया था कि वह वृद्धावस्था में भी प्रतिदिन सत्यार्थप्रकाश के पांच-छः पृष्ठों का स्वाध्याय करते थे। हम जो पढ़ते हैं उसे पढ़कर बोलने की इच्छा होती है। आप जो पढ़े व जाने, उसे न जानने वालों को बतायें।

स्वामी मुक्तानन्द जी ने कहा कि स्वाध्याय व प्रवचन जीवन में चलते रहना चाहिये। ध्यान साधना नियमित करनी चाहिये। आपको यह ध्यान रखना चाहिये कि क्या आप लक्ष्य के निकट पहुंच रहे हैं या नहीं? इस विषय का चिन्तन करते रहना चाहिये। हमें सबको प्रत्येक दिन यज्ञ, ध्यान एवं स्वाध्याय करना है। स्वामी जी ने कहा कि तपोवन आश्रम में चतुर्वेद पारायण यज्ञ का कार्यक्रम बहुत अच्छा चला। उन्होंने स्वामी चित्तेश्वरानन्द सरस्वती जी के व्यवहार की प्रशंसा की। स्वामी मुक्तानन्द जी ने स्वामी विशुद्धानन्द जी के व्यवहार की भी प्रशंसा की। अन्त में उन्होंने सबका धन्यवाद किया।

स्वामी मुक्तानन्द जी के सम्बोधन के बाद गुजरात से आये एक 81 वर्षीय साधक श्री सत्यदेव मुनि ने अपने विचार प्रस्तुत किये। वह हिन्दी नहीं बोल पाते। इसलिये उन्होंने गुजराती भाषा में सम्बोधित किया। उन्होंने कहा कि उन्होंने कुछ समय पूर्व मंझावली में स्वामी चित्तेश्वरानन्द जी के एक शिविर में भाग लिया था। वह वहां पूरे शिविर में रहे थे। उन्हें इन दोनों स्थानों पर विशेष आनन्द की प्राप्ति हुई थी। इस आश्रम का उनका यह दूसरा शिविर था। श्री सत्यदेव मुनि अहमदाबाद से 120 किमी. दूर रहते हैं। उन्होंने कहा कि आज मुझे बहुत आनन्द की प्राप्ति हुई। इतना आनन्द उन्हें जीवन में पहले कभी नहीं मिला। श्री सत्यदेव जी ने यह भी बताया कि वह केवल 6 मास ही स्कूल में पढ़े हैं। वह एक अनपढ़ व्यक्ति ही हैं। आश्रम के मंत्री श्री प्रेमप्रकाश शर्मा ने स्वामी चित्तेश्वरानन्द जी के विषय में बताया कि उनके आर्थिक सहयोग एवं प्रेरणा के परिणामस्वरूप ही आश्रम में विस्तृत बाउण्ड्रीवाल, वृहद यज्ञशाला, एक सभागार आदि सुविधायें आश्रम में निर्मित हुई हैं। स्वामी जी समय समय पर यहां चतुर्वेद पारायण यज्ञ एवं शिविरों का आयोजन करते हैं जिससे इस स्थान की शोभा बढ़ी है।

इसके बाद स्वामी चित्तेश्वरानन्द सरस्वती जी का व्याख्यान हुआ। उन्होंने कहा कि हम सब मनुष्यों व प्राणियों के शरीरों को परमात्मा ने बनाया है। संसार में हम जो भी अपौरुषेय रचनायें देखते हैं वह सब भी उसी ने बनाई हैं। सब मनुष्य आदि प्राणियों की मुखाकृति प्रायः समान है। पूरे ब्रह्माण्ड में ईश्वर रचित मानव आदि प्राणियों शरीरों की रचना भी समान है। मनुष्यों की आकृति व रंग में थोड़ा अन्तर हो सकता है। स्वामी जी ने कहा कि आत्मा की पहचान शरीर से होती है। शरीर बनाकर परमात्मा हमें अनेक प्रकार के वंशों, परिवारों तथा गोत्रों आदि में जन्म देते हैं। हमें किस लोक व स्थान पर जन्म लेना है, इसका चुनाव भी परमात्मा स्वंय करते हैं। परिवार, कुल तथा माता-पिता का चुनाव भी परमात्मा ही करते हैं। आत्मा के कर्माशय से यह सब मिलते हैं। हम इस ब्रह्माण्ड में सदा से हैं और सदा रहेंगे। हर जीवन में आत्मा की परिस्थितियां बदलती रहती हैं। हम कई बार मुक्ति में भी गये हैं। आत्मा और परमात्मा का अस्तित्व सदा से है। परमात्मा एक चेतन सत्ता है तथा हमारा शरीर, मन व बुद्धि त्रिगुणात्मक प्रकृति के कार्य हैं। कार्य नाशवान होता है। सृष्टि का सारा तन्त्र परमात्मा ने बनाकर दिया है। ईश्वर सब प्राणियों का पालन कर रहा है। शरीरों में अनेकानेक क्रियायें होती रहती हैं। परमात्मा की कृपा से सब क्रियायें चलती हैं। परमात्मा ही हमारे जीवन का सार है। सृष्टि की सारी व्यवस्थायें भगवान करते हैं। स्वामी जी ने आगे कहा कि ईश्वर सर्वव्यापक है। वह हमारा सबसे निकटतम है। उसकी निकटता को अनुभव करने का प्रयास करना ही उपासना होती है। हमारे अज्ञान के कारण परमात्मा हमसे दूर है। ज्ञान से वह जाना जाता है और प्राप्त किया जाता है।

स्वामी चित्तेश्वरानन्द सरस्वती जी ने कहा कि परमात्मा प्रति क्षण हमारे साथ है। हम अपनी अज्ञानता के कारण उसके साथ नहीं जुड़ पाते। हमें परमात्मा की उपासना करनी है। धन व सम्पत्ति से संसार में आज तक कोई मनुष्य तृप्त नहीं हुआ। स्वामी जी ने धन से प्राप्त साधनों यथा महंगी कार व बंगला व उनके नाश होने पर उसके स्वामी को होने वाले दुःख का एक उदाहरण भी दिया। स्वामी जी ने कहा कि हम प्रतिदिन मृत्यु के समाचार सुनते व पढ़ते हैं परन्तु उन मृतकों से सम्बन्ध न होने के कारण हम दुःखी नहीं होते। जिनका मरने वालों से ममत्व होता है वही दुःखी होते हैं। किसी वस्तु से जब मेरापन का संबंध जुड़ जाता है तब उसका वियोग व क्षति होने पर हम दुःखी होते हैं। स्वामी चित्तेश्वरानन्द जी ने कहा कि हमारे सारे सम्बन्ध अस्थाई हैं। यह सम्बन्ध सच्चे हैं झूठे नहीं हैं। सभी सम्बन्ध नितान्त अस्थाई हैं। इस सृष्टि में हमारे इस जन्म से पूर्व अनन्त जन्म हो चुके हैं। हमारी असंख्य मातायें हो चुकी हैं जिन्हें हम बार बार मृत्यु होने के कारण भूल चुके हैं। स्वामी जी ने कहा कि हमारा जीवन बहुत लोगों के सहयोग से चलता है। स्वामी जी ने आगे कहा कि मैं संसार में अकेला आया हूं और मुझे अकेला ही यहां से जाना है। हमें जीवन में अपने आत्म-कल्याण को सामने रखना है। हमें उन्हीं कार्यों को करना है जिनसे हमारा मंगल होता है। स्वामी जी ने प्रेरणा की कि हमें अपने जीवन के प्रत्येक कार्य को बहुत सोच विचार कर करना चाहिये। तभी हम मनुष्य कहलाने के अधिकारी होंगे। स्वामी जी ने कहा कि मनन अर्थात् सत्य व असत्य का विचार कर काम करने वाला व्यक्ति ही मनुष्य होता है। अपने सम्बोधन को विराम देते हुए स्वामी चित्तेश्वरानन्द सरस्वती जी ने कहा कि हमने यहां शिविर व वेद पारायण यज्ञ में जो सीखा है उसे घर जाकर भी जारी रखना है। इसके बाद स्वामी साधकों को मोेतियों की मालायें बांटी। सबने मिलकर शान्ति किया और इसी के साथ 20 दिवसीय चतुर्वेद पारायण यज्ञ एवं शिविर का समापन हो गया। इसके बाद सबने मिलकर भोजन किया। भोजन कर साधक सभी अपने अपने घरों को जाने लगे। कुछ देर बाद हम भी अपनी एक्टिवा गाड़ी से अपने घर पहुंच गये। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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