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भारतीय संस्कृति

वेद में नारी का सर्वाधिक गौरव गान है

ओ३म्
-नारी दिवस पर-

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सृष्टि का आदि ग्रन्थ कौन सा है? इसका उत्तर है चार वेद ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद सृष्टि के आदि ग्रन्थ है। इन ग्रन्थों की रचना कैसे व किससे हुई? इसका उत्तर है कि वेद परमात्मा का ज्ञान है जो उसने मनुष्य जाति के कल्याण के लिए सृष्टि के आरम्भ में 1.96 अरब वर्ष पूर्व अमैथुनी सृष्टि में उत्पन्न चार ऋषियों अग्नि, वायु, आदित्य और अंगिरा को दिया था। वेद सम्पूर्ण ज्ञान है जिसको पढ़कर व समझकर मनुष्य अपने जीवन में सर्वांगीण उन्नति कर सकता है। संसार के सभी ग्रन्थ सत्यासत्य एवं विद्या-अविद्या से युक्त हैं परन्तु वेद सृष्टिकर्ता ईश्वर का निज ज्ञान होने से असत्य एवं अविद्या से सर्वथा मुक्त है। वेदों में जो कुछ वह सर्वथा सत्य एवं प्रामाणिक अर्थात स्वतः प्रमाण है। वेद ही संसार के सभी मनुष्यों का धर्म एवं कर्तव्य है। सृष्टि की आदि से महाभारत युद्ध पर्यन्त और उसके बाद तथा अब भी मनुष्यों का धर्मग्रन्थ केवल वेद ही है। वेद की वेदानुकूल सत्य टीकायें एवं व्याख्या ग्रन्थ भी मान्य एवं अनुकरणीय हैं। वेद से महत्वपूर्ण संसार का कोई ग्रन्थ नहीं है। अन्य सभी ग्रन्थ मनुष्यों ने अपनी अल्पज्ञता वा अल्पज्ञान से लिखे व लिखवायें हैं अथवा कुछ का मनुष्यों के समूहों ने संकलन किया है। वेद हैं तो सभी ग्रन्थों का पुनः लेखन व रचना की जा सकती है परन्तु यदि वेद नहीं हैं तो वेदों की रचना संसार के 7 अरब मनुष्य मिलकर भी नहीं कर सकते। यह बात विचार, युक्ति व तर्क से सिद्ध होती है।

संसार के आदि ग्रन्थ वेदों में नारी के विषय में क्या विचार हैं? इसका उत्तर है कि वेद में नारी के प्रति बहुत उत्तम व आदर्श विचार हैं। अन्यत्र जहां भी नारी के प्रति जो अच्छे विचार मिलते हैं वह वेद से ही वहां पहुंचे है। इसे इस प्रकार भी कह सकते हैं कि नारी विषयक सभी उचित, सार्थक, लाभकारी व उत्तम विचार वेदों की ही देन हैं। अतः हमें वेद की ही शरण में जाकर इस विषय को जानना चाहिये और वेदों के आगे अपना सिर झुकाना चाहिये। अथर्ववेद में नारी ब्रह्म पूजिका बताते हुए कहा है कि तू प्रत्येक कार्यारम्भ के पूर्व, पश्चात्, मध्य में, अन्त में, सब समय ब्रह्म को स्मरण रख। गृहाश्रम की आधिव्याधि-रहित देवपुरी में पहुंचकर मंगलमयी और सुखकारिणी होती हुई पतिगृह में विशेष दीप्ति से चमक।

ऋग्वेद के मन्त्र 10-85-46 में नारी को सम्राज्ञी बताया गया है। वेद कहता है कि तू श्वशुर की दृष्टि में सम्राज्ञी हो, सास की दृष्टि में सम्राज्ञी हो, ननद की दृष्टि में सम्राज्ञी हो तथा देवरों की दृष्टि में सम्राज्ञी हो। अथर्ववेद का मन्त्र 14-2-27 नारी को सुखदात्री बताता है। इस मन्त्र में कहा गया है कि श्वशुर जनों को सुख दे, पति को सुख दे, परिवार को सुख दे, सब प्रजा को सुख दे। इन सबकी यथायोग्य सेवा एवं पुष्टि करती रह।

अथर्ववेद में नारी की प्रशस्ति में बहुत कुछ कहा गया है। हम कुछ बातें यहां प्रस्तुत कर रहे हैं। एक स्थान पर कहा है पत्नी पति से मधुर और शान्त वाणी बोले। पति पत्नी के प्रति मधुर और चारुभाषी हो। नारी को शुभ कर्मों में लगाओ। आओ, वधू का मार्ग सुखदायी बनायें। श्रेष्ठ पत्नी बनकर देवजनों का सत्कार कर। सुमंगली बन, गृहस्वामियों को तरा। हे नारी, सूर्यप्रभा के समान विश्वरूपा और महती बन। पत्नियों से बुना वस्त्र हमारे शरीर को सुखकर हो। पति-पत्नी चकवा-चकवी के समान परस्पर प्रेम करें। अथर्ववेद के चैदहवें काण्ड में कहा गया है कि हे नववधू, प्रबुद्ध हो, सुबुद्ध हो तथा जागरूक रह।

वेदों में नारी की गौरवपूर्ण स्थिति का विस्तृत वर्णन वेदों के सुप्रसिद्ध विद्वान डा. आचार्य रामनाथ वेदालंकार जी ने अपनी सुप्रसिद्ध पुस्तक ‘वैदिक नारी’ में किया है। हम उनके कुछ विचार प्रस्तुत कर रहे हैं। वह लिखते हैं कि वेदों में नारी की स्थिति अत्यन्त उच्च, गौरवमयी और पूजास्पद है। तुलनात्मक दृष्टि से देखने पर हम इस परिणाम पर पहुंचते हैं कि वेदों में जैसी गौरवास्पद स्थिति नारी को प्राप्त है, वैसी संसार के अन्य किसी धर्मग्रन्थ में नहीं मिलती। वेद में उसे पति के समकक्ष रखा गया है। जैसे पत्नी के लिए पति आदर और स्नेह के योग्य है, वैसे ही पत्नी भी पति के लिए सम्मान और स्नेह की पात्र है। वेद की दृष्टि में पत्नी ही वस्तुतः घर है। वेद में पति और पत्नी दोनों को दम्पति अर्थात् दम-पति अर्थात् घर के स्वामी कहा गया है। ‘वैदिक इण्डैक्स’ के लेखक मैकडानल और कीथ इस शब्द के विवरण मे लिखते हैं कि द्विवचनान्त रूप में पति-पत्नी दोनों के लिए ‘दम्पती’ शब्द का प्रयोग यह सूचित करता है कि ऋग्वेद के समय तक पत्नी को बहुत उच्च स्थान प्राप्त था।

आज महिला दिवस को दृष्टिगत रखकर हमने कुछ अति संक्षिप्त विचार यहां प्रस्तुत किये हैं। इसका तात्पर्य वेदों का महत्व बताने के साथ नारी को वेदाध्ययन की प्रेरणा करना है। महर्षि दयानन्द ने सभी नारियों एवं शूद्र वर्ण के भाईयों को वेदाध्ययन का अधिकार दिया था। जब नहीं था तो लोग शिकायत करते थे। अब अधिकार है तो वेदों का अध्ययन नहीं करते। यह स्थिति चिन्तनीय है।

हमारे उपर्युक्त सभी विचार आचार्य रामनाथ वेदालंकार जी की पुस्तक ‘वैदिक नारी’ पर आधारित है। उनकी पावन स्मृति को प्रणाम, आभार एवं धन्यवाद। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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