कोयले की दलाली में घिरी सरकार

प्रमोद भार्गव
कोयला खदानों के आवंटन में हुए घोटाले में सरकार घिरती नजर आ रही है। इस घोटाले की जांच के सिलसिले में सीबीआई द्वारा शीर्ष न्यायालय में पेश की जाने वाली रिपोर्ट के परिप्रेक्ष्य में कानून मंत्री अश्विनी कुमार व सीबीआई के प्रमुख अधिकारियों के बीच हुई बैठक मनमोहन सिंह सरकार के लिए संकट का नया सबब बनकर उभरी है। कानून मंत्री की ओर से सीबीआई पर दबाव डाला जा रहा है कि वह अपनी ताजा रिपोर्ट में इस बात को दर्ज करे कि कोयला खदान आवंटन पर 8 मार्च 2013 को दी गई रिपोर्ट के बावत सरकार से कोई सलाह मशविरा नहीं हुआ है
जबकि हकीकत यह है कि रिपोर्ट न केवल कानून मंत्री को दिखाई गई बल्कि प्रधानमंत्री कार्यालय के अधिकारियों को भी दिखाई गई और इसमें कुछ संशोधन भी किए गए। क्योंकि जिस समय इन खदानों का आवंटन किया गया उस समय कोयला मंत्रालय का प्रभार प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह खुद देख रहे थे। जबकि न्यायालय के सीबीआई को निर्देश है कि वह जांच रिपोर्ट गोपनीय बनाये रखते हुए सीधे अदालत में पेश करें।
भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (कैग) का पद संवैधानिक है। जिसकी सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति जैसी गरिमा है। लिहाजा उसने कोल खण्डो के आवंटन से जुड़ा जो ऑडिट रिपोर्ट दी थी और यदि आशंकाएं जताई थी तो उनके अर्थ गंभीरता से लेने की जरूरत थी। सरकार केवल यह जुमला छोड़ कर बरी नहीं हो सकती कि नीति पारदर्शी थी और उसमें कोई गलती नहीं हुई है। वैसे नीतियां तो सभी पारदर्शी और जन कल्याणकारी होती है, लेकिन निजी स्वार्थपूर्तियों के लिए उन पर अपारदर्शिता का मुलल्मा चढ़ाकर ही भ्रष्टाचार के द्वार खोले जाते हैं। अपारदर्शिता और अनीति का यही खेल कोल खण्डो के आबंटन में बरता गया और पलक झपकते ही चुनिंदा निजी कंपनियों को 1.86 लाख करोड़ रूपये का लाभ पहुंचा दिया। कोयले की इस दलाली में काले हाथ प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह के ही हुए हैं, यही कारण है कि जांच रिपोर्ट में हेरा फेरी कराई जा रही है। इससे यह मामला अब बेहद संवेदनशील हो गया है। क्योंकि जो दस्तावेज बतौर साक्ष्य सामने आ रहे हैं उनसे इस बात की पुष्टि हो रही है कि आवंटन पक्षपातपूर्ण व मनमाने ढंग से हुआ है। कई कंपनियों ने झूठी जानकारियां देकर खदानें ले ली और सरकार ने इनके द्वारा पेश दस्तावेजों का सत्यापन भी नहीं किया है। नतीजतन 12 कंपनियों के खिलाफ आपराधिक मामले भी दर्ज कर दिये गए।
मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री रहते हुए देश भर में भूसंपदा के रूप में फैले कोयले के ये टुकड़े बिना किसी नीलामी के पूंजीपातियों को बांट दिये गए। जबकि कोयला सचिव ने नोटशीट पर बाकायदा टीप दर्ज की थी कि प्रतिस्पर्धी बोलियों के बिना महज आवेदन के आधार पर खदानों का आबंटन किया गया तो इससे सरकारी खजाने को बड़ी मात्रा में नुकसान होगा। हुआ भी यही। अब कैग ने तय कर दिया कि देश मे अब तक का सबसे बड़ा धोटाला 1.76 लाख करोड़ रूपय का 2जी स्पेक्र्ट्रम का था और अब यह कोयला घोटाला 1.86 लाख करोड़ रूपये का हो गया।
2003 में जब पहली बार मनमोहन सिंह देश के प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने कोयला मंत्रालय अपने ही अधीन रखा। 2004 में सरकार ने नीलामी के जरिए कोल खंड देने का फैसला किया। लेकिन इस हेतु न तो कोई तौर तरीके बनाए और न ही कोई प्रक्रिया अपनाई। लिहाजा प्रतिस्पर्धा बोलियों को आमांत्रित किए बिना ही निजी क्षेत्र की कंपनियों को सीधे नामंकन के आधार पर कोल खण्ड आबंटित किए जाने लगे। देखते – देखते 2004 – 2009 के बीच रिपोर्ट के मुताबिक 342 खदानों के पट्टे 155 निजी कंपनियों को दे दिए गए। कैग ने अभी केवल 194 कोल खण्डों की जांच की है। जिनमें 25 नामी कंपनियां तो ऐसी हैं जिन्हें औने – पौने दामों में सीधे नामांकन के आधार पर कोल खंड दिए गए हैं। इनमें एस्सार पावर, हिंडालको इंइस्ट्रीज, टाटा स्टील, टाटा पावर और जिंदल पावर व जिंदल स्टील के नाम शामिल हैं। इनके साथ ही संगीत कंपनी से लेकर गुटखा, बनियान, मिनरल वाटर और समाचार पत्र छापने वाली कंपनियों को भी नियमों को धता बताकर कोल खंड आबंटित किए गए। इनमें जिन के लिए अनुबंध में नए ऊर्जा संयंत्र लगाने का वायदा किया था, उनमें से किसी ने नया उर्जा संयंत्र नहीं लगाया। इसके उलट निजी कंपनियों को कोल खंड देने के ये दुष्परिणाम देखने में आए कि जिन कोयला खदानों में निजीकरण होने से पहले आठ लाख मजदूर व कर्मचारी रोजगार पाते थे, उनमें घट कर ये तीन लाख रह गए। जाहिर है, खदानों में मशीनीकरण बढ़ाकर सिर्फ प्राकृतिक संपदा का अंधाधुध दोहन किया गया। कैग ने अपनी रिपोर्ट में 2010 – 2011 में कोयले के हुए उत्खनन और मूल्य के आधार पर नुकसान का औसत आकलन किया है। कोल खंडो से इस दौरान 17.40 अरब टन कोयला का उत्पादन किया गया। जिसका औसत मूल्य 1.86 लाख करोड़ रूपए बैठता है।
जाहिर है गड़बड़ियां जानबूझकर कुछ लोगों को लाभ पहुंचाने की दृष्टि से की गईं। अब यदि सरकार सीबीआई जांच में हस्तक्षेप करती है तो इसका अर्थ यही निकलेगा कि वह अपने काले कारनामों को छिपाने का प्रयास कर रही है।

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