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खतरनाक संकेत: चीन की भारतीय सीमा में घुसपैठ

चीन की सेना पिछले दिनों जम्मू कश्मीर में लद्दाख के दौलत बेग ओल्डी में दस किलोमीटर भारतीय सीमा के अन्दर घुस आई और उसने वहाँ तम्बू लगा कर अपनी एक चौकी स्थापित कर ली । इस क्षेत्र में उसने अक्साई चिन क्षेत्र पर 1950 के आस पास ही क़ब्ज़ा कर लिया था , लेकिन तब भी भारत सरकार ने चीन की इस हरकत को गम्भीरता से नहीं लिया था और चीन से मैत्री बढ़ाने के अपने प्रयास निरन्तर जारी रखे थे । लेकिन आख़िर देश में इस बात की चर्चा तो हो ही रही थी कि चीन ने भारत के अक्साई चिन क्षेत्र पर क़ब्ज़ा कर लिया है और भारत सरकार क्या कर रही है ? उस समय के प्रधानमंत्री ने देश के लोगों को समझाने की कोशिश की थी कि उन्हें इस मामूली घटना पर बहुत ज़्यादा उत्तेजित नहीं होना चाहिये , क्योंकि जिस ज़मीन पर चीन ने क़ब्ज़ा किया है , वहाँ घास का तिनका तक नहीं उगता । कम्युनिस्ट पार्टी थोड़ा इससे भी आगे गई । उसने कहा , यह क्षेत्र ही चीन का है , इसलिये लोगों को उत्तेजित होने की ज़रुरत नहीं है । चुनांचे दोनों ने देश को यह समझाने की कोशिश की , कि चीन से मैत्री ज़्यादा ज़रुरी है , इसलिये इन छोटी मोटी घटनाओं को नज़रअन्दाज़ कर देना चाहिये । लेकिन सरदार पटेल , संसार त्यागने से पहले नेहरु को भी और देशवासियों को भी बता गये थे कि चीन पर विश्वास करना उचित नहीं होगा  वह समय पाकर भारत पर आक्रमण करेगा । साम्यवादियों को कुछ समझाने की ज़रुरत ही नहीं थी क्योंकि उनकी दृष्टि में तो सरदार पटेल प्रतिक्रियावादी और पूँजीपतियों के एजेंट थे । नेहरु पर सरदार पटेल के समझाने का कोई असर नहीं होने वाला था , क्योंकि वे ज़िन्दा पटेल को ही इन मामलों में दख़लन्दाज़ी का अधिकार देने को तैयार नहीं थे , उनके मरने के बाद उनकी सलाह मानेंगे , यह आशा करना व्यर्थ ही था । उसका जो परिणाम निकल सकता था वही निकला । 1962 में चीन ने भारत पर हमला कर दिया और बहुत सा इलाक़ा जीत कर अपने क़ब्ज़े में कर लिया । अलबत्ता स्टैंड चीन का तब भी वही था और अब 2013 में भी वही है कि भारत और तिब्बत के बीच सीमा का निर्धारण अभी नहीं हुआ है । भारत का उस समय यह कहना था कि मैकमोहन रेखा से सीमा निर्धारण हो चुका है । चीन उस समय भी और अब भी भारत तिब्बत सीमा को भारत चीन सीमा कहता है । उसने 1950 में ही तिब्बत पर क़ब्ज़ा कर लिया था । पटेल ने उस समय भी नेहरु को लिखा था कि तिब्बत की सहायता करनी चाहिये क्योंकि यदि चीन ने तिब्बत पर क़ब्ज़ा कर लिया तो वह हमारा पड़ोसी बन जायेगा । चीन जैसे देश के पड़ोसी बन जाने का क्या परिणाम होता है , यह हम 1962 से अब तक भोग ही रहे हैं ।
चीन ने आज पहली बार भारत की सीमा का अतिक्रमण किया हो , ऐसा नहीं है। अरुणाचल प्रदेश में तो वह , वहाँ के दिवंगत मुख्यमंत्री दोर्जी खांडू के अनुसार साल में सैकडों बार चीन सीमा का अतिक्रमण करता है । लद्दाख में पिछले कुछ अरसे से वह सक्रिय हुआ है । अग्रिम क्षेत्रों में वह सड़क बना रहे मज़दूरों को पीटता है । वहाँ किसी प्रकार का विकास कार्य नहीं होने देता । मीडिया और राज्य सरकार जब केन्द्र सरकार का इस ओर ध्यान आकर्षित करती है तो केन्द्र सरकार का यही कहना होता है कि यह स्थानीय मामला है , इसको तूल देने की ज़रुरत नहीं है ।
लेकिन इस बार स्थिति में एक परिवर्तन देखा जा सकता है । अब भारत सरकार ने भी वही भाषा बोलनी शुरु कर दी है , जो चीन बोलता है । विदेशमंत्री सलमान ख़ुर्शीद आलम ने भी कहा है कि दोनों देशों के बीच सीमा निर्धारण नहीं हुआ है , इस लिये कई बार भ्रम हो जाता है । अब ख़ुर्शीद साहिब से कोई पूछे कि भारतीय सेना को तो कभी भ्रम नहीं होता , बार बार चीन की सेना को ही भ्रम क्यों होता है । और भी , यह सफ़ाई तो चीन के विदेशमंत्री को देनी चाहिये , आप किस ख़ुशी में यह सफ़ाई दे रहे हैं ? आप विदेश मंत्री भारत के हैं , और सफ़ाई चीन की दे रहे हैं । लेकिन चीन ने अपनी स्थिति स्पष्ट कर दी । उसने कहा कि उसकी सेना को कोई भ्रम नहीं हुआ है । यानि चीन पूरी योजना और लम्बी रणनीति के तहत दौलत बेग ओल्डी में आया है । इतना ही नहीं बल्कि उसने उस क्षेत्र में दो दिन पहले भारत की वायु सीमा का भी उल्लंघन करके अपने भविष्य के इरादे भी साफ़ कर दिये हैं । जिस तरह पिछले कुछ अरसे से चीन ने सभी प्रमुख राजनैतिक पार्टियों के प्रतिनिधि बीजिंग बुलाने शुरु किये थे और उन प्रतिनिधि मंडलों के सदस्यों ने वापिस आकर चीन की प्रगति का आल्हा ऊदल गा गाकर देश में चीन का आतंक ज़माने का प्रयास शुरु कर दिया था , उससे ही चीन की रणनीति समझने वालों को अंदेशा होने लगा था । दिल्ली में दक्षिण ब्लाक में जब चीन की मैत्री भारत के लिये कितनी ज़रुरी है और उसके लिये क्या क्या प्रयास किये जाने चाहिये , इसकी धुन बजनी शुरु हो जाये , जो पिछले कुछ अरसे से बाकायदा बज रही थी , तो समझ में आ जाना चाहिये था कि चीन कुछ शरारत करने बाला है । 1962 में उस समय के रक्षा मंत्री कृष्णा मेनन और बीजिंग में भारत के राजदूत सरदार के एम पणिक्कर इसी प्रकार की हरकतें करते देखे गये थे और चीन ने हमला कर दिया था ।
लद्दाख में भारत के भीतर आकर चीन की मुक्ति सेना द्वारा अपनी चौकी स्थापित कर लेने की घटना से दो प्रश्न उत्पन्न होते हैं । पहला यह की क्या भारत की सेना चीन को वह चौकी हटा लेने के लिये विवश करने में सक्षम है ? यदि है तो यह प्रसन्नता की बात है और उसे उसके लिये सभी राजनैतिक व कूटनीतिज्ञ प्रयास कर लेने चाहिये । उन में एक महत्वपूर्ण तरीक़ा सलमान ख़ुर्शीद की चीन यात्रा रद्द करना भी हो सकता है । चीन के प्रधानमंत्री भी भारत में सद्भावना यात्रा पर आने वाले हैं । यह भी हो सकता है कि चीन सरकार ने भारतीय सीमा के भीतर जन मुक्ति सेना भेजने के लिये समय का चयन अपने प्रधानमंत्री की भारत यात्रा को ध्यान में रखकर ही चुना हो । भारत से सद्भावना बढ़ाने का यह चीन का पुराना तरीक़ा है । और भारत ने कभी इस पर आपत्ति भी नहीं की । लेकिन भारत सरकार को इस बार इस चीनी तरीक़े पर आपत्ति दर्ज करवानी चाहिये और चीनी प्रधानमंत्री की यात्रा स्थगित कर देनी चाहिये ।
लेकिन इस घटना से जुड़ा दूसरा प्रश्न ज़्यादा महत्वपूर्ण है । क्या भारत की सेना चीनी सेना की इस प्रकार की आक्रामक गतिविधियाँ रोकने में सक्षम नहीं है ? यदि इस प्रश्न का उत्तर हाँ में है तो यह सचमुच चिन्ता का विषय है । ख़ासकर तब जब 1962 में चीन ने सीमा को लेकर अपने इरादे ही नहीं बल्कि अपने तरीक़ों की भी सार्वजनिक रुप से घोषणा कर दी थी । तब भी भारत सरकार ने चीन का सामना करने के लिये तैयारी क्यों नहीं की ? चीन ने गोर्मों से लेकर ल्हासा तक रेलमार्ग का निर्माण कर लिया और दिल्ली अभी भी हिमाचल से होते हुये लेह तक रेलमार्ग बनाने में हिचकचाहट दिखा रही है । चीन वह रेलमार्ग भारत की सीमा तक ला रहा है और भारत सरकार पिछले दस साल में भी तेज़पुर से तवांग तक के सड़क मार्ग को चौड़ा नहीं कर सकी । यह केवल लापरवाही नहीं बल्कि देश के प्रति आपराधिक लापरवाही है । इसका उत्तर सरकार को हर हालत में देना होगा । दौलत बेग ओल्डी ने यह प्रश्न उठा दिया है । इसका उत्तर दिये बिना बचा नहीं जा सकता । यह उत्तर उन को तो अवश्य देना होगा जो कल तक दक्षिण ब्लाक में बैठ कर सरकारी खर्चे पर पंचशील की जयन्तियां मना रहे थे चीन की दोस्ती के नाम पर जाम छलका रहे थे । भारत की सेना भी दौलत बेग ओल्डी में चीन की सेना के सामने आ डटी है । लेकिन इस यक्ष प्रश्न का उत्तर दिये बिना सत्ता की गद्दी पर बैठे कर्णधार अब की बार पानी नहीं पी सकेंगे । यह प्रश्न राजनीति का नहीं बल्कि देश की सुरक्षा का है । सरकार को भी इसे राष्ट्रीय समस्या मान कर सभी को विश्वास में लेकर रणनीति बनानी चाहिये । चीन का इतिहास गवाह है कि वह शक्ति की ही भाषा समझता है । दिल्ली को भी इस भाषा का अभ्यास कर लेना चाहिये । साभार

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