शांता कुमार
स्वतंत्रता के लंबे युद्घ में कई लड़ाईयां लड़ी गयीं। क्रांतिकारी वीरों के पिस्तौल व बमों के कई धमाके हुए, पर उन सबको समान महत्व प्राप्त न हो सका। उन सबके पीछे त्याग, तपस्या व बलिदान की भावनाएं यद्यपि एक सी ही थीं तो भी समय की विशेष परिस्थितियों के महत्व के कारण उनमें से कुछ इतिहास गगन के चंद्र सूर्य बन प्रकाशित हुए तो अन्य केवल सितारे बन चमकने लगे। कुछ को इतना अधिक महत्व प्राप्त हुआ कि आज भी उनका नाम लेते ही नवयुवकों की भुजाएं फड़कने लगती हैं। उन्होंने तब के जनमानस को इतना आंदोलित किया कि भारतीय राजनीति की बढ़ती हुई धारा उन घटनाओं से टकराकर एक मोड़ लेने पर विवश हो गयी। इन्हीं क्रांतिकारी धमाकों का परिणाम था कि कांग्रेस के उनके विरूद्घ कुप्रचार के बाद भी देश की समझदार जनता में क्रांति के प्रति सदभावना का वातावरण बना और भारतीय इतिहास के गगन पर गांधीवादी युग का अवरोध करके 1942 की महान क्रांति उभर आई। सन 1942 का जन आंदोलन गांधीवादी न होकर पूर्ण रूप से सशस्त्र क्रांति की धारा का आंदोलन था। यह एक ऐतिहासिक तथ्य है कि सन 1942 की क्रांति ने देश केा अहिंसा के अव्यावहारिक आकाश से उतारकर सशस्त्र क्रांति के वास्तविक धरातल पर ला खड़ा किया। यही कारण था कि गांधी जी ने स्वयं भी 1942 के आंदोलन को अपने सिद्घांतों का आंदोलन नही बताया। यद्यपि इस विषय पर इतिहासकर को अभी गंभीरता से अपनी कलम उठाना बाकी है तो भी अपना यह विश्वास है कि गांधीवाद युग का 1941 में ही पटाक्षेप हो जाता है। उसके बाद स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए सबसे उत्तरदायी है-सन 1942 की जनक्रांति, सुभाषचंद्र का महान प्रयास स्थल, जल तथा वायु सेना के प्रबल विद्रोह तथा इंग्लैंड की अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियों के कारण अपनी विवशता। 1942 के बाद गांधीवादी धारा की एकमात्र देन हमारे पास भारत के विभाजन के रूप में है।
सांडर्स की हत्या के बाद जब भगत सिंह कलकत्ता में रहे तो वहां पर बंगाल के क्रांतिकारियों से संपर्क स्थापित कर उनकी सहायता से पंजाब व उत्तर प्रदेश में बम फैक्टरी लगाने की योजना बनाई गयी। यतीन्द्रनाथ दास विशेष रूप से इसकार्य के लिए भगत सिंह के साथ पंजाब आए। वे बम बनाने के अद्भुत कुशल विशेषज्ञ थे। बमों के निर्माण के साथ साथ क्रांतिकारी क्षेत्रों में यह विचार चक्कर काटने लगा कि विश्व भर के जनमत को भारतवासियों से किये जाने वाली सरकारी यातनाओं की ओर खींचने के लिए कुछ विशेष कार्य किया जाना चाहिए। अंग्रेजी सरकार के दमन व क्रूरता भरे कुशासन के बाद भी भारत की आत्मा इस गुलामी को स्वीकार नही करती। इतना ही नही, इसका विरोध करने के लिए यहां का तारूण्य अपने रक्त की अंतिम बूंद तक बहाने को तैयार है-इन भावनाओं को किसी विशेष कार्य द्वारा प्रदर्शित करने के लिए क्रांतिकारियों के हृदय छटपटा रहे थे।
उन्हीं दिनों केन्द्रीय विधानसभा के दो प्रस्ताव की चर्चा बने हुए थे। एक था-सार्वजनिक सुरक्षा कानून और दूसरा था-औद्योगिक विवाद कानून ये दोनों कानून भारतीयों की ही रही सही स्वतंत्रता का भी अपहरण करने वाले थे। सांडर्स हत्या आदि कुछ घटनाओं से बौखलाकर मानो सरकार किसी भी रूप में बदला लेना चाहती थी। जनता पर होने वाले नरकीय अत्याचारों से उत्पन्न घावों पर मानो सरकार नमक छिड़कने की तैयारी कर रही थी। असेम्बली में कांग्रेस तथा अन्य उदार सदस्यों की बहुसंख्या के कारण इन बिलों का पारित न हो सकना तय था, पर विधानसभा द्वारा अस्वीकृति किये जाने पर भी वायसराय के विशेष आदेश द्वारा सरकार इन्हें पास करने पर तुली हुई थी। मानो सरकार जनतंत्र की भ्रूण हत्या करने का निश्चय कर चुकी थी। हिसप्रस की केन्द्रीय समिति ने इस अवसर पर केन्द्रीय असेम्बली के सदस्यों के बहरे कानों को भारतमाता के करोड़ों पुत्रों को गुरू गंभीर निनाद सुनाने का निश्चय किया। एक फ्रांसीसी क्रांतिकारी ने कहा था कि बहरों को सुनाने के लिए बमों के धमाकों की आवश्यकता होती है। अत: यह तय किया गया कि जनतंत्र की अवहेलना करके वायसराय की आज्ञा से जब प्रस्ताव पारित होने की घोषणा की जाए, ठीक उसी समय असेबली में बम फेंक कर विरोध प्रदर्शित किया जाए। इस बम के धमाके द्वारा क्रांतिकारी बताना चाहते थे कि यदि सरकार जनता के प्रतिनिधियों द्वारा स्वीकृत बिल को अपने शस्त्र बल के आधार पर जनता पर थोप रही है तो जनता भी उसका विरोध शस्त्र बल से करने का सामर्थ्य रखती है। फिर विधानसभा में बैठे अहिंसावादी सदस्यों को वे यह बताना चाहते थे कि उनका अस्तित्व बेकार है क्योंकि उनके बैठे बैठे उनकी इच्छाओं व जनतंत्र की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। अत: ये विधानसभाएं ढोंग हैं। इस अत्याचारी शासन से निपटने का एक ही साधन है कि उससे खुला युद्घ किया जाए।
कार्य समिति ने यह निर्णय किया कि बम फेंकने बम फेंक कर वहां से भाग आएं। इस पर भगत सिंह ने यह कहा कि भागना उचित नही है। बल्कि बम फेंककर वे आत्मसमर्पण करें और बाद में न्यायालय के सम्मुख बम फेंकने के उद्देश्य तथा क्रांतिकारी कार्यों के बारे मं विद्वतापूर्ण वक्तव्य दें। उन दिनों लोगों में क्रांतिकारियों के बारे में कुछ भ्रांतियां फैल रही थीं। लोग उन्हें हिंसा की भावना से पागल छोकरे तथा विकृत मस्तिष्क वाले समझने लगे थे। असेम्बली में बम फेंककर बाद में न्यायालय के द्वारा इन भ्रांतियों को दूर करके अपनी विचारधारा को सारे देश के समाचार पत्रों में प्रकाशित करवाने का अवसर मिल जाएगा।
भगत सिंह के तर्क को बैठक में सब लोगों ने स्वीकार किया। अब इस कार्य के लिए व्यक्ति चुनने की बात सामने आई। भगत सिंह स्वयं जाना चाहते थे, परंतु बैठक में 6 सदस्यों ने इसका प्रबल विरोध किया। उनका कहना था कि दल के भविष्य के लिए चंद्रशेखर आजाद और भगत सिंह का पीछे रहना अत्यंत आवश्यक है। इसलिए उन दोनों में से किसी को भी इस कार्य में नही झोंकना चाहिए। बटुकेश्वरदत्त काकोरी की असफलता के बाद निराश होकर निष्क्रिय हो गया था। जब उसे असेम्बली पर बम फेंकने की योजना का पता चला तो वह तुरंत दिल्ली पहुंचा। उसने क्रोधित होकर साफ शब्दों में आजाद को कहा इतने दिनों से दल से मेरा संबंध तोड़ दूंगा। अंत में बटुकेश्वरदत्त तथा विजयकुमार सिंह को इस कार्य के लिए भेजने का निर्णय हुआ।
सुखदेव पंजाब दल का नेता था। परंतु केन्द्रीय समिति की इस बैठक में वह उपस्थित न था। बैठक के निर्णय की सूचना उसे लाहौर भेज दी गयी। यहां यह बता दिया जाए कि भगत सिंह और सुखदेव में घनिष्ठ मित्रता थी। वे एक दूसरे के लिए प्राण तक देने के लिए तैयार थे। सूचना मिलते ही सुखदेव लाहौर से दिल्ली आया और सीधा भगत सिंह से मिला। उसका विश्वास था कि इस कार्य के लिए एकमात्र उपयुक्त व्यक्ति भगत सिंह है। अपने अध्ययन और योग्यता के आधार पर वही न्यायालय में क्रांतिकारी सिद्घांतों की प्रभावी व्याख्या कर सकता है। भगत सिंह के यह कहने पर कि दल के भविष्य के लिए उसका पीछे रहना बड़ा आवश्यक है, सुखदेव आपे से बाहर हो गया। उसने कहा, यह सब बकवास है। तुम्हारे व्यक्तिगत मित्र की स्थिति से मैं देख रहा हूं कि तुम अपने पांव पर कुल्हाड़ी मार रहे हो। तुम्हारा अहंकार बहुत बढ़ गया है। तुम अपने आपको दल का एकमात्र सहारा समझने लगे हो। सुखदेव बिना रूके ही भावावेश में कहना गया, तुम इस समय मौत का सामाना नही करना चाहते। क्योंकि तुम्हें जिंदगी इस समय बड़ी लुभावनी लग रही है।

क्रमश:

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