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डॉ राकेश कुमार आर्य की लेखनी से

हमारे लायक नही है ये लोकतंत्र

भारत के विषय में बड़े चौंकाने वाली स्थिति है। हमारे किसानों मजदूरों और कारीगरों को उजाड़कर भारत की आर्थिक आजादी को विदेशी कंपनियों के यहां गिरवी रख देने का कुचक्र आर्थिक उदारीकरण के नाम पर और देश के औद्योगिकीकरण के नाम पर बड़े जोर शोर से चल रहा है। चीन, जो कि हमारा सबसे बड़ा शत्रु है और हमें किसी भी रूप में पनपने देना नही चाहता है, हमारे बाजार पर उसका सामान छा गया है। चीन के लिए भारत की बराबर का बड़ा बाजार पूरे यूरोपीयन देशों को मिलाकर बनाने से भी उपलब्ध नही होता इसलिए वह भारत में अपना माल भेज रहा है, और हम चीनी वस्तुओं केा खरीद खरीदकर इस शत्रु देश के सपनों को सफल करते जा रहे हैं। यदि हम चीन से राजीव गांधी और अटल जी के समय में व्यापार बढ़ाने के मामलों में जल्दबाजी नहीं करते तो चीन भारत के साथ अपने सीमा संबंधी विवादों को सुलझाने के प्रति अधिक गंभीर होता। परंतु हमने व्यापार को प्राथमिकता देकर सीमा को दूसरे स्थान पर रख दिया, फलस्वरूप चीन हमसे ही मुनाफा कमाकर हम पर ही गुर्रा रहा है। चीन के विषय में ही ये स्थिति हो ऐसा नही कहा जा सकता, अन्य उदाहरण भी हैं जो कि हम भारतीयों की अपने देश और देश के माल के प्रति उपेक्षा भाव की ओर हमारा ध्यान आकर्षित करते हैं। जैसे-main_large

-हमारे किसानों से 5-10 रूपये किलो आलू लेकर विदेशी कंपनियां लेज और चिप्स बनाकर उसे 400 रूपये प्रति किलो तक बेच रही है,

-10-20 रूपया प्रति किलो टमाटर लेकर उसे हेज, किस्सान, टोप्स की सॉस के रूप में 250 रूपया प्रति किलो बेचा जा रहा है।

-पनीर 150 रूपया किलो और कोलगेट, पैप्सोडेंट, क्लोज-अप, 300 रूपया प्रति किलो से भी अधिक महंगे हैं।

-दूध 30 रूपया किलो और ढाई रूपया किलो वाली विषैली कोक/पैप्सी 50 रूपया प्रति लीटर।

-देशी घी 350-400 रूपया किलो और फेयर एण्ड लवली, पॉडंस, लैकमे, आदि 1350 रूपया किलो।

-जींस आदि कपडों की लागत से लगभग 250 गुणा अधिक मूल्य वसूला जा रहा है, नाइक, एडीडॉस, प्यूमा, लेविस, मोंटी कालो, सपोर्टकिंग, पीटर-इंगलैंड, रेमण्ड आदि विदेशी कंपनियां के द्वारा।

-नींबू 30-40 रूपया किलो और मिरमेड नींबूज 50-60 रूपया किलो।

-मोबाइल की लागत मूल्य से 100 से 800 गुणा पैसे वसूले जा रहे हैं, नोकिया, सैमसंग, एलजी, मोटोरोला, ब्लैकबेरी, एप्पल आदि विदेशी कंपनियां देश में दिन में डाका डाल रही हैं।

-भारत में लागत से 350 प्रतिशत के लगभग महंगी बेच रही हैं विदेशी कंपनियां बिजली के उत्पाद, इनमें टीवी, फ्रीज, कूलर, वाशिंग मशीन, कंप्यूटर ए.सी. आदि शामिल है।

-इसी प्रकार शराब सिगरेट आदि नशीली चीजें भी दस गुना से भी अधिक मूल्य पर बेची जाती हैं।

इस प्रकार रोजी रोटी छीनकर विदेशियों को हमारे हक की रोटी देने का जुगाड़ करने वाली सरकारें भारत में बेरोजगारों की फौज बढ़ाने में लगी हैं। देश के हालात पूरी तरह ‘क्रांति’ के से हैं। देश के नेता ‘कमीशन बाजी’ के लिए जाने जा रहे हैं और मोटे कमीशन के सामने उनके लिए देश के हित कतई गौण है। विदेशी कंपनियां दूध, दही, घी, फल औषधियां आदि को जीवन के लिए घातक बता रही हैं, ताकि इनके प्रति देश के लोगों का लगाव कम हो और पूरी तरह हमारे ऊपर वो आश्रित हो जाए। इसीलिए दुधारू पशुओं का कत्ल धड़ल्ले से हो रहा है और जल्दी से जल्दी इन पशुओं का प्रजातियां नष्ट हो जाएं। इस बात का पूरा पूरा प्रबंध किया जा रहा है। पशुओं के वध की चिंता सरकारी स्तर पर इसीलिए नही है-क्योंकि विदेशी कंपनियों के कमीशन खोर अधिकारी और राजनीतिज्ञ सरकार में बैठे हैं।

फलत: देश का किसान अपनी उपज का भरपूर लाभ न मिलने पर आत्महत्या कर रहा है। मजदूर वर्ग सड़क पर दम तोड़ रहा है, और कारीगर अपने को असहाय समझकर समुद्र में डूब कर रहे हैं। ऐसी भयावह स्थिति का कारण सभी जानते हैं परंतु उसका उपचार करना नही चाहते हैं क्योंकि कोई भी मुनाफाखोर या कमीशनखोर अपना धंधा चौपट नही करना चाहता है। किसान मरे, मजदूर मरे या कारीगर मरे, इन मुनाफाखोरों और कमीशनखोरों को तो अपने अपने स्वार्थां को साधने की चिंता है।

पूरे विश्व के बिगड़ते पर्यावरण संतुलन के लिए भी ऐसे चंद मुनाफाखोर और कमीशनखोर लोग ही उत्तरदायी हैं। क्योंकि इन लोगों ने विश्व में भौतिकवादी बाजार व्यवस्था को लागू कर शोषण और दमन का जो चक्र इस समय चला रखा है, उससे कितने ही प्राणधारियों की प्रजातियां समाप्त हो गयी है या समाप्ति के कगार पर है। भारत में जो लोग स्वदेशी का राग छेड़ते हैं उन्हें यहां पागल समझने वाले बहुत हैं। ऐसा समझने वाले अक्सर कहा करते हैं कि अंग्रेजों के हम पर भारी उपकार रहे हैं, जो उन्होंने हमें रीलें दी, अच्छे पुल दिये कानून दिया आदि आदि। यदि हालात नही सुधरे तो वह दिन जल्दी ही आ जाएगा जब जंगे आजादी को भी चंद सिरफिरे लोगों की ‘बेवकूफाना हरकत’ सिद्घ करने वाले इसी देश में पैदा हो जाएंगे। भौतिकवाद की विशेषता भी यही है कि इसमें बेटा सबसे पहले बाप को ही मारता है। इसलिए जिन लोगों ने सत्ता संभालकर देश में पश्चिमी संस्कृति, पश्चिमी मान्यताओं और विदेशी कंपनियों को पांव फैलाने का अवसर दिया है, समय आने पर, ये जैसे ही हावी होंगी तो अपने पैरोकारों को ही इतिहास की कब्र से उखाड़कर उनका पुन: शवोच्छेदन करेंगी और देखेंगी कि उनके दिमाग ठीक भी थे या नही, जो उन्होंने यहां से अंग्रेजों को भगाने का मूर्खतापूर्ण कार्य किया? यदि पश्चिम के पैरोकार पश्चिम में जाकर डूब जाते हैं तो इसमें कोई बुरी बात तो नही होगी क्योंकि पश्चिम में जाकर तो सूर्य भी डूब जाता है। पर हम तो पूरब वाले हैं, पश्चिम में डूबने के लिए चलें ही क्यों? इसलिए स्वदेशी से लगाव पैदा कर अपने करोड़ों मजदूरों, किसानों, कारीगरों और दुधारू पशुओं के जीवन के रक्षक बनें। पूरब की विशेषता ही ये है कि वो किसी का भक्षक नहीं होता अपितु सदा रक्षक होता है यही हमारी निजता है, यही अस्मिता है, यही पहचान है और यही हमारी संस्कृति का गौरव है। इस गौरव को मिटाएंगे नही अपितु बढ़ाएंगे आज यही संकल्प लेने की आवश्यकता है।

वास्तव में गलती हमारे नीति नियामकों की होती है, जो अपने कमीशन के चक्कर में गलत नीतियां निर्धारित करते हैं। हम बार-बार अपने किसानों, मजदूरों व कारीगरों को उनकी मेहनत का उचित पारिश्रमिक देने की घोषणाएं और नारे हर चुनाव में सुनते आए हैं, लेकिन नौकरशाही की गलत नीतियों और भ्रष्टाचारपूर्ण कार्यशैली के कारण चुनावों में की गयी घोषणाएं केवल घोषणाएं ही बनकर रह जाती हैं। किसानेां को इस देश में आत्महत्या करनी पड़ रही है तो ऐसा नही है कि इन आत्महत्याओं का कारण सरकार को या सरकार के नीति निर्धारकों को ज्ञात न हो, सब कुछ ज्ञात है लेकिन स्वार्थ की पट्टी बांधकर चलने वाले नौकरशाहों को अपने स्वार्थों के आगे कुछ दीख नही रहा है। क्या हमारा देश दुनिया का सबसे सुंदर लोकतंत्र है, और क्या यह इसलिए सुंदर लोकतंत्र है कि यहां की जनता आराम से अपना कलेजा अपने नेताओं को और अपने अधिकारियों को खाने देती है? लोकतांत्रिक युग में जब लोग अपने अधिकारों के प्रति सर्वाधिक जागरूक होते हैं तब अपने कलेजा को इस प्रकार खाने देना एक सवाल और पैदा करता है कि हम विश्व के सर्वाधिक सुंदर लोकतंत्र हैं या सर्वाधिक निकृष्ट लोकतंत्र के सबसे सुंदर और सबसे अच्छे नागरिक हैं? जनता के अधिकारों को रौंदा जा रहा है या जनता स्वभावत: ऐसा होने दे रही है। दोनों स्थितियां उचित नही कही जा सकतीं। क्योंकि दोनों स्थितियों के रहते देश का भविष्य उज्ज्वल नही कहा जा सकता। फिर तो यही कहा जा सकता है कि हम विश्व के सर्वाधिक सुंदर लोकतंत्र बनने से अभी कोसों दूर हैं। सफर लंबा है और चुनौतियां हमारे सामने खड़ी हैं।

राकेश कुमार आर्य

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