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पर्व – त्यौहार भारतीय संस्कृति

ऋषि जन्मभूमि न्यास में ऋषि बोधोत्सव पर शरीर का सार तत्व मनुष्य की वाणी है : डॉ विनय विद्यालंकार

ओ३म्

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ऋषि दयानन्द जन्मभूमि न्यास, टंकारा-गुजरात में आयोजित ऋषि बोधोत्सव पर्व के प्रथम दिन दिनांक 20-2-2020 को प्रातः 8.30 बजे से न्यास की यज्ञशाला में सामवेद पारायण यज्ञ को जारी रखा गया। यज्ञ के ब्रह्मा आचार्य रामदेव जी थे तथा यज्ञ में मंत्रोच्चार टंकारा गुरुकुल के ब्रह्मचारियों ने किया। यज्ञवेदि पर न्यास के सहयोगी अनेक स्त्री-पुरुष महानुभाव यजमान के रूप में विद्यमान थे। यज्ञ के मध्य हल्द्वानी, उत्तराखण्ड से आमंत्रित वैदिक विद्वान डा. विनय विद्यालंकार जी का व्याख्यान हुआ। डा. विनय जी ने कहा कि आर्यसमाज के कार्यों को बढ़ाने के लिये प्रेरणा ग्रहण करने ऋषिभक्त टंकारा के ऋषि बोधोत्सव पर्व के अवसर पर पधारते हैं। विनय जी से पूर्व आचार्य रामदेव जी ने अपने विचार व्यक्त किये थे। इसे हम एक पृथक लेख में प्रस्तुत कर चुके हैं। डा. विनय जी ने आचार्य रामदेव जी के व्याख्यान की प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि विद्वान कोई नई बात नहीं कहता। महर्षि दयानन्द ने ईश्वर के ज्ञान वेद को हजारों वर्षों बाद शुद्ध रूप मे ंप्रस्तुत किया। आचार्य डा. विनय जी ने कहा कि वेद पाठी और विद्वान पहले भी थे परन्तु वेद के यथार्थ अर्थों को प्रस्तुत नहीं किया जा रहा था। उन्होंने कहा कि दक्षिण भारत के मन्दिरों में ‘शन्नो देवीर्भिष्टये’ लिखा होता है। इसे शनि गृह का मन्त्र बना दिया गया है। यह अनर्थ इस मन्त्र के साथ किया जा रहा है। डा. विनय जी ने कहा कि अपनी कुछ न्यूनताओं के कारण हम देश व समाज तथा अपने निजी जीवन से अज्ञान के अन्धकार को दूर नहीं कर पाये। हमें टंकारा आदि स्थानों पर आकर अपने अन्धकार को दूर करने की प्रेरणा मिलती है।

डा. विनय विद्यालंकार जी ने कहा कि श्री रामनाथ सहगल जी मुझे बेटे शब्द से संबोधित करते थे। उन्होंने कहा कि मनुष्य को ऊर्जा व शक्ति यज्ञ में बैठ कर आहुति प्रदान करने से मिलती है। विद्वान वक्ता ने स्वामी श्रद्धानन्द जी के कार्यों का परिचय भी दिया। उन्होंने कहा कि आर्यसमाज के गुरुकुलों के ब्रह्मचारियों वा स्नातकों ने देश देशान्तर में वैदिक धर्म का प्रचार किया है। डा. विनय विद्यालंकार ने गुरुकुल से जुड़े अपने कुछ संस्मरण सुनाये। उन्होंने कहा कि आचार्य पिता के समान होता है। आचार्य विनय जी ने बताया कि मनुष्य के पांच पिता होते हैं। गुरुकुल तथा वेद को माता बनायेंगे तो हमारा जीवन पूर्ण होगा। यह बात मेरे आचार्य ने हमें कही थी। डा. विनय जी ने कहा कि वह कक्षा 10 तक स्कूली शिक्षा पद्धति से पढ़े हैं। इसके बाद गुरुकुल एटा में अध्ययन किया। आचार्य जी ने कहा कि यदि हमें वैदिक धर्म को बचाना है तो हमें अपने व किसी अन्य के एक बच्चे को गुरुकुल शिक्षा प्रणाली से शिक्षित करना होगा। गुरुकुल में पढ़ा बच्चा आर्यसमाज का सिपाही बनेगा। यदि आप यह काम करेंगे तो आपको प्रसन्नता मिलेगी।

डा. विनय विद्यालंकार जी ने कहा कि जो व्यक्ति अपने जीवन में मैं का विस्तार कर लेता है वह ईश्वर के निकट पहुंचता है। उन्होंने कहा कि हमने मैं व मेरे को संकुचित कर लिया है। इसी का परिणाम है कि हमारी सन्तानें भी हमें छोड़ रही हैं। श्री विनय जी ने कहा कि वेद मन्त्रों से प्रार्थना करते हुए हम ईश्वर को अपने परिवार जनों के निकट आने का आह्वान करते हैं। एक वेदमन्त्र में ईश्वर से प्रार्थना की गई है कि मेरे द्वारा सुना हुआ मेरा हो जाये। यह तब होगा जब वाणी का स्वामी परमेश्वर मेरे निकट होगा। विद्वान आचार्य डा. विनय विद्यालंकार जी ने बताया कि जल समस्त जड़ जगत का सार है। यह बात हमारे शास्त्र हमें बतलाते हैं। जल का सार तत्व वनस्पतियां हैं। यह उपनिषद बताती हैं। वनस्पतियों का सार ओषधियां हैं। आचार्य विनय जी ने कहा कि ओषधि का अर्थ दवायें नहीं हैं। ओषधि जीवन को धारण करने वाले तत्वों को कहते हैं। आचार्य जी ने बताया कि ओषधियों का सार हमारा जीवन है। यह बात उपनिषद का ऋषि बताता है। आचार्य जी ने आगे कहा कि कि शरीर का सार तत्व वाणी है। अथर्ववेद के प्रथम में इस बात को बताया गया है। आचार्य जी ने सत्यार्थप्रकाश के आठवें समुल्लास का उल्लेख कर कहा कि ऋषि ने इस समुल्लास में सृष्टि उत्पत्ति के तीन कारणों निमित्त, उपादान एवं साधारण कारण का उल्लेख कर कहा है संसार में निमित्त कारण दो हैं। मुख्य निमित्त कारण ईश्वर है तथा साधारण निमित्त जीव है। आचार्य जी ने कहा कि समाज में यह कथन प्रचलित है सब कुछ करता कराता परमात्मा है। विनय जी ने कहा कि ऋषि दयानन्द ने सत्यार्थप्रकाश में इस मिथ्या कथन का समाधान किया है। आचार्य जी ने आगे कहा कि ब्रह्माण्ड का मुख्य निमित्त ईश्वर और साधारण निमित्त जीव है।

डा. विनय विद्यालंकार जी ने कहा कि हमारा प्रयास सुधार व निर्माण के लिये होना चाहिये। परमात्मा की वाणी वेद को उन्होंने अमोघ बताया। आचार्य जी ने कहा कि अथर्ववेद के वाचस्पति सूक्त में वाणी के सुधार की प्रेरणा की गई है। आचार्य विनय विद्यालंकार जी ने वाणी के लाभ व महत्व श्रोताओं को बताये। वेदों की प्रार्थना में भक्त परमात्मा से प्रार्थना करता हुआ कहता है कि ईश्वर मेरे हृदय मन्दिर में है। हे ईश्वर! मुझे अपने अस्तित्व का अनुभव कराईये। डा. विनय विद्यालंकार जी ने अपने एक साक्षात्कार का उल्लेख कर कहा कि उनसे वेद के एक मन्त्र के आधार पर पूछा गया था कि वाणी प्रधान है या ईश्वर? यह साक्षात्कार प्रोफेसर पद के लिए हुआ था। विनय जी ने कहा कि जब हमारा मन दिव्य होगा तब हम अपनी वाणी के स्वामी परमेश्वर को बुला पायेंगे। विनय जी ने ऋषि दयानन्द के महान गुणों को स्मरण कराया। ऋषि की शिक्षाओं ने हमारे जीवन को ऊंचा उठाया है और हमारा कल्याण किया है। विद्वान वक्ता ने कहा कि ऋषि दयानन्द का एक-एक निर्देश हमारे पालन करने के लिये है। हमें सन्ध्या करते हुए इस विषय का विचार करना चाहिये कि हम ऋषि के निर्देशों का कितना पालन करते हैं?

आचार्य जी ने श्रोताओं से पूछा कि क्या माता-पिता विवाह के समय अपनी युवा सन्तानों को यह परामर्श व आज्ञा देते हैं कि हम तुम्हारे घर में भोजन तभी करेंगे जब तुम दैनिक यज्ञ करोगे। इसे डा. विनय ने वैदिक धर्म की रक्षा के लिये आवश्यक बताया। विनय जी ने ऋषि भक्तों से पूछा कि सन्ध्या करना आवश्यक क्यों है? आचार्य जी ने कहा कि यदि आप दिन भर ऊर्जा का कुछ भी प्रयोग न करे तो क्या आपको भोजन की आवश्यकता नहीं होगी? भोजन समय पर करना आवश्यक होता है। इसी प्रकार मन में कुविचार न भी आयें तब भी मनुष्य का सन्ध्या अर्थात् ईश्वर का ध्यान व उसका धन्यवाद करना आवश्यक है। डा. विनय विद्यालंकार जी ने कहा कि सन्ध्या न करने से विशेष हानि होती है। सन्ध्या को उन्होंने अति आवश्यक कर्तव्य बताया। उन्होंने कहा कि नित्य कर्मों को करने से विशेष लाभ होता है और न करने से विशेष हानि होती है। नित्य सन्ध्या करने से उपासक का मन शुद्ध एवं पवित्र होता है। आचार्य जी ने कहा कि कि आर्यसमाज बाहर व भीतर दोनों स्वच्छताओं का अभियान चलाता है। उन्होंने कहा कि हम सब ऋषि दयानन्द के ऋणी है। उन्होंने हमें कहां से कहां पहुंचा दिया। डा. विनय जी ने स्वामी श्रद्धानन्द जी का उदाहरण दिया। स्वामी श्रद्धानन्द जी ने स्वतन्त्रता संग्राम में नेतृत्व किया और जामा मस्जिद में जाकर वहां भी वेद मन्त्रों का उच्चारण कर वेदों की ही बातें कही। डा. विनय विद्यालंकार जी ने कहा कि हम अपने मन को दिव्य बनायें। अपनी वाणी को भी वेदानुकूल बनायें। उन्होंने कहा कि मन और वाणी दोनों का परस्पर संबंध है। हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि हम वेदों का स्वाध्याय करें और हमारा स्वाध्याय से ज्ञान हमारे जीवन का अंग बन जाये। इसी के साथ आचार्य विनय जी ने अपनी वाणी को विराम दिया। इसके बाद यज्ञशाला में यज्ञ जारी रहा। डा. विनय जी व्याख्यान के अतिरिक्त अन्य बातों का विवरण हम इससे पूर्व प्रस्तुत लेख में दे चुके हैं। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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