जिस प्रकार हमारा धर्म हमें उत्तम ज्ञानवान बनाना चाहता है उसी प्रकार हमारी मर्यादा हमारे उत्तम ज्ञान को संसार के कल्याण के लिए व्यय कराना चाहती है। वह हमें संसार के कल्याण मार्ग का पथिक बनाकर उत्कृष्ट जीवन जीने के लिए प्रेरित करती है। इस प्रकार इस संगम पर आकर धर्म और मर्यादा एक ही हो जाते हैं। कहने का अभिप्राय है कि धर्म हमारे कृतित्व का और व्यक्तित्व का यदि सैद्घांतिक स्वरूप है तो मर्यादा उसका व्यावहारिक स्वरूप है। राम के पास या कृष्ण के पास जितना वैदिक ज्ञान था-वह उनके धर्म का सैद्घांतिक पक्ष था, पर जो उन्होंने अपने जीवन में जो किया वह उनकी मर्यादा का व्यावहारिक स्वरूप था। आज यदि संसार उन दोनों आप्तपुरूषों को महान मानता है तो उसका एकमेव कारण यही है कि उनके धर्म और मर्यादा में परस्पर संतुलन था-सामंजस्य था। उन्होंने धर्म-मर्यादा चलाकर संसार को लाभान्वित किया।

प्रो. रामविचार एम.ए. महर्षि दयानंद जी महाराज के जीवन की एक घटना का वर्णन करते हुए अपनी पुस्तक ‘वेद संदेश’ में लिखते हैं-‘‘सोरों में स्वामी दयानंदजी महाराज उपदेश कर रहे थे और बीसियों मनुष्य दत्तचित्र होकर श्रवण कर रहे थे। उसी समय वहां एक हट्टा-कट्टा पहलवान सा जाट आ गया। एक मोटा सोटा कंधे पर रखे तथा सरोवर को चीरता फाड़ता सीधा स्वामी जी की ओर बढ़ा। उसका चेहरा मारे क्रोध के तमतमा रहा था।’’ आंखें रक्तवर्ण थीं भौहें तन रही थीं, और माथे पर त्योरी पड़ी हुई थी। होठों को चबाता हुआ और दांतों को पीसता हुआ बोला-‘‘अरे साधु तू ठाकुर पूजा का खण्डन करता है, श्री गंगा मैया की निंदा करता है, देवताओं के विरूद्घ बोलता है। झटपट बता तेरे किस अंग पर सोटा मारकर तेरी समाप्ति कर दूं? ’’

ये वचन सुनकर एक बार तो सारी सभा विचलित हो गयी, परंतु श्री स्वामीजी महाराज की गंभीरता में रत्तीभर भी न्यूनता नही आयी। उनमें क्रोध उत्पन्न नही हुआ। उन्होंने शांत भाव से मुस्कराकर कहा-‘भद्र, यदि तू समझता है कि मेरा धर्म प्रचार करना अपराध है तो इसका अपराधी मेरा मस्तिष्क है, वही मुझसे ये काम कराता है।

तू मेरे सिर पर लाठी मार। यह कहकर उन्होंने अपनी दृष्टि जाट पर डाली। महर्षि की आंखें ज्यों ही उसकी आंखों के सामने हुईं त्यों ही उसका हिंसाभाव लुप्त हो गया। वह चरणों पर गिर पड़ा और अपना अपराध क्षमा कराने लगा। जब साधना अपनी पूर्ण पवित्रता के साथ साधक के सिर पर चढक़र बोलने लगती है तो उसका यही प्रभाव होता है।

छोटे लोग छोटी बातों पर ही झगड़ा कर बैठते हैं, जबकि बड़े लोग बड़ी बातों को छोटी मानकर टाल देते हैं। उनके लिए गंभीर से गंभीर संकट भी कुछ नही होता, उनका धर्म उन्हें धारण किये रखता है, और हमसे गंभीरता का प्रदर्शन कराते हुए मर्यादित रहने का संकल्प कराता है, और ह देखते हैं कि उनका धर्म और उनकी मर्यादा जैसे ही एक साथ जुड़ते हैं, वैसे ही वे आप्तपुरूष संसार के लिए प्रेरणा का स्रोत बन जाते हैं।

कई लोग संसार में स्वाभिमान-स्वाभिमान का रोना रोते रहते हैं और दूसरों की बातों को अपने स्वाभिमान के अनुकूल-प्रतिकूल करके तोलते रहते हैं। यदि कोई बात थोड़ी भी प्रतिकूल जान पड़ती है तो ऐसे लोग स्वाभिमान के नाम पर अभिमान का प्रदर्शन करते हुए लोगों से द्वेषभाव पाल लेते हैं।

ऐसे लोग संसार में कोई धर्म-मर्यादा स्थापित नही कर पाते हैं। इसके विपरीत ये लोग अपने लिए और संसार के लिए अनावश्यक वाद विवादों के कांटे अवश्य बो लेते हैं।

ऋषिदयानंद जैसे लोग संसार में आकर भी संसार में रमते नही हैं। उनकी प्रार्थना में और जनसाधारण की प्रार्थना में आकाश-पाताल का अंतर होता है। उनकी प्रार्थना में लोककल्याण की मर्यादा का और लोकहित का सर्वोपरि कर्त्तव्य भाव (धर्म) छिपा होता है, जबकि साधारण लोगों की प्रार्थना में स्वहित समाहित हो सकता है। वेद के शब्दों में ऐसे महापुरूष कहा करते हैं कि :-

‘‘अहानि शंम्भवन्तु न: श रात्री: प्रतिधीयताम्। शन्न इंद्राग्नी भवतामवोभि: शन्न इंद्रावरूणा रातहव्या। शन्न इंद्रापूषणा वाजसातौ शमिन्द्रा सोमा सुविताय शं यो:।।’’

अर्थात ‘‘हे प्रभो आपकी कृपा से दिन हमारे लिए सुख शान्तिकारी होवे, रात्रियां सुखशांति को धारण करें। विद्युत और अग्नि अथवा प्राण, अपान, प्राण-उदान अपने रक्षात्मक उपायों-साधनों से हमारे लिए सुख शांति कारक होवें, सूर्य और चंद्र ऐश्वर्य प्रदान करने के लिए रोगों और भयों के निवारण के लिए हमारे लिए सुख शांति कारक होवे, आकाश या आकाशस्थ मेघ और पृथ्वी अन्न धन की प्राप्ति में हमारे लिए सुख शांति कारक होवें।’’

जिसकी प्रार्थना लोक कल्याण के लिए इतनी पवित्र होती है, इतनी ऊंची होती है – उनकी भावना भी पवित्र होती है। फलस्वरूप उनके कार्यों में भी पवित्रता अर्थात धर्म – मर्यादा के दर्शन हर पग पर होते हैं । पर हमें यह भी स्मरण रखना होगा कि प्रभु भक्ति के लिए किसी शर्त का होना या किसी भय का होना आवश्यक नही है। यह तो बिना शर्त होती है और बिना शर्त होना ही उसकी विशेषता है। ऐसी प्रार्थना सौदेबाजी नही है और ना ही किसी लाला की दुकान है-जिस पर आप जायें और कुछ पैसे देकर अपनी पसंद की सामग्री ले आयें। प्रभु के दर पर मांगने नही जाया जाता, वहां तो भक्त अपना पूर्ण समर्पण करने जाता है। गीत गाता जाता है :-

‘‘पानी उसका भूमि उसकी, सब कुछ उसी महान का।

ना ये तेरा ना ये मेरा , सब कुछ है-भगवान का।।’’

जिसने यह समझ लिया कि सब कुछ उसी महान भगवान का है-उसे अपने लिए कोई चाह नही रही और इसीलिए वह स्वयं को भी उसी महान को सौंप देता है। उसी की शरण में रहकर अपने जीवन को धन्य मानता है, उसी के नाम के सिमरण से उसका रोम-रोम पुलकित और आनंदित रहता है। उस महान की महानता भी कम प्रशंसनीय नहीं है वह भी अपने भक्त को झोली भरकर वहां से (अपने श्री चरणों से) भेजता है। झोली भरी हुई लेकर बाहर निकलना पूर्ण समर्पण का सर्वोत्तम पुरस्कार होता है। अपनी चिंताएं उस पर छोड़ीं तो उसने चिंताओं का हरण तो कर ही लिया-साथ ही साथ आपको चिंतामुक्त कर ‘अभयपन’ का वरदान भी दे दिया कि जाओ मैं तुम्हारे साथ हूं, सब कुछ ठीक हो जाएगा, जैसा चाहते हो-वैसा ही होगा।

संत राबिया के पास दो व्यक्ति पहुंचे। राबिया ने उनमें से एक व्यक्ति से पूछा-‘‘भाई तू खुदा की इबादत किसलिए करता है?’’ उस व्यक्ति ने संत राबिया को उत्तर देते हुए कहा-‘‘मैं नरक के भयंकर कष्टों से बचने के लिए खुदा की इबादत करता हूं।’’

तब राबिया ने दूसरे व्यक्ति से भी यही प्रश्न किया। दूसरे व्यक्ति ने कहा-‘‘स्वर्ग बहुत ही सुंदर है। वहां भांति-भांति के भोग सुख और ऐश्वर्य की सामग्री है। मैं उन्हें प्राप्त करने के लिए ईश्वर की इबादत करता हूं।’’

इस पर राबिया ने कहा-‘‘नासमझ लोग ही डर या भय, या किसी लालच के वशीभूत होकर ईश्वर की इबादत करते हैं। न करने से तो यह भी अच्छा है, परंतु मान लो कि यदि स्वर्ग न होता तो क्या तुम मालिक की बंदगी ही न करते। सच्ची भक्ति तो वही है जो डर या किसी प्रकार के लालच के बिना की जाती है।’’

वेद-धर्म में व्यक्ति को यही समझाया बताया जाता है कि ईश्वर की उपासना बिना किसी भय या लालच के करो। यदि हम भयग्रस्त होकर उसकी उपासना करेंगे तो वह भयहत्र्ता नही बन पाएगा। इसके विपरीत वह हमें डराता ही रहेगा। जो लोग नरक के भय से ईश्वर की उपासना करते हैं-वे भूत प्रेतादि के भयों से सदा डरे रहते हैं, जिससे उनकी मुखाकृत्ति भी वैसी ही बन जाती है। परंतु ईश्वर के प्रति समर्पण भाव से जो उसकी उपासना करता है-उसके चेहरे की मुखाकृत्ति सदा शांत और निभ्र्रांत भाव उत्पन्न करने वाली बन जाती है।

ईश्वर के प्रति समर्पित व्यक्ति ही उसकी बनायी हुई सृष्टि के प्रति समर्पित रहता है। उसे जीवन-जगत में कहीं मारकाट या हिंसा या बड़ी मछली छोटी मछली को खा जाती है-जैसी भ्रांतियों को जन्म देने वाली मिथ्या धारणाएं नहीं डराती हैं, और ना ही वह अपनी ऊर्जा को इस प्रकार के नकारात्मक विचारों या धारणाओं में लगाता है। उसे सभी प्राणी एक दूसरे के लिए कार्य करते जान पड़ते हैं। इसलिए वह सभी प्राणियों का मित्र बनकर चलना अपना धर्म और मर्यादा मानने लगता है। पश्चिमी जगत ने ‘बड़ी मछली छोटी मछली को खा जाती है’ जैसी भ्रांत धारणाएं समाज में फैलाईं तो उसका परिणाम निकला कि उनका जीवन व्यवहार अमर्यादित और अधर्मी हो उठा। उन्हें धन एकत्र करने और फिर उसके बांटने पर मर मिटने में आनंद आने लगा। पर उस व्यवस्था ने उनके भीतरी जगत को आनंदरहित कर दिया। जिससे भौतिकवाद ने उन्हें अस्वस्थ कर दिया। पर हमारे यहां दूसरी बात थी।

डॉ राकेश कुमार आर्य

संपादक : उगता भारत

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