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गुरुकुल सिकंदराबाद में मनाया गया ऋषि बोधोत्सव : महर्षि दयानंद को मिलना चाहिए भारत रत्न : डॉ राकेश आर्य

सिकंदराबाद । ( रविंद्र आर्य ) यहां स्थित गुरुकुल सिकंदराबाद में महाशिवरात्रि के पर्व को ऋषि बोधोत्सव के रूप में हर्षोल्लास के साथ मनाया गया।

विगत 20 व 21 फरवरी को आयोजित किए गए इस कार्यक्रम में अंतिम दिन मुख्य वक्ता के रूप में बोलते हुए ‘उगता भारत’ के संपादक डॉ राकेश कुमार आर्य ने कहा कि महर्षि दयानंद के ऋण से कभी हम उऋण नहीं हो सकते ।उन्होंने कहा कि 1857 की क्रांति के समय 160 वर्ष के स्वामी ओमानंद जी महाराज , 110 वर्ष के पूर्णानंद जी महाराज , 79 वर्ष के ब्रिजानंद जी महाराज एवं 33 वर्ष के स्वामी दयानंद ने क्रांति की योजना बनाई और उनके मस्तिष्क से उपजे भारतवर्ष के स्वतंत्रता आंदोलन ने 1947 में देश को आजाद करके ही दम लिया ।

श्री आर्य ने कहा कि स्वतंत्रता आंदोलन की चाहे गांधीवादी नरम विचारधारा हो , चाहे लाला लाजपत राय जैसे लोगों की गरम दल की विचारधारा हो या फिर श्यामजी कृष्ण वर्मा व राम प्रसाद बिस्मिल जैसे लोगों की क्रांतिकारी विचारधारा हो सभी पर महर्षि दयानंद के विचारों का स्पष्ट प्रभाव पड़ा। इस प्रकार महर्षि दयानंद संपूर्ण स्वतंत्रता आंदोलन के सूत्रधार थे।

डॉ आर्य ने कहा कि महर्षि दयानंद के विचारों का हमारे संविधान और शासन प्रणाली पर भी स्पष्ट प्रभाव पड़ा । भारतवर्ष के महत्वपूर्ण मंत्रालयों और सरकारी संस्थानों के संस्कृत सूत्र वाक्य इस बात का प्रमाण है ।

उन्होंने कहा कि जन गण मन अधिनायक जय हे — यह राष्ट्रगान हमारे देश में जॉर्ज पंचम के स्वागत में 27 दिसंबर 1911 को कोलकाता में गाया गया था। हम इसका सम्मान करते हैं , परंतु इसके उपरांत भी इसमें भारत की राष्ट्र वंदना का अभाव दिखाई देता है। वैदिक दृष्टिकोण में पृथ्वी , जन और संस्कृति मिलकर राष्ट्र का निर्माण करते हैं । जबकि हमारे राष्ट्रगान में किसी व्यक्ति विशेष का गुणगान होता है जो कि एक अंग्रेजी परंपरा है ।

डॉ आर्य ने कहा कि 1619 में इंग्लैंड में जॉन बुल नाम के एक व्यक्ति ने ‘ गॉड सेव द किंग : नाम के गीत को धुन देकर वहां का राष्ट्रगान बनाने का कार्य किया था। जिसकी नकल यूरोप के अन्य देशों ने की। उसका परिणाम यह हुआ कि संपूर्ण यूरोप किसी व्यक्ति विशेष की प्रशंसा को ही अपना राष्ट्रगान मानने लगा। जबकि भारत ने राष्ट्र वंदना को अपना राष्ट्रगान बताया है। जोकि यजुर्वेद के और अन्य वेदों के मंत्रों से स्पष्ट होता है। उन्होंने कहा कि ब्रह्मन् स्वराष्ट्र में हों द्विज ब्रह्म तेजधारी – वेद की इस राष्ट्रीय प्रार्थना की ऊंचाई अपने आप में अतुलनीय है । डॉक्टर आर्य ने कहा कि महर्षि दयानंद को भारत रत्न दिलाने के लिए बागपत के सांसद डॉ सतपाल ने 150 सांसदों के हस्ताक्षर कराए थे । जिसका कोई परिणाम नहीं निकला ।अच्छा हो कि आर्य समाज इस मांग को आगे बढ़ाएं।

20 फरवरी के कार्यक्रम की अध्यक्षता जाने-माने समाजसेवी सरपंच रामेश्वर सिंह व दूसरे दिन के कार्यक्रम की अध्यक्षता आर्य जगत के विद्वान देवमुनि जी द्वारा की गई । कार्यक्रम में प्रिंसिपल वेदपाल आर्य भजनोपदेशिका संतोष बाला आर्या ने भी लोगों का मार्गदर्शन किया। इसके अतिरिक्त जिला आर्य प्रतिनिधि सभा के प्रतिनिधि एवं पदाधिकारी भी दोनों दिन कार्यक्रम में उपस्थित रहे । जिनमें मंत्री श्री मूलचंद आर्य , युवा आर्य नेता आर्य सागर खारी का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है । आर्य समाज डेल्टा के प्रधान विपिन आर्य , देवेंद्र गांधी , इंजीनियर रामपाल सिंह , प्रेमचंद आर्य , लीलू आर्य , आचार्य सोबरन सिंह आर्य , उप प्रधान जगमाल सिंह आर्य ,

समाजसेवी और आर्य समाज के प्रति समर्पित लोगों ने भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। कार्यक्रम का सफल संचालन प्रधान प्रताप सिंह आर्य द्वारा किया गया । उन्होंने ‘उगता भारत ‘ को बताया कि अत्यंत विषम परिस्थितियों में उन्होंने इस गुरुकुल का कार्यभार संभाला है। श्री आर्य ने कहा कि मैं चाहूंगा कि इस संस्था के प्रति लोग जागरूक हो और इसके गौरवपूर्ण अतीत को जागृत कर इसे फिर से समाज के लिए उपयोगी बनाने में अपनी सहयोगी सहभागिता प्रदान करें।

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