कभी भी विदेशी शासकों के अधीन न रहने वाले आसाम का रहा है गौरवपूर्ण इतिहास

पूर्वोत्तर के सभी राज्यों को कभी आसाम के नाम से ही जाना जाता था । हमारे देश की ये वह पवित्र धरती है जो विदेशियों की गुलामी में कभी नहीं रही , यदि अल्पकाल के लिए रहा भी तो उसे बहुत शीघ्र ही हमारे वीर योद्धाओं ने स्वतंत्र करा लिया । इस क्षेत्र में हमारे भगवा ध्वज को उतारने का साहस किसी को नहीं हुआ और वह बड़ी शान से लहराता रहा । निश्चय ही इसका श्रेय हमारे उन हजारों योद्धाओं , वीरों , बहादुरों को जाता है जिन्होंने अपना प्राणोत्सर्ग कर करके यहां पर भारतीय स्वाधीनता को सुरक्षित रखा। आज हमारा राष्ट्रीय दायित्व है कि अपने ऐसे योद्धा और वीरों की गाथा न केवल इतिहास में सुरक्षित हों बल्कि वे देश के कोने – कोने में फैलनी चाहिए । ये ऐसे योद्धा रहे जिन्होंने मुगलों को भारतीय वीरता का परिचय कराया और उन्हें यह सोचने पर विवश किया कि भारत में ऐसे वीर हैं जो उन्हें रात को नींद नहीं आने देते और दिन में चैन नहीं लेने देते । इन्हें हम योद्धाओं को हम सम्मान के साथ अहोम योद्धा के नाम से जानते हैं। इन योद्धाओं ने मुगलों को 17 बड़े युद्धों में पराजित किया था । यहां पर हम 1 – 2 युद्ध की ही बात कर रहे हैं।

उन दिनों आसाम को प्राग्ज्योतिषपुर के नाम से जाना जाता था । यह बड़ा प्यारा नाम है । पूर्व में जहां से ज्योति अर्थात सूर्य उदित होता है उसको भारत ने अपने लिए प्राग्ज्योतिषपुर के नाम से सम्मानित किया , समझो कि वहीं से सूर्य उदय होकर ( अर्थात हमारी स्वतंत्रता का सूर्यास्त जहां कभी नहीं हुआ ) संपूर्ण भारत को यह संदेश देता रहा कि संघर्ष करते रहो एक दिन विजय मिलेगी । इस राज्य की राजधानी गुवाहाटी हुआ करती थी । इस साम्राज्य के अंतर्गत असम की ब्रह्मपुत्र वैली, रंगपुर, बंगाल का कूच-बिहार और भूटान भी सम्मिलित था। आसाम के एक महान योद्धा हुए जिनका नाम लाचित बरपुखान था । इतिहास का यही वह महान योद्धा है जिनके नेतृत्व में आसाम के वीरों ने खड़े होकर मुगलों को भारत की इस पवित्र धरती पर अपना साम्राज्य स्थापित करने से पूर्णतया रोक दिया था। औरंगजेब के शासनकाल में 1667 की अगस्त में मुगलों ने आसाम को अपने नियंत्रण में लेने का प्रयास किया । तब लाचित बरपुखान के नेतृत्व में आसाम के वीर सीना तान कर खड़े हो गये और उन्होंने मुगलों की चौकी पर प्रबल प्रहार करने आरंभ कर दिए । लाचित गुवाहाटी तक बढ़े और उन्होंने मुग़ल सेनापति सैयद फ़िरोज़ ख़ान सहित कई मुग़ल योद्धाओं को बंदी बनाया।

इस हार के पश्चात मुगलों ने अपने आपको बहुत ही अपमानित अनुभव किया । फलस्वरूप फिर एक विशाल सेना अहोम योद्धाओं को पराजित करने के लिए मुगल बादशाह औरंगजेब की ओर से भेजी गई । इस बार मुगलों को पूर्ण विश्वास था कि वह अहोम योद्धाओं का मानमर्दन करके ही लौटेंगे । परंतु हमारे वीर पुत्र भी मानो तैयारी ही किए बैठे थे , ब्रह्मपुत्र को जहां मुगलों की सेनाओं ने सैकड़ों नावों के माध्यम से पार किया , वही हमारे मुट्ठी भर सैनिक अहोम योद्धा लाचित के नेतृत्व में मात्र 7 नावों पर सवार होकर आए और मुगलों को आकर गाजर मूली की तरह मारना काटना आरंभ कर दिया । धरती मुगलों के खून से लाल हो गई । मुगलों की सारी सेना काट कर फेंक दी गई । हमारे योद्धाओं ने मुगलों को पराजय की धूल चटा दी । इस पराजय के पश्चात मुगलों ने कभी पूर्व की ओर जाने का साहस नहीं किया वह समझ गए कि आसाम को पराजित करना उनके बस की बात नहीं है । यह युद्ध भारत के उन गिने-चुने युद्धों में से एक है जिसने इतिहास की धारा को बदलने का कार्य किया । इस युद्ध में यद्यपि लक्षित वीरगति को प्राप्त हुए परंतु मुगलों को भी नानी याद आ गई ।

इससे पूर्व मुगल बादशाह जहांगीर के शासनकाल में सन 1615 में ही मुगलों ने अबू बकर के नेतृत्व में एक सेना भेजी थी, जिसे अहोम योद्धाओं ने पराजित किया था। उस युद्ध में भी मुगलों को भारी क्षति उठानी पड़ी थी । हमारे अहोम योद्धाओं ने अपने अनेकों बलिदान देकर मातृभूमि की रक्षा करने में सफलता प्राप्त की थी।

औरंगजेब के शासनकाल में ही मार्च 1662 में मीर जुमला के नेतृत्व में मुगलों को अल्पकालीन सफलता मिली। अहोम के आंतरिक कलह का लाभ उठाते हुए उसने सिमूलगढ़, समधारा और गढ़गाँव पर कब्ज़ा कर लिया। मुगलों को 82 हाथी, 3 लाख सोने-चाँदी के सिक्के, 675 बड़ी बंदूकें 1000 जहाज मिले। उन्होंने इनके अतिरिक्त भी कई बहुमूल्य चीजें लूटीं। उस समय वहां पर अहोम शासक राजा जयध्वज सिंघा का शासन काल था । राजा जयध्वज बहुत ही स्वाभिमानी और देशभक्त हिंदू शासक थे । वीरता उनकी रग-रग में समाई हुई थी । उनके लिए ऐसी पराजय बहुत ही कष्टप्रद सिद्ध हुई । उन्होंने मुगलों से एक बार पुनः युद्ध किया परंतु उन्हें इस बार भी पराजय का सामना करना पड़ा। इतना ही नहीं उन्हें मुगलों को राज्य के पश्चात ₹100000 दंड के भी देने पड़े । इस बार की यह पराजय उनके लिए और भी अधिक लज्जा अनुभव कराने वाली हुई। राजा को ‘ग़िलाजारीघाट की संधि’ करनी पड़ी। जयध्वज को अपनी पुत्री और भतीजी को मुग़ल हरम में भेजना पड़ा। जयध्वज को ये अपमान सहन नहीं हुआ। उनकी मृत्यु हो गई। तब उनके पुत्र जयध्वज के हाथों में सत्ता आ गई । उनका पुत्र चक्रध्वज भी उन्हीं की भांति शूरवीर और देशभक्त शासक था । यही कारण था कि चक्र ध्वज ने मुगलों के द्वारा अपने पिता को पहुंचाए गए संताप का प्रतिशोध लेने का प्रण लिया।

इस शूरवीर शासक ने मुगलों को अपने राज्य से खदेड़ने की ऐसी सफल रणनीति बनाई कि कुछ ही समय में मुगलों को असम छोड़ने के लिए बाध्य होना पड़ गया। मीर जुमला ने अब तक जितने भी अहोम सैनिकों को बंदी बनाया था , उसे वे सारे छोड़ने पड़ गए । अहोम शासकों ने न केवल अपनी धरती को फिर से प्राप्त कर लिया बल्कि अपने खोए हुए सम्मान को भी प्राप्त कर लिया । इस पर संतोष व्यक्त करते हुए राजा चक्रध्वज ने कहा था कि अब वह सुख पूर्वक भोजन ग्रहण कर सकते हैं। इसी अपमान का प्रतिशोध लेने के लिए औरंगजेब ने 1667 में अपनी 50000 की उपरोक्त सेना भेजी थी जिसे हमारे वीर योद्धा लाचित बरपुखान के नेतृत्व में अहोम योद्धाओं ने गाजर मूली की तरह काट कर फेंक दिया था।

असम सरकार ने सन 2000 में लाचित बोरपुखान अवॉर्ड की शुरुआत की। ‘नेशनल डिफेंस अकादमी’ से पास हुए सर्वश्रेष्ठ प्रतिभाओं को ये सम्मान मिलता है। आज भी उनकी प्रतिमाएँ असम में लगी हुई हैं।

असम सरकार प्रत्येक वर्ष 24 नवंबर को लाचित दिवस के रूप में भी मनाती हैं। हमारा मानना है कि देश के ये योद्धा आसाम के ही नहीं ,अपितु संपूर्ण भारतवर्ष के योद्धा हैं । अतः यह अवार्ड राष्ट्रीय स्तर पर भी मिलना चाहिए । इतना ही नहीं , प्रत्येक वर्ष 24 नवंबर को लाचित दिवस भी राष्ट्रीय स्तर पर मनाया जाना चाहिए । अपने इन वीर योद्धाओं की कहानियां प्रत्येक विद्यालय में बच्चों को बढ़ाई जानी चाहिए । जिससे कि उनके महान कार्य को उचित सम्मान दिया जा सके।

डॉ राकेश कुमार आर्य

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