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इतिहास के पन्नों से

जब माता जीजाबाई ने कहा था – शिवा ! मेरी आंखों में कोंडाणा पर लहराता मुगलिया ध्वज चुभता है

तानाजी मालुसरे के बलिदान दिवस पर

17 फरवरी 1767 का वह ऐतिहासिक दिन था जब कोंडाणा का किला जीतकर तानाजी मालुसरे ने वहां पर केसरिया झंडा फहराया था। आज हम अपने उस महान शूरवीर तानाजी मालुसरे के बलिदान दिवस पर उन्हें अपने श्रद्धांजलि अर्पित कर रहे हैं।

माता जीजाबाई प्रतिदिन की भांति उस दिन भी प्रातः काल में सूर्य को अर्घ्य दे रही थीं , अर्घ्य देने के पश्चात वह कुछ क्षण खड़ी रह जाती हैं । पीछे से शिवाजी उनको देख रहे थे। उन्होंने कहा कि माता जी आप सूर्य को अर्घ्य देने के बाद भी यहां पर खड़ी क्यों रहीं ? तब माता जीजाबाई ने कहा कि यह जो कोंडाणा का किला है ना , शिवा ! इस पर मुगलिया झंडा लहराता हुआ मेरी आंखों में चुभता है। मैं नहीं चाहती कि इस किले पर मुगलिया झंडा फहराए । मेरी इच्छा है कि इस पर केसरिया ध्वज फिर से लहरा उठे। इससे पहले शिवाजी 23 किलों को पुरंदर की संधि के अंतर्गत मुगलों को सौंप चुके थे ।उन्हीं में से एक किला कोंडाणा का भी था ।

माताजी की बात को सुनकर शिवाजी ने मां को आश्वस्त कर दिया कि मां मैं आपकी इच्छा को समझ गया और जो आप चाहती हैं वैसा ही होगा। शिवाजी अपनी योजना को क्रियान्वित करने के लिए चिंतन में डूब गए ।तभी दरबार में तानाजी मालुसरे पहुंचते हैं। उस समय उनके पुत्र रायबा का विवाह था । जिसके लिए वह अपने गांव गए हुए थे और वहां से आज शिवाजी महाराज को आमंत्रित करने के लिए निमंत्रण पत्र लेकर आए थे । शिवाजी को चिंतनशील मुद्रा में देखकर उन्होंने शिवाजी से सहज रूप में पूछ लिया कि महाराज क्या बात है ? तब शिवाजी ने सारा वृत्तांत कह सुनाया । इस पर उस महान देशभक्त तानाजी मालुसरे ने कहा कि आप चिंता ना करें , पुत्र की शादी बाद में पहले अब कोंडाणा जीता जाएगा।

इसी को कहते हैं राष्ट्र प्रथम – नेशन फर्स्ट।

फरवरी 1767 में तानाजी मालुसरे ने अपने 500 वीर योद्धाओं के साथ कोंडाणा किले पर चढ़ाई कर दी। कोंडाणा बहुत ही सुरक्षित दुर्ग था । जिस पर उदयभानु नामक वीर राजपूत मुगलों की ओर से अपने 15 सैनिकों के साथ तैनात था । उसे जीतना बहुत आसान नहीं था। परंतु इधर भी हमारा महायोद्धा तानाजी मालुसरे और उसके छंटे हुए 500 योद्धा थे , जिनके साहस और शौर्य को तोला नहीं जा सकता था। इन सारे शूरवीरों ने योजना बनाई और गोह को दीवार पर फेंक कर उसकी पूछ में रस्सा बांधकर उसके माध्यम से किले के पृष्ठ भाग से 300 सैनिक किले की दीवार पर चढ़ने में सफल हो गए।

200 सैनिक जो नीचे रह गए थे उन्होंने किले के मुख्य द्वार पर आकर लड़ाई आरंभ करने के लिए मोर्चा संभाल लिया । उदयभानु के सैनिक 300 सैनिकों को देखकर सावधान हो चुके थे बड़ा भयंकर युद्ध आरंभ हो चुका था । हमारे महायोद्धा तानाजी मालुसरे का युद्ध सीधे उदयभानु से हुआ । जिसमें वह गंभीर रूप से घायल हो चुके थे । उनके भाई सूर्या जी भी उनके साथ युद्ध में थे । वह और उनके कुछ साथी जब किले में तानाजी के पास पहुंचे तो वह एक कोने में गंभीर रूप से घायल हुए बैठे थे । जब तक वह उन्हें संभालते तब तक उनके प्राण पखेरू उड़ चुके थे और मां भारती की सेवा में अपना सर्वस्व बलिदान कर यह महानायक वीरगति को प्राप्त हो चुका था । परंतु यह भी प्रसन्नता की बात थी कि तब तक किला भी हमारे शौर्यपुत्रों के हाथ में आ चुका था। जिस दिन यह घटना घटित हुई थी , उस दिन 17 फरवरी ही थी।

जब यह समाचार शिवाजी को मिला कि किला तो जीत लिया गया है परंतु तानाजी मालुसरे नहीं रहे , तब उन्होंने बड़े दुख के साथ कहा था कि ‘ गढ़ तो आया पर मेरा सिंह चला गया। ‘ तभी से इस किले को सिंहगढ़ के किले के नाम से जाना जाने लगा। माता जीजाबाई जो कि किले के आने की प्रसन्नता में झूम रही थीं , जब उन्हें यह समाचार मिला कि तानाजी नहीं रहे तो वह भी फूट-फूट कर रोने लगी थीं ।

मित्रों ! सचमुच हमने एक एक इंच के लिए लड़ाई लड़ी है । पर यह दुर्भाग्य का विषय है कि एक एक इंच के लिए लड़ाई लड़ने वाले शूर वीरों को हमारे इतिहास ने भुला दिया । अब अपने इन शौर्यपुत्रों को स्मरण करने का समय है । उन्होंने यह सब कुछ क्यों किया ?- यह भी समझने का समय है। आज कौन सी परिस्थितियां हैं और आज फिर कैसे तानाजी मालुसरे की आवश्यकता है ? – यह भी समझने की आवश्यकता है । याद रखो औरंगजेब आज भी नहीं मरा है , पर हमने अपने शिवाजी को मार लिया है ।

समाचार है कि महाराष्ट्र में शिवसेना की सरकार के रहते हुए कुछ कांग्रेसियों ने शिवाजी की प्रतिमा को भी तोड़ने का अपराध कर दिया है और सारा देश मौन है। क्या कांग्रेसियों ने यह केवल महाराष्ट्र के एक महानायक के साथ ऐसा किया है या इस देश के इतिहास के सिरमौर के साथ ऐसा अपराध किया है ? इस पर गंभीरता से विचार करने का समय है ।अपने शूरवीर तानाजी मालुसरे को उनके बलिदान दिवस पर हृदय से श्रद्धांजलि।

डॉ राकेश कुमार आर्य

संपादक : उगता भारत

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