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आज का चिंतन

सुनहरा भविष्य चाहें तो सुख-सुविधा त्यागें

– डॉ. दीपक आचार्य
9413306077

जो लोग अपना भविष्य सुनहरा बनाना चाहते हैं उन्हें जीवन निर्माण के बुनियादी सिद्घान्तों और अनिवार्य रूप से पालन करने योग्य आचार-विचारों और व्यवहार को समझना होगा। जीवन निर्माण के लिए धरातल का मजबूत होना जरूरी होता है।
हर व्यक्ति में उच्चतम स्तर की जन्मजात मौलिक प्रतिभाएं होती हैं जिनका उपयोग करते हुए वह व्यक्तित्व विकास, अपने हुनर को तरक्की देने और संसार के समस्त ऐश्वर्य और सुख-सुविधा पाने के प्रयत्नों के लिए स्वतंत्र है।
लेकिन इसमें यह मर्यादा बनी हुई है कि शिक्षा और संस्कारों की नींव मजबूत करने के लिए उन सभी लोगों, वस्तुओं और विचारों को त्यागना जरूरी है जो शिक्षा काल पूरा होने के बाद हमारे जीवन में आनी होती हैं
हर व्यक्ति का विद्यार्थी काल वह समय है जब उसे भविष्य निर्माण के लिए सायास और समर्पित जतन करने की पड़ते हैं, इसके सिवा आगे बढ़ने और जीवन सुधारने का कोई शॉर्ट कट है ही नहीं। हमारी स्थिति आज दूसरी तरह की हो गई है। हमारा मस्तिष्क और आगे बढ़ने के रास्ते संकरें हैं लेकिन सामने आक्षितिज इतना कुछ लुभावना संसार पसरा दिया गया है कि हमें अपने सीमित और एकाग्र दायरों में बंधे रहना अच्छा नहीं लग रहा है।
जो संसाधन हमारे जीवन में पन्द्रह-बीस साल बाद आने चाहिएं वे नए-नए आकर्षणों के साथ रोजाना हमारे चारों तरफ चक्कर काटने लगे हैं और इसका नुकसान हमें इस मायने में उठाना पड़ रहा है कि आदमी पूरे संसार के वैभव और संपदा, सामग्री को पाने के लिए हर तरह के जतन कर देने के लिए तैयार बैठा है।
ऐसे में जो विद्यार्थी भविष्य निर्माण के लिए जुटे हुए हैं उनमें से अधिकांश आजकल पूरी तरह भटक गए हैं। दुनियावी संसाधनों और फैशन परस्ती के दौर ने हमारी सारी एकाग्रता, पढ़ाई-लिखाई के प्रति निष्ठा और लक्ष्य पाने की जिज्ञासा, तितिक्षा तथा परिश्रम सब कुछ भुला दिया है।
आज हमारी नई पीढ़ी बचपन से ही भटक गई है। उसे लक्ष्य की बजाय संसाधनों और भोग-विलासिता का मोह जकड़ने लगा है। मन-मस्तिष्क की लहरों, दिमागी घोड़ों से लेकर चित्त में उद्विग्नताओं और सब कुछ पाने की अकुलाहट के ज्वार ने हमारे बच्चों को कहीं का नहीं रहने दिया है।
आज बचपन से टीवी और मोबाइल, क प्यूटर गै स से लेकर वे तमाम प्रकार की वस्तुएं हमारे सामने हैं जिसका भरपूर उपयोग हमारी वर्तमान पीढ़ी कर रही है। उसे घर-परिवार में रमने, सामाजिक, सांस्कृतिक एवं धार्मिक उत्सवों में भागीदारी, घूमने-फिरने, अपने इलाके और देश-दुनिया के बारे में जानने और एकाग्रता के साथ अपनी पढ़ाई-लिखाई के लक्ष्यों को प्राप्त कर लेने के प्रति तनिक भी रुचि नहीं रही।
जिसे देखो वह मोबाइल पर बतियाने लगा है, बतरस नहीं मिलने पर गाने सुनता रहता है, टीवी के सामने घण्टों बैठा रहकर आँखें, सेहत और समय बरबाद कर रहा है। कम्प्यूटर पर गेम्स देखने, अपलोड व डाउनलोड करने में समय जाया हो रहा है। फिर आजकल तो आविष्कारों का जमाना है। रोजाना सैकड़ों नई चीजें और आकर्षण सामने आ जाते हैं।
ऐसे में बच्चों का मन-मस्तिष्क पढ़ने-लिखने की अपेक्षा उन फालतू कामों में एकाग्र हो गया है जिनका जीवन निर्माण से कोई $खास संबंध नहीं है। या यों कहें कि हमारे बच्चों में शिक्षा-दीक्षा और संस्कारों की बजाय ऐसे कामों की अनियंत्रित एवं स्वच्छंद तलब लग गई है जो ड्रग्स, अफीम और तमाम प्रकार के नशों से कहीं ज्यादा घातक है।
इस तलब ने जीवन निर्माण के सभी आयामों की एकाग्रता भंग कर दी है। आज के बहुसं य विद्यार्थियों की प्राथमिकता शिक्षा की बजाय क प्यूटर गै स, मोबाइल, इंटरनेट, फेसबुक और टीवी दर्शन हो गई है।
शिक्षा के प्रति लक्ष्यों के भटकाव की इस स्थिति ने नई पीढ़ी को बरबाद तो किया ही है, इसकी वजह से उनकी सेहत का याल पूरी तरह समाप्त हो गया है। आज बच्चों का शारीरिक सौष्ठव, बल, ओज आदि सब कुछ स्वाहा होता जा रहा है। फास्ट फूड़ और कचरा खाने की आदी वर्तमान पीढ़ी के भोजन में न विटामिन हैं, न शरीर निर्माण के लिए जरूरी तत्व आदि।
बुढ़ापे के सारे लक्षण बच्चों में अभी से दिखने लग गए हैं और चश्मों के नंबर लगातार बढ़ते जा रहे हैं। एक मरीयल पीढ़ी हमारे सामने है जो पढ़ाई के नाम पर हो हल्ला जरूर कर रही है, लेकिन शरीर की बारह बजा रही है।
विद्यार्थी काल में सुखों के परित्याग तथा कठोर परिश्रम को अपनाने की सलाह सदियों से दी जाती रही है। आज परिश्रम से हम कतराने लगे हैं और संसार के तमाम प्रकार के सुख आज भोगना चाहते हैं जिन्हें भोगने योग्य हम कुछ बरस बाद ही हो पाएंगे। कहा गया है – सुखार्थी वा त्यजेत विद्या, विद्यार्थी वा त्यजेत सुखम। यह वाक्य विद्यार्थी के जीवन निर्माण का महान वाक्य है जिसे जो अपना लेता है वह निहाल हो जाता है।
विद्यार्थी वही है जो सुखों से दूर रहकर परिश्रम व एकाग्रता के साथ पढ़ाई करे, पूरे विद्यार्थी काल के प्रति गंभीर रहे और अपने लक्ष्यों में पूर्णता प्राप्त कर लेने के बाद ही संसार के सुखों की ओर देखे।
पर आजकल ऐसा हो नहीं रहा। आज का विद्यार्थी पढ़ाई से कहीं ज्यादा अपरिमित सुख चाहता है। और यही कारण है कि शिक्षा का स्तर गिर रहा है, हमारी वर्तमान विद्यार्थी पीढ़ी कुछ नहीं कर पा रही है। जो शिक्षा आदमी को रट्टू और भोगी बना डाले वो किस काम की। बेकारी और बेरोजगारी सुरसा की तरह आकार बढ़ा रही है और बुढ़ापे से तरबतर जवानों की फौज तैयार हो रही है।
जो लोग अपने भविष्य का निर्माण करना चाहते हैं उन्हें इस सत्य को स्वीकार करना होगा तथा पहला और अंतिम लक्ष्य शिक्षा में सर्वोच्च शिखरों का आरोहण मानना होगा, तभी जीवन सफल है। लेकिन ऐसा करना कोई आसान नहीं है। हमें सुखों के भोग और सांसारिक आसक्तियों को कुछ समय के लिए त्यागना होगा।
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