Categories
इतिहास के पन्नों से

महान क्रांतिकारी ठाकुर रोशन सिंह की जयंती पर विशेष

ठाकुर रोशन सिंह भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन के जाज्वल्यमान नक्षत्र का नाम है । इन्हें काकोरी कांड में एक अभियुक्त मानकर अवैधानिक और अनैतिक रूप से ब्रिटिश सरकार ने फांसी के फंदे पर चढ़ा दिया था । हमारे इस महान क्रांतिकारी का जन्म उत्तर प्रदेश के शाहजहाँपुर जनपद में फतेहगंज से 10 किलोमीटर दूर स्थित गाँव नबादा में 22 जनवरी 1893 को हुआ था। आपकी माता जी का नाम कौशल्या देवी एवं पिता जी का ठाकुर जंगी सिंह था। आपके माता-पिता आर्य समाज की विचारधारा से प्रेरित थे । फलस्वरूप यही संस्कार आपके भीतर भी प्रविष्ट हुए । जिन्होंने आप को भारत को स्वतंत्र कराने के लिए प्रेरित किया । अतः आप देश के स्वतंत्रता आंदोलन के साथ जुड़ गए।

आपने उत्तर प्रदेश के शाहजहाँपुर और बरेली जिले में चल रहे असहयोग आंदोलन में भी बढ़-चढ़कर भाग लिया था। आप अत्यंत साहसी , वीर और क्रांतिकारी विचारधारा से ओतप्रोत युवा थे । यही कारण था कि एक बार आपने एक पुलिस वाले की रायफल छीनकर उस पर फायरिंग करनी आरंभ कर दी थी जिससे वह घबराकर वहां से भाग गया था। इसे हम बरेली गोलीकांड के नाम से जानते हैं ।

अंग्रेज सरकार ने आपको इस गोलीकांड के अभियोग में सेण्ट्रल जेल बरेली में दो वर्ष बामशक्कत कैद की सजा़ दी थी ।

क्रांतिकारी युवा ठाकुर रोशन सिंह महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन में इसलिए जुड़े थे कि उन्होंने गांधी के असहयोग आंदोलन का उद्देश्य क्रांति के माध्यम से भारत को स्वतंत्र कराना मान लिया था। परंतु गांधी जी अहिंसा के पुजारी थे , चौरी चौरा कांड की हिंसा होते ही उनका आंदोलन धीमा पड़ गया और अंत में वह आंदोलन को छोड़कर बैठ गए । जिससे क्रांतिकारी ठाकुर रोशन सिंह के मन को बहुत धक्का लगा । गांधीजी के इस पलायनवाद से देश के अनेकों क्रांतिकारी युवाओं को बहुत ठेस पहुंची थी। उनका यौवन मचल रहा था और वह अंग्रेजों को भगा देने के लिए कृत संकल्पित थे , परंतु गांधीजी ने उन्हें एक प्रकार से ठग सा लिया था , तब यह क्रांतिकारी युवा इधर-उधर अन्य क्रांतिकारियों से जाकर मिलने लगे।

उसके कारण श्री ठाकुर साहब ने भी राजेन्द्र नाथ लाहिडी़, श्री रामदुलारे त्रिवेदी व श्री सुरेशचन्द्र भट्टाचार्य आदि के साथ शाहजहाँपुर शहर के आर्य समाज पहुँच कर श्री राम प्रसाद बिस्मिल से गम्भीर मन्त्रणा की । जिसमें राष्ट्रीय स्तर पर अस्त्र-शस्त्र से सुसज्जित कोई बहुत बडी़ क्रान्तिकारी पार्टी बनाने की रणनीति पर गंभीरता से विचार विमर्श हुआ। इसी रणनीति के अंतर्गत श्री ठाकुर रोशन सिंह को पार्टी में सम्मिलित किया गया था। श्री ठाकुर साहब पक्के निशानेबाज थे ।

जब 9 अगस्त 1925 को काकोरी स्टेशन के पास सरकारी खजा़ना लूटा गया था । यद्यपि उसमें श्री ठाकुर रोशन सिंह सम्मिलित नहीं थे, उनके स्थान पर श्री केशव चक्रवर्ती नाम के अन्य क्रांतिकारी युवा सम्मिलित थे । केशव चक्रवर्ती उनका छद्म नाम था ।वे बंगाल की अनुशीलन समिति के सदस्य थे । उनके स्थान पर ठाकुर रोशन सिंह को इसलिए गिरफ्तार किया गया कि वह काकोरी कांड से पूर्व में हुई बमरौली डकैती में एक अभियुक्त थे ।

बमरौली डकैती की प्रतिशोध की अग्नि में जलती ब्रिटिश सरकार और उसकी पुलिस ने सारी शक्ति श्री ठाकुर रोशन सिंह को फाँसी की सजा़ दिलवाने में ही लगा दी । सी०आई०डी० के कप्तान खानबहादुर तसद्दुक हुसैन श्री राम प्रसाद बिस्मिल पर बार-बार यह दबाव डालते रहे कि श्री बिस्मिल किसी भी तरह अपने दल का सम्बन्ध बंगाल के अनुशीलन दल या रूस की बोल्शेविक पार्टी से बता दें , परन्तु श्री बिस्मिल टस से मस न हुए। आखिरकार श्री रोशन सिंह को धारा 120 (बी) और 121(ए) के तहत 5 -5 वर्ष की बामशक्कत कैद और 396 के अन्तर्गत फाँसी की सजा दी गयी। ब्रिटिश सरकार और उसकी पंगु न्याय व्यवस्था के द्वारा दिये गये इस अनैतिक ,अवैधानिक और तानाशाही भरे निर्णय के विरुद्ध जैसे अन्य सभी ने उच्च न्यायालय, वायसराय व सम्राट के यहाँ अपील की थी वैसे ही श्री रोशन सिंह ने भी अपील की । यह अलग बात है कि उनकी इस अपील का भी वही परिणाम निकला जिसकी अपेक्षा अत्याचारी ब्रिटिश सरकार और उसके शासकों से की जा सकती थी ।

क्रांतिकारी ठाकुर रोशन सिंह ईश्वर भक्त , राष्ट्रभक्त मातृ पितृ भक्त थे । उन्होंने अपने इन सभी दिव्य गुणों को परिलक्षित करता हुआ एक पत्र अपने एक मित्र के नाम लिखा था । जिसकी शब्दावली को ध्यान से पढ़ने की आवश्यकता है । यह पत्र उन्होंने 6 दिसम्बर 1927 को इलाहाबाद स्थित मलाका (नैनी) जेल की काल-कोठरी से लिखा था :–

“इस सप्ताह के भीतर ही फाँसी होगी। ईश्वर से प्रार्थना है कि वह आपको मोहब्बत का बदला दे। आप मेरे लिये रंज हरगिज न करें। मेरी मौत खुशी का बाइस (कारण) होगी। दुनिया में पैदा होकर मरना जरूर है। दुनिया में बदफैली करके अपने को बदनाम न करे और मरते वक्त ईश्वर की याद रहे;यही दो बातें होनी चाहिये और ईश्वर की कृपा से मेरे साथ ये दोनों बातें हैं। इसलिये मेरी मौत किसी प्रकार अफसोस के लायक नहीं है। दो साल से बाल-बच्चों से अलग रहा हूँ। इस बीच ईश्वर भजन का खूब मौका मिला। इससे मेरा मोह छूट गया और कोई वासना बाकी न रही। मेरा पूरा विश्वास है कि दुनिया की कष्ट भरी यात्रा समाप्त करके मैं अब आराम की जिन्दगी जीने के लिये जा रहा हूँ। हमारे शास्त्रों में लिखा है कि जो आदमी धर्म युद्ध में प्राण देता है उसकी वही गति होती है जो जंगल में रहकर तपस्या करने वाले ऋषि मुनियों की।”

पत्र समाप्त करने के पश्चात उसके अन्त में उन्होंने अपना यह शेर भी लिखा था:–

जिन्दगी जिन्दा-दिली को जान ऐ रोशन!

वरना कितने ही यहाँ रोज फना होते हैं।

फाँसी से पहली रात ठाकुर साहब कुछ घण्टे सोये फिर देर रात से ही ईश्वर-भजन करते रहे। प्रात:काल शौचादि से निवृत्त हो यथानियम स्नान ध्यान किया कुछ देर गीता-पाठ में लगायी फिर पहरेदार से कहा-“चलो।” ठाकुर रोशन सिंह की इस प्रकार की गतिविधियों को पहरेदार बड़े आश्चर्यजनक भावों से देखता रहा , वह समझ नहीं पा रहा था कि यह एक साधारण व्यक्ति है या कोई देवता है।

जब ठाकुर रोशन सिंह अपनी जेल कोठरी से बाहर निकले तो उन्होंने झुककर उस कोठरी को अपना अंतिम प्रणाम किया और गीता हाथ में लेकर निर्विकार भाव से फाँसी घर की ओर चल दिये। फाँसी के फन्दे को चूमा फिर ज़ोर से तीन बार वन्दे मातरम् का उद्घोष किया और वेद-मन्त्र – “ओ३म् विश्वानि देव सवितुर दुरितानि परासुव यद भद्रम तन्नासुव” – का जाप करते हुए फन्दे से झूल गये।

इलाहाबाद में नैनी स्थित मलाका जेल के फाटक पर हज़ारों की संख्या में स्त्री-पुरुष, युवा और बाल-वृद्ध एकत्र थे। जैसे ही उनका शव जेल कर्मचारी बाहर लाये वहाँ उपस्थित सभी लोगों ने नारा लगाया – “रोशन सिंह! अमर रहें!!” भारी जुलूस के रूप में शवयात्रा निकली और गंगा यमुना के संगम तट पर जाकर रुकी जहाँ वैदिक रीति से उनका अन्तिम संस्कार किया गया। फाँसी के बाद ठाकुर साहब के चेहरे पर एक अद्भुत शान्ति दृष्टिगोचर हो रही थी।

उन्होंने बड़े सहज भाव से अपना नाशवान चोला प्रभु चरणों में सादर समर्पित कर दिया । उनका एक ही भाव था , एक ही चाव था , एक ही उद्देश्य था और एक ही लगाव था कि जैसे भी हो मेरी मां भारती स्वतंत्र हो । इसके लिए एक नहीं लाखों और लाखों नहीं करोड़ों ठाकुर रोशन सिंह भी यदि फांसी के फंदे पर चढ़ाई जाएं तो कोई दुख नहीं होगा।

क्रांतिकारियों की इस अटल , अचल , निश्चल और निश्छल भावना और कामना ने इस देश को आजाद कराया। इस देश को के गणतंत्र की नींव में ऐसे बलिदानियों का बलिदान ही छुपा हुआ है । आज उनके जन्मदिवस पर हम उन्हें सादर वंदन व नमन करते हैं ।

डॉ राकेश कुमार आर्य

संपादक : उगता भारत

Comment:Cancel reply

Exit mobile version
hititbet giriş
betgaranti giriş
hititbet giriş
hititbet güncel giriş
hititbet giriş
Hititbet Giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
tuzla cilt bakım merkezi
Tuzla İpek Kirpik
Hititbet
hititbet giriş
Tuzla Cilt Bakım
Tuzla Cilt Bakım Merkezi
Tuzla İpek Kirpik
hititbet
hititbet
Tuzla İpek Kirpik
betnano
hititbet giriş
hititbet
betnano
betgaranti giriş
Hititbet Giriş
hititbet
hititbet
Hititbet
Hititbet Güncel Giriş
Hititbet Yeni Giriş
Hititbet Resmi Gİriş
meritbet
bets10
meritbet
bets10
betnano
bets10
bets10
betnano
betnano
atlasbet
atlasbet
betnano
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betyap giriş
hititbet giriş
betpark giriş
betnano
betnano
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
kolaybet giriş
kolaybet giriş
hitbet giriş
hitbet giriş
betkom giriş
betkom giriş
grandpashabet
betgaranti giriş
hititbet
hititbet giriş
hititbet giriş
betgaranti giriş
betgaranti
betgaranti güncel giriş
xslot giriş
xslot giriş
xslot giriş
xslot giriş