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आज का चिंतन

आज का चिंतन-15/06/2013

भूखे-प्यासे रहें आस-पास के प्राणी
तो कर्मकाण्ड-अनुष्ठान सब हैं बेमानी

डॉ. दीपक आचार्य
9413306077
dr.deepakaacharya@gmail.com
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धर्म जैसे विराट आकाश को लोगों ने कर्मकाण्ड, यज्ञ और अनुष्ठानों या कि नाम कमाने के लिए किए जाने वाले तथाकथित पुण्य कर्मों तक ही सीमित कर दिया है।भीषण गर्मी के इस दौर में जहां आदमी सारे जतन करने के बाद भी झुलसने लगा है, नदी-नाले सूखे हैं और पानी नहीं रहा। पानी न जमाने में रहा, न आदमी में रहा। फिर सारी जगह पानी के लिए त्राही-त्राहि मची है। पंचतत्वों में एक तत्व की कमी हो जाने का सीधा सा अर्थ है प्रकृति कुपित है, तत्वों का संतुलन गड़बड़ाया हुआ है और जल हीनता अर्थात रस हीनता से अग्नि ज्वालाएं रौद्र मुखी हो गई हैं।एक जमाना था जब अपने पावन अंचल की धर्म धाम के नाम से पहचान थी। वह धर्म आज कहीं खोता जा रहा है। धर्म कहीं दिखता नहीं, धर्म के नाम पर पाखण्ड का बोलबाला जरूर है। आज धर्म के नाम पर जो हो रहा है वह आडम्बर के ज्यादा कुछ नहीं कहा जा सकतासंतों और महंतों की भूमि, धर्म स्थलों के धाम और जाने कितने सारे धार्मिक अनुष्ठानों का साक्षी रहे अपने इलाको में धर्म के नाम पर रोजाना कहीं मन्दिर और शिखर प्रतिष्ठा, कहीं कोई अनुष्ठान, यज्ञ याग, गंगाजल और व्रत-कथाएं तथा उत्सवों के आयोजनों की भरमार। इसके बावजूद गायों और अन्य मवेशियों के लिए चारे-पानी का संकट। कितना ही बड़ा अनुष्ठान कर लें, यज्ञ में कई मन घी होम लें, सैकड़ों ब्राह्मणों और लोगों को जिमा लें तथा नाम कमाने के लिए कितना ही दान-पुण्य कर लें, जब तक गौ माता भूखी-प्यासी है तब तक इन सारे कर्मकाण्डों का कोई मूल्य नहीं है।गौ को संतुष्ट किए बगैर कोई यज्ञ सफल हो ही नहीं सकता। गौहत्या रोकने और गौ सेवा का ढिण्डोरा पीटने की बजाय जरूरी है कि गौसेवा को असल जीवन का अंग बनाया जाए।रोजाना किसी संत-महात्मा और महंत का प्रवचन, भागवत और रामकथाएं और बहुत कुछ होता रहा है जिसे धर्म से जोड़कर देखा जा रहा है। मगर असल धर्म गायब हो गया है। संत महात्मा या महंत या कि धर्म के नाम पर समाज की ठेकेदारी करने वाले लोग अपनी मानवीय संवेदनाएं इतनी खो चुके हैं कि उन्हें अपने शिष्यों की फौज और बैंक बैलेन्स बढ़ाने के सिवा फुर्सत ही नहीं है।ये सारे अपनी चिन्ता करने में लगे हैं। इन्हें कोई सरोकार नहीं है कि बाहर क्या हो रहा है। संत-महंतों,कथाकारों और धर्माधीशों का फर्ज है कि वे अपने स्वार्थ छोड़कर जनता से यह कहें कि रोजाना पशु-पक्षियों के लिए दाना-पानी की व्यवस्था करें, घास-चारा डलवायें, प्याऊ खुलवाएं, परिण्डा बांधे और प्राणी मात्र की सेवा करें।मूक प्राणियों की सेवा को सबसे बड़ा धर्म माना गया है लेकिन युगीन धर्म की परिभाषाएं बदल कर इतनी संकीर्ण हो गई हैं कि हम और हमारा परिवार या आश्रम। अपने अंचल में स्वयंसेवी संस्थाओं की कोई कमी नहीं है लेकिन वे भी इस दिशा में जाने क्यों मौन हैं।हमारे सामने पशु-पक्षी और जरूरमन्द प्राणी भूखे-प्यासे रहें और हम चुपचाप देखते रहें, अपने कर्मकाण्ड और पाखण्डों में रमे रहें, यह कैसा कर्मकाण्ड। इससे तो वे लोग अच्छे थे जिन्होंने धर्म की रक्षा के लिए अपने प्राण तक न्यौछावर कर दिये और इतिहास में अमर हो गए।हम आत्मकेन्दि्रत होने की पशुता का त्याग नहीं कर पाएं तो हमें जीने का हक किसने दिया। हमारे जीने से संसार का क्या भला होने वाला है। बल्कि हम नहीं होते और हमारी बजाय दूसरा कोई होता तो शायद धर्म का अर्थ समझकर जीवन धन्य करता।आज आत्मचिन्तन करने की जरूरत है और यह चिन्तन कल नहीं बल्कि आज और इसी वक्त। हम तय करें कि हमारे जीवन को सार्थक बनाना है या कि पशुओं की तरह खुद का पेट भरते हुए मर जाना। आखिर अपने क्षेत्र के बड़े-बड़े और अपने जमाने के लोकप्रिय लोग चले गये, वे भी खाली हाथ ही गए हैं।आज ही से संकल्प लें – अपने मोहल्ले में गायों सहित सभी प्रकार के मवेशियों के लिए चारा-पानी की व्यवस्था करें। पशुओं को खुली धूप में न बांधें। पक्षियों के लिए दाने की व्यवस्था करें और पानी के लिए परिण्डे बांधे। मोहल्ले-मोहल्ले में प्याऊ स्थापित करें। जहां सार्वजनिक नल व हैण्डपंप खराब हैं उन्हें ठीक करायें। असल में यही धर्म है। जरूरतमन्द प्राणी की आवश्यकता को महसूस कर उसे सहयोग करना ही धर्म है, शेष जो भी हो रहा है वह पोंगापंथियों का खेल है।

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