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एकात्म मानववाद और भारतीय राष्ट्रवाद

भारत के बारे में पश्चिम के विद्वानों ने यह भ्रांति फैलाने का निरर्थक प्रयास किया है कि भारत में राष्ट्रवाद की भावना कभी नहीं रहीऔर भारत में राष्ट्रवाद का प्रचार – प्रसार ब्रिटिश काल में हुआ । उससे पहले इस देश में राष्ट्रीयता की भावना थी ही नहीं। जिन विदेशी विद्वानों , लेखकों या इतिहासकारों ने भारत में राष्ट्रीयता के संबंध में ऐसी भ्रांत धारणा को फैलाया है उन्हें या तो भारत के बारे में कोई ज्ञान नहीं है या फिर उन्होंने यह सब कुछ द्वेषवश किया है । कुछ भी हो , भारत के संबंध में यह सत्य है कि वास्तविक राष्ट्रवाद की भावना यदि संसार में कहीं मिलती है तो वह केवल और केवल भारतवर्ष में मिलती है । यह अलग बात है कि भारत का राष्ट्रवाद पूर्णत: मानवतावादी राष्ट्रवाद है । जिसे हमारे देश के लोगों ने एकात्म मानववाद कहकर महिमामंडित किया है । भारत के राष्ट्रवाद में कहीं भी ना तो वर्गीय संघर्ष है ,न ही जातीय द्वेष है और ना ही सांप्रदायिक वैमनस्य है । यह राष्ट्रवाद शुद्ध राष्ट्रवाद है , जो लोगों को एक दूसरे से जोड़ता है और उनमें परस्पर बंधुता का प्रेमभाव संचरित करता है ।

वर्गीय संघर्ष के स्थान पर भारत ने संसार को वर्ण व्यवस्था दी है । वर्णों के परस्पर एक दूसरे से कार्य व्यवहार को चलाने के लिए उनके धर्म निश्चित किए हैं। वर्ण-धर्म का अर्थ है अपने-अपने वर्ण के उन कर्तव्य कर्मों को पूर्ण निष्ठा के साथ संपादित करना जो लोगों को एक दूसरे से जोड़ें और सामाजिक समरसता के भाव को उत्पन्न करने में सहायक हों । वर्णाश्रम की यह व्यवस्था मानव के उत्कृष्ट चिंतन की अवस्था है जिसमें सब सब के लिए समर्पित हैं । कोई भी व्यक्ति अपने लिए काम करता हुआ दिखाई नहीं देता अपितु दूसरों के लिए अपने आपको समर्पित करता हुआ दिखाई देता है । राष्ट्रवाद की यह पवित्र भावना ही भारत के लोगों में सामाजिक समरसता के भाव को मजबूत करती रही है । जिसने प्रत्येक काल में भारत को शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व की भावना का अनुयायी बनाकर विकास की चरम अवस्था को छूने के लिए प्रेरित किया है।

इन वर्णों को ही लोगों ने भारत में जातिवाद का जनक समझा है और कुछ लोगों ने ऐसा भ्रम भी उत्पन्न किया है कि इन वर्णो से ही जातियों का निर्माण हुआ है , जबकि भारत ने इस विषय में अपना स्पष्ट चिंतन प्रस्तुत करते हुए यह स्पष्ट किया कि मनुष्य की जाति एक है और उसकी विभिन्न जातियां होना संभव नहीं है । भारत के इसी मौलिक राष्ट्रीय संस्कार और हिंदुत्व की चेतना के प्रबल स्वर के चलते प्राचीन भारत में कभी भी जातीय संघर्ष की भावना विकसित नहीं हो पाई। क्योंकि प्रथम तो उस समय जातियां थी ही नहीं और दूसरे उनके स्थान पर जो वर्ण व्यवस्था काम कर रही थी वह परस्पर एक दूसरे को बड़ी मजबूती के साथ जोड़े हुए थी । जिससे समाज में सब लोग मिलकर वास्तविक समाजवाद का ताना-बाना बुन रहे थे। इस प्रकार भारत में न तो कभी जाति व्यवस्था रही और न ही कबीलायी संस्कृति का विकास यहां हो पाया।

भारत में सांप्रदायिक वैमनस्य का भाव भी कभी नहीं रहा , क्योंकि सांप्रदायिकता का विकास ही यहां पर कभी नहीं हो पाया । भारत ने सांप्रदायिकता के स्थान पर मनुष्यों को चिंतनशील ब्राह्मण दिए । उत्कृष्टतम चिंतन के धनी ऋषि , महात्मा , संत आदि प्रदान किए । जिनका कार्य समाज में किसी भी प्रकार के वैमनस्य को समाप्त करना होता था । ऐसे विद्वान लोग अपने जीवन के अंतिम पड़ाव में घूम – घूमकर लोगों के भीतर पारस्परिक सद्भाव को विकसित करने का कार्य करते थे । जैसे आज गलियों में सब्जी बेचने वाले घूमते हैं वैसे कभी इस भारत में फेरी लगाने वाले बाबा अर्थात ऋषिगण घूमा करते थे । जो किसी के भी यहां रुक कर लोगों को अपने वेद वचन सुनाया करते थे । वेदों की कथाओं का आयोजन किया करते थे । लोगों को सामूहिक रूप से पंचायतघरों , चौपालों या सार्वजनिक स्थानों पर या किसी गुरुकुल या विद्यालय में इकट्ठा कर वहां पर उन्हें परस्पर सद्भाव से रहने की सीख दिया करते थे । इसके लिए पूरा का पूरा एक वर्ग काम करता था और जो लोग 75 की अवस्था को पार कर जाते थे , वह तो अपना पूरा समय इसी कार्य के लिए लगाते थे । वास्तव में यह सारे कार्य भारत में राष्ट्रवाद के उसी मौलिक संस्कार को प्रबलतम करने के लिए किए जाते थे जिसे हम एकात्म मानववाद के नाम से जानते हैं। हिंदुत्व के प्रबल स्वर के रूप में इसी एकात्म मानववाद की भावना को विकसित , पुष्पित और पल्लवित करने के लिए हमारे पूर्वज अपना सर्वस्व समर्पित कर दिया करते थे । जबकि राजनीतिक क्षेत्र में हमारे सम्राट आदि भी इन्हीं मानवीय मूल्यों के लिए समर्पित रहकर कार्य करते थे , जो लोग हमारे ऋषियों के इस मांगलिक कार्य में विघ्न डालते थे , उनका विनाश करना राजा अपना सर्वोपरि कर्तव्य समझते थे।

समाज में वैश्य वर्ग के कार्य व्यापार में विघ्न डालने वाले लोगों का विनाश करना या उन्हें दंडित करना भी राजाओं का कार्य था । जबकि ब्राह्मण वर्ग राजा के ऊपर धर्म की नकेल अर्थात उसे नैतिक होकर या न्यायपरक बुद्धि का स्वामी बन कर शासन करने के लिए प्रेरणा देना था । जिससे वैश्य वर्ग शांतिपूर्वक अपना कार्य व्यापार करता था । जहां तक शूद्र वर्ण की बात है तो उसके लिए तीनों वर्णों के लोगों की सेवा का कार्य दिया गया था । जिसे बाद में कुछ लोगों ने इस प्रकार प्रचारित और प्रसारित किया कि प्राचीन भारत में शूद्र को सबसे निचला काम दिया गया और उसे सारे समाज का गुलाम बनाकर रखा गया । जबकि सच यह था कि समाज के तीनों वर्ण अर्थात ब्राह्मण , क्षत्रिय और वैश्य चौथे वर्ण अर्थात शूद्र वर्ण की उन्नति के लिए समर्पित रहते थे । कोई भी व्यक्ति शूद्र नहीं रह पाए , यह चिंतन हमारे सभी वर्णों के लोगों का हुआ करता था। यद्यपि कालांतर में कुछ स्वार्थी लोगों ने कहीं अज्ञानतावश तो कहीं जानबूझकर ऐसी स्थितियां उत्पन्न कीं कि शूद्र वर्ण वास्तव में दयनीय अवस्था को प्राप्त हो गया , लेकिन हमारा मानना है कि यह भारत की संस्कृति नहीं है अपितु संस्कृति में आया हुआ विकार है और विकार कभी भी मूल या मुख्यधारा नहीं बन सकता।

कुछ लोगों ने देश में यह भ्रांति फैलाने का कार्य किया है कि भारत के लम्बे इतिहास में कभी भी राष्ट्रवाद की भावना नहीं रही । उनका मानना है कि भारत में अंग्रेजों के शासनकाल मे राष्ट्रीयता की भावना का विशेषरूप से विकास हुआ। भारत में अंग्रेजी शिक्षा के प्रचार – प्रसार से एक ऐसे विशिष्ट वर्ग का निर्माण हुआ जो स्वतन्त्रता को मानव का मूल अधिकार समझता था । इसी वर्ग ने भारत देश को स्वतंत्रता प्रेमी पाश्चात्य देशों के समकक्ष लाने की प्रेरणा दी। पाश्चात्य देशों का इतिहास पढ़कर उसमें राष्ट्रवादी भावना का विकास हुआ। जबकि पढ़ाया यह जाना चाहिए कि पश्चिम के देशों ने विश्व के अनेक देशों में अपने उपनिवेश स्थापित कर वहां के लोगों को गुलाम बना – बनाकर विश्व में गुलामी के विचारों का प्रचार – प्रसार किया न कि स्वतंत्रता के विचारों का । जब हमारे बच्चों अथवा युवा वर्ग को इस प्रकार का साहित्य पढ़ने को मिलता है या उनके पाठ्यक्रम में इस प्रकार के पाठ लगाए जाते हैं कि भारत में राष्ट्रवाद की भावना को विकसित करने में पाश्चात्य लोगों का विशेष योगदान रहा है तो उस समय हमारे ऐसे बच्चों अथवा युवा वर्ग को अपने देश के प्राचीन चिंतन और एकात्म मानववाद के उदात्त विचारों से काट दिया जाता है । तब वे अज्ञानतावश पश्चिम की ओर भागते हैं और विश्व में गुलामी के विचारों के प्रचारक और प्रसारक रहे इन पश्चिमी देशों के साहित्य में ही भारतीय राष्ट्रवाद के उदय के कारणों को ढूंढने लगते हैं।

यदि हम भारतीय राष्ट्रवाद के विषय में भारत में रहकर ही चिंतन करें और भारत के प्राचीन साहित्य को खंगालने या उसकी पड़ताल करने का प्रयास करें तो पता चलता है कि वेदों में ही ऐसे अनेकों मंत्र हैं जिनमें राष्ट्रवाद के चिंतन को मानव मस्तिष्क में भरने का भारत सृष्टि के पहले दिन से कार्य करता चला आ रहा है । भारत का यह चिंतन व्यक्ति को व्यक्ति से जोड़कर उसे मोक्ष की ओर चलने के लिए प्रेरित करने वाला चिंतन है ।

अथर्ववेद के ‘ पृथ्वी सूक्त ‘ में पृथ्वी को माता कहकर संबोधित किया गया है । वहां पर धरती माता का गुणगान करते हुए कहा गया है कि — ” माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः ” अर्थात यह भूमि माता है और मैं पृथ्वी का पुत्र हूँ। ” इस प्रकार इस वेद मंत्र में पृथ्वी को माता कहकर राष्ट्र के साथ हमारे ऋषियों ने अपना संबंध माता और पुत्र का स्थापित किया । संसार में इससे पवित्र अन्य कोई संबंध नहीं हो सकता । जब हम किसी व्यक्ति के बारे में यह कहते हैं कि वह ‘धरतीपुत्र ‘ है तो उसका अर्थ यही होता है कि वह भारत के इस मौलिक संस्कार से जुड़ा हुआ है कि वह अपनी मातृभूमि को माता मानता है और स्वयं को उसके पुत्र के रूप में समर्पित करता है । इसी प्रकार किसी व्यक्ति के बारे में जब यह कहा जाता है कि ‘वह जड़ों से जुड़ा हुआ व्यक्ति है ‘- तो उसका अर्थ भी यही होता है कि वह भारत के इस मौलिक संस्कार से जुड़ा हुआ है कि वह अपनी मातृभूमि को सर्वाधिक प्यार करता है और उसके लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर करने के लिए समर्पित रहता है । जड़ से जुड़े होने का अर्थ है जन-जन से जुड़ा होना और भारत के एकात्म मानववाद के आधार पर भारत को विश्वगुरु बनाने के संकल्प को हृदय में धारण करके चलने वाला व्यक्ति ।

राष्ट्र की धरती को माता समझना और स्वयं को उसका पुत्र समझकर उसकी सेवा के लिए समर्पित कर देना यह बहुत ऊंचा चिंतन है । जिसके बड़े व्यापक अर्थ हैं , और यह व्यापक अर्थ ही हिंदुत्व के वह मूल स्वर हैं जिसके आधार पर भारत नाम की वीणा झंकृत होती है और उससे सामाजिक समरसता का ऐसा संगीत निकलता है जिससे भारत वास्तव में भारत बन जाता है। भारत का यह अदभुत सांस्कृतिक संगीत ही वह विश्व संगीत है जिससे संपूर्ण मानवता परस्पर प्रेम सूत्रों में आबद्ध है। इसके गहन अर्थों पर विचार चिंतन मनन और शोध होना समय की आवश्यकता है।

धरती को माता कहकर भारतवासियों ने अपने आप को उसके प्रति पूर्ण समर्पित कर दिया । यही कारण रहा कि जब – जब देश में राष्ट्र के लिए बलिदान करने की आवश्यकता अनुभव की गई , तब – तब भारत के कोटि-कोटि लोगों ने अपने आपको राष्ट्र के लिए वैसे ही समर्पित कर दिया जैसे कोई पुत्र अपनी मां के लिए अपना सर्वस्व समर्पित कर देता है या उसके लिए अपने आप को बलिवेदी पर चढ़ा देता है । यहां पर अनेकों अवसर ऐसे आए जब लोगों ने विदेशी शत्रुओं को भगाने के लिए बिना वेतन की सेना अपने आप तैयार कर ली और अपना सर्वोत्कृष्ट बलिदान देने के लिए सहर्ष युद्ध के मैदान में जा पहुंचे । नेताजी सुभाष चंद्र बोस की ‘आजाद हिंद फौज’ इसका ताजा उदाहरण है । इससे पहले भी अनेकों बार ऐसे अवसर आए जब जनता के बीच से कोई महायोद्धा उठा और उसने युवाओं का आवाहन कर एक बड़ी सेना तैयार कर विदेशियों का सामना किया । भारत का दुर्भाग्य रहा कि भारत के ऐसे महान योद्धाओं के महान कार्यों पर कोई शोध नहीं किया गया । ईर्ष्या और द्वेष से भरे इतिहासकारों की लेखनी ने इन महान योद्धाओं के ऐसे महान कार्यों को दबा दिया । इतना उत्कृष्टतम गौरवशाली इतिहास भारत ने तभी बनाया जब उसका उसकी मौलिक चेतना को झंकृत करने वाले ऐसे वेदमंत्र उसके पास सृष्टि के पहले दिन से उपलब्ध थे । जो उसे स्वतंत्रता का बोध कराते थे और स्वतंत्रता को प्रत्येक व्यक्ति का मौलिक अधिकार घोषित करते थे।

वेद के राष्ट्रवादी चिंतन को ही पुराणों ने भी स्थान दिया है । पुराण वास्तव में हमारे इतिहास की घटनाओं के वर्णन करने का ही साधन हैं। विष्णुपुराण में राष्ट्र के प्रति श्रद्धाभाव अपने चरमोत्कर्ष पर दिखाई देता है। इस पुराण में भारत का यशोगान ‘पृथ्वी पर स्वर्ग’ के रूप में किया गया है। वहां पर कहा गया है कि भारत की इस पवित्र भूमि के गीत देवगण भी जाते हैं।

अत्रापि भारतं श्रेष्ठं जम्बूद्वीपे महागने।यतोहि कर्म भूरेषा ह्यतोऽन्या भोग भूमयः॥

गायन्ति देवाः किल गीतकानि धन्यास्तु ते भारत-भूमि भागे।स्वर्गापस्वर्गास्पदमार्गे भूते भवन्ति भूयः पुरुषाः सुरत्वात् ॥

पुराण का यह श्लोक केवल एक गप्प मात्र नहीं है और न ही यह मानव मस्तिष्क की कल्पना से जन्मा एक ऐसा श्लोक मात्र है जो आत्म प्रशंसा में गढ़ लिया गया है । इसके विपरीत सच यह है कि हमने वास्तव में भारत को देव पुरुषों का देश देर तक बनाए रखा। जब संसार के शेष देश सभ्यता और संस्कृति से सर्वथा वंचित थे और पशुओं की भांति परस्पर लड़ने मरने की बातें कर रहे थे , तब भारत ने देव संस्कृति का निर्माण कर लिया था। उस देव संस्कृति के संपर्क में जब भी कोई विदेशी आता था तो उसकी आत्मा यहीं और केवल यहीं निवास करने के लिए उसे प्रेरित करने लगती थी । भारत उस समय सचमुच में एक ‘पारसमणि’ बन गया था । इसी भाव को देखकर हमारे ऋषियों ने पुराण का यह श्लोक रचा होगा।

इसी प्रकार ‘ वायुपुराण ‘ में भी अपने देश की प्रशंसा करते हुए उसके प्रति समर्पित होने का भाव जागृत करने के लिए भारत को अद्वितीय कर्मभूमि बताया गया है। ‘भागवतपुराण ‘ में तो भारतभूमि को और भी अधिक प्रशंसित करते हुए सम्पूर्ण विश्व में ‘सबसे पवित्र भूमि’ कहा गया है। वहां पर भी यह कहा गया है कि इस पवित्र भारतभूमि पर तो देवता भी जन्म धारण करने की अभिलाषा रखते हैं । क्योंकि संसार की यही एकमात्र ऐसी पवित्र भूमि है , जहां जन्म लेने पर स्वर्ग की प्राप्ति होती है अर्थात परलोक भी सुधर जाता है ।

कदा वयं हि लप्स्यामो जन्म भारत-भूतले।कदा पुण्येन महता प्राप्यस्यामः परमं पदम्।

हिंदुत्व की चेतना के स्वर के रूप में भारत के रोम-रोम में स्थापित हुए एकात्म मानववाद के इसी भारतीय राष्ट्रवाद ने पराधीनता के काल में हमारे कवियों को भारत और भारती की प्रशंसा में गीत लिखने की प्रेरणा दी । यदि हम भारतीय स्वाधीनता आंदोलन में कवियों व लेखकों की कविताओं के योगदान पर चिंतन करें या उनको पढ़ें तो उनमें भारत के इसी एकात्म मानववादी राष्ट्रवाद की झंकार गुंजायमान होती हुई दिखाई देती है। जिसने सोए हुए भारत को जगाने का अतुलनीय कार्य किया।

हमारा मानना है कि भारत के पुनर्जागरण के काल में हमारे कवियों , लेखकों और साहित्यकारों के द्वारा रचे गए साहित्य पर भारत के प्राचीन साहित्य की पड़ी हुई छाया को देखने की आवश्यकता है । उसे केवल इतने तक सीमित कर देना कि पाश्चात्य विद्वानों के स्वतंत्रता संबंधी विचारों का प्रभाव भारत के कवियों , लेखकों और साहित्यकारों पर हुआ और उन्होंने ब्रिटिश सत्ताधारियों को भारत से भगाने का संकल्प ले लिया — यह भारत के पुरुषार्थ के साथ और भारत की मूल चेतना के साथ विश्वासघात करने जैसा होगा। जिसे कोई भी जीवंत राष्ट्र कभी भी अपना नहीं सकता।

जब हम किसी व्यक्ति के सोने की बात करते हैं तो इसका अर्थ यह होता है कि वह पहले जागृत अवस्था में था । ‘पुनर्जागरण ‘ उसी का होता है जो आलस्य और प्रमाद के वशीभूत होकर सो गया है । मरे हुए का जागरण नहीं होता । अतः पुनर्जागरण की बात केवल भारत पर ही लागू होती है । जो आलस्य और प्रमाद के कारण या किन्ही अन्य परिस्थितियों के कारण कुछ देर के लिए अपने मूल से कट गया या मार्ग से भटक गया था । पश्चिमी जगत पुनर्जागरण की धारणा को जब अपने ऊपर लागू करता है तो उनके इस प्रयास पर हंसी आती है । क्योंकि पश्चिम के देश भारत की भांति कभी जागृत अवस्था में नहीं रहे , और यदि रहे भी तो वह अत्यंत प्राचीन काल में उस समय रहे जब वे भारत के संपर्क में थे।

डॉ राकेश कुमार आर्य

संपादक : उगता भारत

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