खैरात बांटती राजनीति, और दम तोड़ता बचपन

राकेश कुमार आर्य

एक ओर भूख और कुपोषण से दम तोड़ता बचपन है तो दूसरी ओर देश में ऊंची ऊंची अट्टालिकाएं हैं जो गरीब और गरीबी दोनों पर इठला रही हैं। एक ओर गंदगी के ढेर में से ‘रोटियां’ ढूंढते बच्चे हैं तो दूसरी ओर हर सुविधा से संपन्न इस देश में एक वर्ग वो भी है जो अभावों का अर्थ तक भी नही जानता। असमानता का देश में ये आलम है कि एक व्यक्ति  एक एक कौड़ी के लिए परेशान है तो दूसरे को ये ही पता नही है कि उसके पास कितना धन है? पता नही देश में समाजवाद है या पूंजीवाद है। देश के नेता तो कहते हैं कि यहां समाजवाद है और देश की परिस्थितियां कहती हैं कि यहां पूँजीवाद से भी घटिया कोई व्यवस्था काम कर रही है। 66 वर्ष में ही असमानता की खाई इतनी चौड़ी हो गयी है कि पाटनी ही मुश्किल लग रही है। ठीक इसी समय राजनीति मतदाताओं को लुभाने और ठगने में लगी है, वह कहीं लैपटॉप बांट रही है तो कहीं टी.वी. बांट रही है, कहीं किसानों के ऋण माफ कर रही है तो कहीं ऐसे ही कामों में देश के खजाने को पानी की तरह बहा रही है समस्या की जड़ पर कोई प्रहार नही कर रहा है-इसलिए समस्या विकराल से विकरालतर होती जा रही है।khairat

विश्व खाद्य संगठन का कहना है कि विश्व में रोजाना बीस हजार बच्चे अन्न ना मिलने के कारण मौत के मुंह में चले जाते हैं। विश्व में अन्न और खाद्य पदार्थ पर्याप्त हैं, लेकिन उनकी वितरण प्रणाली खराब है। विश्व में एक अरब तीस करोड़ टन अनाज की बर्बादी का आंकड़ा विश्व खाद्य संगठन पेश करता है। इतना सारा अन्न यदि सही लोगों को मिल जाए तो कितनी ही अनमोल जिंदगियां बचायी जा सकती हैं। विश्व में हर सातवां व्यक्ति भूखा सोने के लिए अभिशप्त है। विश्व भूख सूचकांक में भारत का सातवां स्थान है। यहां भी वितरण प्रणाली इतनी खराब है कि हर साल 251 मिलियन टन खाद्यान्न उत्पादन होने के बावजूद भी हर चौथा व्यक्ति भूखा है। इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन के एक प्रोफेसर का कहना है कि भारत में हर साल 23 करोड़ टन दाल, 12 करोड़ टन फल, 21 करोड़ टन सब्जियां वितरण प्रणाली में खामियों के कारण खराब हो जाती हैं। लैपटॉप और टीवी बांटती राजनीति या हज सब्सिडी देकर वोट पक्की करने वाले राजनीतिक दलों के पास इस प्रकार की खामियों पर चिंतन करने और जिंदगी बचाने के पुनीत कार्य में लगने या उस ओर देखने का वक्त नही है। लोगों को अपने ही रहमोकरम पर जिंदा छोड़ दिया गया लगता है। आज की राजनीति का युग धर्म यही बन गया है।

खाद्य प्रसंस्करण मंत्री तारिक अनवर ने कुछ समय पहले स्वीकार किया था कि भारत में हर साल 5 हजार करोड़ रूपये के खाद्यान्न पदार्थ नष्ट हो जाते हैं। जब मंत्री महोदय ऐसी स्वीकारोक्ति दे रहे हों तो वितरण प्रणाली के प्रति सरकारी उदासीनता का भी पता चल जाता है। कभी किसी सरकार ने या राजनीतिक दल ने वितरण प्रणाली की खामियों को दूर करने के लिए ना तो कोई नीति बनाई और ना ही कोई नीति बनाने संबंधी मुद्दा अपने चुनावी घोषणा पत्र में दिया है। मानो देश में इस ओर ध्यान देने की कोई आवश्यकता भी नही है। या मानो कि देश में ऐसी कोई समस्या ही नही है। समस्या तो है पर उस समस्या से जो लोग जूझ रहे हैं उनकी आवाज उठाने वाला कोई जनप्रतिनिधि नही हैं। पर उनकी आवाज यमराज के द्वार पर जा रही है, और प्रकृति के कोप का भाजन हम बन रहे हैं, परंतु संसद के भीतर नही जाती। इसलिए बड़े आराम से नेता देश को चला रहे हैं। ये साम्प्रदायिक, जातीय, वर्गीय, आधार पर वोट मांगें तो भी माफ है, सीधे सीधे जनता को लैपटॉप-टीवी ऋण माफी की रिश्वत दें तो भी माफ है। चुनाव आयोग चुपचाप तमाशा देख रहा है।

एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में विवाहादि के अवसर पर प्लेटों में तथा अन्य प्रकार से कुल भोजन का 40 प्रतिशत भाग व्यर्थ चला जाता है। हर व्यक्ति थाली में कुछ ना कुछ जूठन छोड़ना अपनी इज्जत समझता है। कई लोगों को एक रसगुल्ले की आवश्यकता है लेकिन वो लेंगे चार रसगुल्ले। बाद में तीन बेकार फेंके जाते हैं। इसी प्रकार कई लोग जिस खाद्य पदार्थ को पसंद नही करते हैं उसे अधिक मात्रा में प्लेट में भर लेते हैं, फिर पसंद ना आने पर फेंक देते हैं। किसी को भी ध्यान नही रहता कि तू कर क्या रहा है? निश्चित ही किसी के हिस्से का खाना बिगाड़ा जा रहा है। अधिकारों को लड़कर लेने का नारा लगाने वाले लोग तनिक इस स्थिति पर चिंतन करें तो पाएंगे कि अधिकार लड़कर लिये जाते हैं या नही ये तो हमें नही पता पर अधिकार छीने कैसे जाते हैं-कितने प्रमाद के साथ लोग दूसरे का निवाला छीन लेते हैं-ये हमें अवश्य पता है।

निश्चय ही यह स्थिति जनजागरण की अपेक्षा करती है। मानवाधिकार वादी संगठन और समाजसेवी संगठन इस ओर ध्यान दें और सरकार पर एक प्रभावी वितरण प्रणाली लागू करने का दबाव बनाए, साथ ही देश में लोगों में जनजागरण अभियान चलाकर ‘खाद्यान्न बचाओ-गरीब बचाओ’ का नारा दिया जाए। देश भुखमरी से निपटने में चीन से ही नही बल्कि पाकिस्तान और श्रीलंका से पीछे है क्योंकि चीन का दूसरा स्थान है तो पाकिस्तान 57वें और श्रीलंका 37वें स्थान पर है। देश बहुत धीमी रफ्तार से आगे बढ़ रहा है। यद्यपि विज्ञान और तकनीकी के क्षेत्र में तथा आर्थिक प्रगति में उसने विश्व को आश्चर्य चकित किया है।

क्या ही अच्छा हो कि हम अपने अपने स्तर पर प्रतिज्ञा करें कि आज से अपनी थाली में या प्लेट में जूठन नही छोड़ेंगे। चाहे घर में हों या बाहर, जूठन फेंकेंगे नही। अपने हिस्से का खाएंगे और दूसरे के हिस्से को ईमानदारी से छोड़ेंगे। दीप से दीप जलता है, और जगमगाहट फैल जाती है, हम स्वयं सुधरेंगे और अपने साथियों को, मित्रों को इसके लिए प्रेरित करेंगे। एक कदम बढ़ाएंगे तो मंजिल एक कदम नजदीक आ जाएगी। तब एक दिन सोती हुई राजनीति भी जागेगी, और ऊंघते हुए सामाजिक संगठनों की भी आंखें खुलेंगी कि क्या करना चाहिए था और हम क्या करते रहे?

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