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इतिहास के पन्नों से

देश की तीसरी लोकसभा और लाल बहादुर शास्त्री का नेतृत्व

देश की तीसरी लोकसभा का गठन 1962 में हुआ था । इसी वर्ष हमारे देश को चीन के हाथों करारी पराजय का सामना भी करना पड़ा । तीसरी लोकसभा का कार्यकाल 1967 तक रहा । किस लोकसभा के कार्यकाल में कई ऐसी ऐतिहासिक घटनाएं हुई जो इस लोकसभा को इतिहास में कुछ खास बना गयीं । इन्हीं में से एक घटना लाल बहादुर शास्त्री जी का प्रधानमंत्री बनना और शीघ्र ही मृत्यु को प्राप्त होना भी रहा । यही वह लोकसभा रही जिसने अब तक की 17 लोकसभाओं के सबसे बुरे दिनों को देखा।

1962 में इनके खातों में पराजय तो मिली ही साथ ही उसने हमारे भूभाग का लगभग सवा लाख किलोमीटर क्षेत्रफल बलात अपने नियंत्रण में ले लिया। जिसकी पीड़ा को देश आज तक सहला रहा है। इसके साथ ही जब पाकिस्तान ने देखा कि भारत को चीन ने बुरी तरह परास्त कर दिया है तो उसने भी 1965 में भारत पर यह सोचकर आक्रमण कर दिया कि यदि तू भी इसको परास्त कर देगा तो तेरा ‘मुगलिया साम्राज्य’ पूरे भारत पर स्थापित हो जाएगा।

इस प्रकार इस लोकसभा के कार्यकाल में भारत को 2 युद्धों का सामना करना पड़ा साथ ही दो प्रधानमंत्रियों की मृत्यु होते भी इसी लोकसभा ने देखी और यही वह लोकसभा भी रही जिसमें 5 बार प्रधानमंत्रियों ने शपथ ग्रहण की । सबसे पहले पंडित जवाहरलाल नेहरू ने 1962 के लोकसभा चुनाव होने के पश्चात शपथ ग्रहण की तो 27 मई 1964 को उनके देहांत के पश्चात कार्यकारी प्रधानमंत्री के रूप में गुलजारी लाल नंदा को देश के प्रधानमंत्री की शपथ दिलाई गई । इसके बाद 9 जून 1964 को देश के अगले प्रधानमंत्री के रूप में लाल बहादुर शास्त्री जी ने शपथ ग्रहण की और जब 11 जनवरी 1966 को उनका देहांत हो गया तो उनके पश्चात फिर गुलजारी लाल नंदा ने प्रधानमंत्री के रूप में पदभार संभाला । 24 जनवरी 1966 को फिर इसी लोकसभा के कार्यकाल में श्रीमती इंदिरा गांधी ने देश की पहली महिला प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ग्रहण की।

1962 में 16 से 25 फरवरी तक चले आम चुनाव के बाद तीसरी लोकसभा के गठन को कुछ ही महीने बीते थे कि प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के पंचशील के सिद्धांत व ‘हिन्दी चीनी भाई-भाई’ के नारे का मज़ाक उड़ाते हुए पड़ोसी चीन ने देश पर हमला कर दिया।

नेहरू जी गांधी जी की अहिंसा की नीति के आधार पर देश को चला रहे थे । वह भूल गए थे कि सत्यमेव जयते की रक्षा के लिए शस्त्रमेव जयते की परंपरा को भी अपनाना अनिवार्य होता है । राष्ट्रहितों के दृष्टिगत युद्ध को भी ‘बुद्ध’ के साथ रखना पड़ता है । उनके इस अतिवादी दृष्टिकोण के चलते 20 अक्टूबर 1962 को चीन ने भारत के साथ विश्वासघात करते हुए और नेहरू जी के ‘हिंदी चीनी भाई-भाई ‘ के नारे का उपहास उड़ाते हुए भारत पर जबरदस्त हमला किया । सारा देश सन्न रह गया। यहां तक कि नेहरू जी की भी आंखें खुल गईं।

प्रधानमंत्री की सलाह पर 26 अक्टूबर को राष्ट्रपति ने इमरजेंसी यानी आपातकाल की घोषणा की।

उस समय विपक्ष आज के ‘ टुकड़े-टुकड़े गैंग ‘ के साथ खड़े होने वाला विपक्ष नहीं था । सारे विपक्ष ने देश के नेता का साथ दिया और एकजुट होकर विदेशी आक्रमणकारी का सामना किया।

युद्ध के उपरांत देश की संसद के द्वारा सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित किया गया कि जब तक देश की एक इंच भूमि भी चीन के कब्जे में रहेगी, देशवासी चैन से नहीं बैठेंगे ।सत्ता पक्ष और विपक्ष में किसी और लोकसभा में किसी भी मसले पर ऐसी अद्भुत एकता देखने में नहीं आई । 20 नवंबर 1962 को चीन ने एकतरफा युद्ध की घोषणा की लेकिन तब तक देश को बहुत अपमान झेलना पड़ चुका था।

इस पराजय के लिए व्यापक आलोचना के शिकार हुए तत्कालीन रक्षामंत्री कृष्णा मेनन को अपने पद से त्यागपत्र देना पड़ा और नेहरू की ‘आधुनिक भारत के निर्माता’ की छवि को ऐसा ग्रहण लगा कि वे बीमार रहने लगे और अंततः 27 मई, 1964 को उनका निधन हो गया । जब 9 जून 1964 को उनके स्थान पर लाल बहादुर शास्त्री जब विधिवत देश के प्रधानमंत्री बने तो दूसरे पड़ोसी पाकिस्तान की कुटिलता ने अप्रैल, 1965 में देश पर एक और युद्ध थोप दिया ।

पाकिस्तान ने सोचा था कि 1962 में चीन के हाथों पराजित भारत उसकी ओर से दिए गए ‘ऑपरेशन जिब्राल्टर’ के झटके को झेल नहीं पाएगा । परंतु इस बार शास्त्री जी ने जिस प्रकार अपने संकल्प शक्ति का परिचय दिया उस युद्ध में पाकिस्तान के दांत खट्टे हो गए और भारत एक विजयी देश के रूप में उभर कर सामने आया । जिससे सारे संसार में भारत का सम्मान बढ़ा और पाकिस्तान को अपनी औकात का भी पता चल गया ।

भारतीय सेनाओं के शौर्य और पराक्रम ने देश का सम्मान बढ़ाया तो पाकिस्तान ने रूस से जाकर समझौता वार्ता कराने की अनुनय विनय की । रूस ने उसके अनुरोध को स्वीकार कर भारत पर दबाव बनाया कि वह ताशकंद आकर पाकिस्तान के साथ वार्ता करे । देश के स्वाभिमानी प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री पर रूस ने दबाव बनाकर ताशकंद समझौते पर हस्ताक्षर करा लिए । जिसमें कुछ ऐसी शर्ते थीं जिन्हें शास्त्री जी स्वीकार करना नहीं चाहते थे। इस समझौते पर हस्ताक्षर करने के बाद शास्त्री जी को असीम वेदना हुई। जिससे समझौते पर हस्ताक्षर के कुछ ही देर बाद 11 जनवरी, 1966 को वहीं नितांत संदेहास्पद परिस्थितियों में शास्त्री जी की इहलीला समाप्त हो गई । देश और उसकी तीसरी लोकसभा के लिए यह नया सदमा था, जिसके थोड़े दिनों बाद उसकी पहली महिला प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने शपथ ली ।

शास्त्री जी ने शांति काल और युद्ध काल दोनों में देश का नेतृत्व किया , परंतु युद्ध काल में किए गए उनके नेतृत्व ने देश के जनमानस को बहुत अधिक प्रभावित किया । यही कारण है कि देश के लोग आज तक उन्हें बहुत सम्मान के भाव से देखते हैं । उनकी मृत्यु पर संदेह के बादलों को छांटने में कांग्रेस की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने कभी रुचि नहीं दिखाई । यहां तक कि उनके परिवार को आज तक भी आशंका है कि वह मरे नहीं बल्कि मारे गए थे।

स्त्री लोकसभा को इसलिए भी याद किया जाता है कि इससे पूर्व की लोकसभाओं में अधिकतर वकील चुनकर आते थे , परंतु इस लोकसभा में वकीलों का वर्चस्व कम हो गया और उनके स्थान पर किसानों के प्रतिनिधि बढ़ गए। जबकि किसानों के बाद दूसरी बड़ी ताकत के रूप में वकीलों का वर्चस्व बना रहा।

इस लोकसभा में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी को 29 और भारतीय जनसंघ को 14 सीटें मिली थीं जबकि देश के राजनीतिक आकाश में नई-नई उदित हुई स्वतंत्र पार्टी ने 22 सीटें जीत ली थीं।

एक और खास बात यह कि इस लोकसभा में केवल तीन सांसद निर्विरोध चुनकर आ पाए थे, जबकि पहली लोकसभा में निर्विरोध चुने गए सांसदों की संख्या दस थी जो दूसरी लोकसभा में बढ़कर 12 हो गई थी. ये सब के सब कांग्रेसी थे । अब कांग्रेस के प्रति लोगों का दृष्टिकोण बदलने लगा था यही कारण था कि इस लोकसभा में निरोध पहुंचने वाले कांग्रेसियों की संख्या बहुत कम हो गई।

आज हमें लाल बहादुर शास्त्री जैसे नेताओं की और लोकसभा में तर्क के आधार पर अपनी बात को रखने वाले जनप्रतिनिधियों की आवश्यकता है।

डॉ राकेश कुमार आर्य

संपादक : उगता भारत

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