अविश्वसनीय होते हैं
बात-बात में कसम खाने वाले

चिंटू1डॉ. दीपक आचार्य
94330607
dr.deepakaacharya@gmail.com
आदमियों की कई सारी किस्मों में से एक किस्म उन लोगों की है जो बात-बात में कसम खाया करते हैं और उन लोगों को अपनी किसी भी बात को पुष्ट करने या आधार प्रदान करने के लिए किसी न किसी की सौगंध खाने की जरूरत पड़ती है और जब तक वे किसी की शपथ न खाएं, तब तक इनकी बात आधार को छू नहीं पाती।ऐसे लोग जीवन में हर मामले में कसम खाने की ऐसी आदत पाल लेते हैं जो उनकी पूरी जिन्दगी में नहीं छूट पाती और मरते दम तक भी कसम खाते रहते हैं।घर-परिवार से लेकर पास-पड़ोस तक की बात हो, किसी सभा-समारोह या सामाजिक जिन्दगी का मामला हो या फिर कर्म क्षेत्र अथवा जगत का कोई सा व्यवहार हो। ये लोग जब तक कसम नहीं खा लेंगे तब तक चैन नहीं पड़ता।ऐसे लोग अपने परिवारजनों से भी संवाद स्थापित करेंगे तब भी किसी न किसी की कसम खाये बगैर उनकी बात पूरी नहीं हो पाती है। ये लोग भगवान से लेकर अपने माता-पिता, बच्चे, पति-पत्नी और प्रेमी-प्रेमिकाओं तक किसी की भी कसम खा सकते हैं।इनके लिए कसम खाने के कई सारे किरदार होते हैं और कसम खाए जाने लायक होने वाले लोगों की सीमा अनंत होती है। अपने आस-पास की बात हो या फिर कहीं और की, दुनिया में सभी स्थानों पर ऐसे खूब लोग बिना ढूँढ़े पाए जा सकते हैं।ऐसे लोगों की अपने यहां भी कोई कमी नही है। किसी भी बात को कसम खाकर पुष्ट करने का सीधा सा मतलब यही है कि हम जो बात कह रहे हैं उन शब्दों या हमारी वाणी का कोई मतलब नहीं है तथा वे ऊर्जाहीन हो चुके हैं और अपनी अर्थवत्ता या प्रभाव खो चुके हैं।तभी तो इन्हें समझाने या प्रभावपूर्ण बनाने के लिए हमें किसी न किसी की कसम का सहारा लेना पड़ रहा है। आम तौर पर जो लोग बात-बात में कसम खाते हैं वे बिना वजह के ज्यादा बोलने वाले होते हैं और उनकी बातों घनत्व इतना कमजोर हो गया है कि ये कोई भी प्रभाव छोड़ने लायक नहीं रहे हैं।इसीलिए इन लोगों को अपनी बात का प्रभाव जताने के लिए किसी न किसी की कसम का संपुट लगाना होता है और जब तक ये कसम न खाएं तब तक इनकी कोई बात पूरी होती ही नहीं।इनके संपर्क में रहने वाले लोग भी इनकी इस आदत से वाकिफ होते हैं। वे यह अच्छी तरह मानते हैं कि बात-बात में कसम खाना इनकी सदाबहार आदत में शुमार है और इसलिए इन लोगों की कसम का कोई वजूद नहीं है।इनके द्वारा खायी गई कसम को भी कोई गंभीरता से नहीं लेता। इस बात को ये खुद भी जानते हैं मगर इनके संपर्क में आने वाले नए लोग इनकी इस तासीर को कुछ समय बाद ही समझ पाते हैं। हालांकि ज्यादा देर नहीं लगती है।जिन लोगों को बात-बात में कसम खाने की जरूरत पड़ती है उन लोगों की बातें और वे खुद कभी विश्वसनीय नहीं हुआ करते हैं। ऐसे लोगो के बारे में यह स्पष्ट माना जाना चाहिए कि ये लोग जिन्दगी भर कभी भी विश्वस्त नहीं हो सकते हैं और न ही इनकी बातें विश्वास लायक हो सकती हैं।जिन लोगों को कसम खाने की जरूरत पड़ती है वे कभी भी किसी का विश्वास जीतने लायक नहीं हो सकते हैं और ऐसे लोगों पर भी विश्वास नहीं किया जाना चाहिए।ये लोग हमेशा अविश्वसनीय होते हैं। बात-बात में कसम खाने वाले लोग कालान्तर में अपना विश्वास तो खो ही देते हैं वहीं इनका व्यक्तित्व भी आभा खो देता है।जो लोग अपने जीवन में विश्वसनीय होना चाहते हैं उन्हें चाहिए कि वे कसम खाना छोड़ दें और अपनी वाणी को इतनी प्रभावी और सशक्त बनाएं कि कभी भी कसम खाने की स्थिति न आए।

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