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इतिहास के पन्नों से

जब स्वामी श्रद्धानंद की हत्या पर गांधीजी ने हत्यारे को कहा था अपना भाई

किसी व्यक्ति का भारत देश की नब्ज पर हाथ रख कर बोलना कांग्रेस की दृष्टि में सांप्रदायिकता रही है , और यह संस्कार कांग्रेस को गांधीजी जैसे नेताओं से मिला है । यदि आप इस देश के विभाजन का कारण धर्मांतरण से मर्मान्तरण और मर्मान्तरण से राष्ट्रान्तरण की सहज प्रक्रिया को मानेंगे तो आप कांग्रेस और कांग्रेस के नेताओं की दृष्टि में सांप्रदायिक हैं । यदि आप हिन्दू समाज के लोगों को धर्मांतरित कर अपने संख्याबल को बढ़ाकर इस देश को फिर विभाजन की ओर ले जाने वाले लोगों का विरोध करेंगे और फिर बरगलाकर या बहकाकर धर्मांतरित किए गए अपने वैदिक हिन्दू भाइयों को अपने साथ लाकर जोड़ने का प्रयास करोगे तो भी आप इन लोगों की दृष्टि में सांप्रदायिक होंगे और न केवल सांप्रदायिक होंगे बल्कि उन्मादी भी होंगे , उग्रवादी भी होंगे ।

कुल मिलाकर कांग्रेस और कांग्रेस के नेताओं की सोच रही है कि अपराध और अत्याचार को चुप रह कर सहन करते रहो , जख्म खाते रहो और गर्दन कटवाते रहो। यदि इन सबके विरुद्ध आपने कुछ बोला तो गलती आपकी ही होगी न कि उन लोगों की जो अत्याचार कर रहे हैं या अपराध कर रहे हैं। अत्याचारी चाहे लाख ‘ औरंगजेब ‘ पैदा कर ले पर आप कोई ‘ महाराणा प्रताप या शिवाजी ‘ पैदा नहीं करोगे ।

स्वामी श्रद्धानंद इस देश की विभाजनकारी शक्तियों की सूक्ष्मता से समीक्षा कर रहे थे और उसका ऐसा प्रबंध कर रहे थे कि भविष्य में इस देश को तोड़ने वाली शक्तियां पैदा ही ना हों तो उन्हें एक अत्याचारी ने धोखे से मार दिया। स्वामी जी एक देश , एक देव , एक धर्म , एक धर्म ग्रंथ के समर्थक थे । इसी सिद्धांत ने इस सनातन राष्ट्र को प्राचीन काल में ‘ एक ‘ बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी ।

स्वामी श्रद्धानंद की हत्या के समय गांधीजी कांग्रेस के 1926 के गोहाटी अधिवेशन में भाग ले रहे थे। जब उन्हें स्वामीजी की हत्या का समाचार मिला तो गांधीजी ने कहा-‘‘ऐसा तो होना ही था। अब आप शायद समझ गये होंगे कि किस कारण मैंने अब्दुल रशीद ( स्वामी जी के हत्यारे ) को भाई कहा है और मैं पुनः उसे भाई कहता हूँ। मैं तो उसे स्वामीजी का हत्या का दोषी नहीं मानता। वास्तव में दोषी तो वे हैं जिन्होंने एक-दूसरे के विरुद्ध घृणा फैलायी।’’

गांधी ने स्वामीजी की हत्या के बाद एक मंच से कहा था कि ‘राशिद मेरा भाई है और मैं बार बार यह कहूंगा। हत्या के लिए मैं उसे दोषी नहीं ठहराता। दोषी वह लोग हैं जो एक दूसरे के खिलाफ नफरत फैलाते हैं। उसकी कोई गलती नहीं है और न ही उसे दोषी ठहराकर किसी का भला होगा।’ यदि किसी की वकालत स्वयं गांधी कर रहे हों तो कौन सा कानून आरोपी को सजा देता ? गांधीजी के प्रयासों से राशिद को छोड़ दिया गया।

इतना ही नहीं गांधी जी ने अपने भाषण में आगे कहा, — ” मैं इसलिए स्वामी जी की मृत्यु पर शोक नहीं मना सकता.… हमें एक आदमी के अपराध के कारण पूरे समुदाय को अपराधी नहीं मानना चाहिए । मैं अब्दुल रशीद की ओर से वकालत करने की इच्छा रखता हूँ । “

उन्होंने आगे कहा कि “समाज सुधारक को तो ऐसी कीमत चुकानी ही पड़ती है , स्वामी श्रद्धानन्द जी की हत्या में कुछ भी अनुपयुक्त नहीं है । “अब्दुल रशीद के धार्मिक उन्माद को दोषी न मानते हुये गांधीजी ने कहा कि “…ये हम पढ़े, अध-पढ़े लोग हैं , जिन्होंने अब्दुल रशीद को उन्मादी बनाया । स्वामी जी की हत्या के पश्चात हमें आशा है कि उनका खून हमारे दोष को धो सकेगा, हृदय को निर्मल करेगा और मानव परिवार के इन दो शक्तिशाली विभाजन को मजबूत कर सकेगा.“ (यंग इण्डिया, दिसम्बर 30, 1926).

ऐसे शब्द न कहकर यदि गांधीजी देश में धर्मांतरण के खेल के माध्यम से अपना संख्याबल बढ़ाकर देश को विभाजन की ओर ले जाने वाली शक्तियों का विरोध करते और भविष्य में देश का किसी भी प्रकार से विभाजन न् हो इस काम में लगे स्वामी श्रद्धानंद जी के बलिदान को बलिदान मानते तो गांधी जी का व्यक्तित्व सचमुच महान होता। समय पर सच को सच न कहने और झूठ का महिमामंडन या समर्थन या तुष्टीकरण करने की उनकी प्रवृत्ति देश के लिए घातक रही।

डॉ राकेश कुमार आर्य

संपादक : उगता भारत

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