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आज का चिंतन

जहां नारी का सम्मान नहीं होता वहां देवता व अच्छे मनुष्य निवास नहीं करते

ओ३म्
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परमात्मा ने सृष्टि में अनेक प्राणियों को बनाया है जिनमें एक मनुष्य भी है। मनुष्य योनि में मनुष्य के दो भेद स्त्री व पुरुष होते हैं। मनुष्य अल्पज्ञ होता है। इसका अर्थ है कि मनुष्य में जो चेतन अनादि व नित्य जीव है वह अल्प ज्ञान वाला है। उसको पूरा-पूरा ज्ञान नहीं है। यदि माता, पिता और आचार्य मनुष्य की सन्तानों को विद्या दान न दें तो वह ज्ञानी और संस्कारी नहीं बन सकते। जिस मनुष्य के माता-पिता ज्ञानी व शिक्षित नहीं होते उनकी सन्तान अज्ञानी होती है। अज्ञानी मनुष्य कर्तव्य बोध को प्राप्त होने में असमर्थ होता है तथापि यदि माता व पिता सात्विक विचारों के हों, तो वह भी सात्विक वृत्ति का हो सकता है। यदि मनुष्य कुसंगति में रहता है तो फिर वह भी दुर्गुणों व दुव्र्यसनों से ग्रस्त हो जाता है। उसका सुधार तभी हो सकता है कि जब अच्छे आचार्य जो वेद आदि शास्त्रों के ज्ञाता हों, उसे ज्ञान प्रदान करें और उसे दुर्गुणों से होने वाली हानियों से परिचित करा दें। बहुत से लोग शिक्षित तो होते हैं परन्तु उन्हें वेदों का व अच्छे संस्कारों का महत्व पता नहीं होता। वह शिक्षित होकर भी अनुचित व अपराधिक कार्य करते हैं। देश में जो शिक्षितों व सम्भ्रान्त पुरुषों के अपराध व भ्रष्टाचार के कारनामें सामने आते हैं उसका प्रमुख कारण पाश्चात्य शिक्षा व जीवन पद्धति है जिसमें बालकों व युवाओं को संस्कारों से दीक्षित किये जाने का सर्वथा अभाव है। प्रायः अंग्रेजी व अन्य प्रकार की शिक्षा को प्राप्त होकर मनुष्य नास्तिक हो जाते हैं। यह भी बता दें कि नास्तिक केवल ईश्वर को न मानने वालों को ही नहीं कहते अपितु जो ईश्वर का सत्यस्वरूप नहीं जानते और वेदों में की गई ईश्वर की आज्ञा के विपरीत कार्य करते हैं, वह भी नास्तिक होते हैं। दुर्भाग्य से हम जिस समाज में रहते हैं उसमें इसी प्रकार के लोग भी हैं।

परमात्मा ने हमें मानव शरीर, पांच ज्ञान व पांच कर्मेंन्दियों सहित मन, बुद्धि, चित्त व अहंकार आदि उपकरण दिये हंै। क्या हम इसका पूर्ण सदुपयोग करते हैं? यदि कोई मनुष्य असत्य बोलता है, ईश्वर को जानने का प्रयास नहीं करता व ईश्वर के असत्य स्वरूपको मानता है, ईश्वर की विधिपूर्वक उपासना नहीं करता, ईश्वर पर उसका पूर्ण विश्वास नहीं है, वह अपने माता-पिता व पूर्वजों के यश व कीर्ति को दूषित करता है तथा देश व समाज के हितों के विरुद्ध कार्य करता है तो ऐसा मनुष्य नास्तिक भी होता है और एक प्रकार से समाज का अपराधी भी होता है। हमारे यहां अतीत में एक राजा महाराज अश्वपति हुए हैं। उन्होंने ऋषियों को अपने राज्य में निवास व भोजन करने की प्रार्थना की तो ऋषियों ने राजा का आतिथ्य ग्रहण करने से मना करते हुए कहा था कि राजा का अन्न दूषित होता है, इसलिये वह उसका आतिथ्य स्वीकार नहीं कर सकते। इसका उत्तर देते हुए राजा ने उनको कहा था कि हे ऋषियों! मेरे राज्य में कोई चोर नहीं है, कोई कंजूस नहीं है, कोई ऐसा मनुष्य या गृहस्थी नहीं है जो प्रतिदिन ईश्वरोपासना वा अग्निहोत्र आदि न करता हो तथा ऐसा भी कोई मनुष्य नहीं है जो व्यभिचारी हो तो फिर व्यभिचारिणी स्त्री होने का तो प्रश्न ही नहीं है। वैदिक युग के राजा अपनी प्रजा के चरित्र निर्माण पर बल देते थे। आजकल की धर्मनिरपेक्ष व्यवस्था में देश में चोर, कंजूस, ईश्वर की उपासना न करने वाले, व्यभिचारी पुरुष और व्यभिचारी स्त्रियां सभी मिल जायेंगे। इस पर भी हमारे आज के पढ़े लिखे तथाकथित शिक्षित लोग वैदिक युग के श्रेष्ठ कार्यों को भी तिरस्कृत करते हैं और विदेशी शिक्षा व मान्यताओं को ही अपना आदर्श मानते हैं। यह ऐसे लोगों का अज्ञान व वैदिक शिक्षाओं से दूर होना ही कहा जा सकता है।

वेदों में नारी की महत्ता के अनेक वचन प्राप्त होते हैं। वेदों के सुप्रसिद्ध विद्वान आचार्य डा0 रामनाथ वेदालंकार जी ने ‘वैदिक नारी’ पुस्तक की रचना की है। यह वैदिक साहित्य का महत्वपूर्ण ग्रन्थ है। इससे पूर्व ऐसा महत्वपूर्ण ग्रन्थ प्राचीन व अर्वाचीन वैदिक साहित्य में उपलब्ध नहीं होता। इससे वेदों की महत्ता का भी दिग्दर्शन होता है। अन्य मत-मतान्तरों में नारी जाति का ऐसा गौरव गान जैसा वेदों में है, कहीं किसी ग्रन्थ में सुलभ नहीं होता। मनुस्मृति का वह श्लोक भी आर्यसमाज के प्रयासों से अत्यन्त प्रसिद्धि को प्राप्त हुआ है जिसमें कहा गया है कि जहां नारी वा स्त्री की पूजा, सत्कार, मान-सम्मान तथा आदर नहीं होता वहां दिव्य गुणों से युक्त मनुष्य वा देवता निवास नहीं करते। वहां सभी व्यवस्थायें व क्रियायें निष्फल होती हैं। इसका अर्थ यह भी है कि जिस समाज में नारी का सम्मान व आदर नहीं होता, जहां नारियों के अपमान, तिरस्कार, बलात्कार, उनको जलाने, दहेज के लिये कष्ट देने, उनको भोग की वस्तु समझने आदि जैसे कुत्सित विचार होते हैं वहां देवता नहीं अपितु अज्ञानी, मूर्ख, राक्षस वा राक्षसी प्रवृत्तियों के लोगों का निवास रहता है। यह बात सत्य प्रतीत होती है। हमारे देश में बड़े बड़े शिक्षाविद् हैं। देश को आजाद हुए 72 वर्ष से अधिक समय हो रहा है। अनेक आयोग व शिक्षाविदों ने मनुष्य को देवता कोटि का मानव बनाने पर अवश्य विचार किया होगा परन्तु उन्हें समाज में मनुष्य के भीतर आत्मा, मन व बुद्धि से अज्ञान दूर करने तथा मनुष्य की अज्ञान व राक्षसी प्रवृत्तियों को दूर कर देवता बनाने का उपाय ज्ञात न हो सका। हमारे प्राचीन ऋषि मुनि इस विषय को अच्छी प्रकार से जानते व समझते थे। इसी लिये वह सहशिक्षा का विरोध करते थे। बच्चों को गुरुकुलों में रहना पड़ता था जहां आचार्यगण उनके आचार, विचार, व्यवहार, भावनाओं व चरित्र पर गहरी दृष्टि रखते थे और उसको सुधारने के उपाय करते थे जो कुछ कठोर भी हुआ करते थे परन्तु उसका उद्देश्य उस युवक मनुष्य का हित करना होता था।

वैदिक युग का ग्रन्थ मनुस्मृति हमें सुलभ है। इसमें नारी का अपमान करने व दुराचार करने वालों के लिये क्या कहा गया है यह श्लोक 8/372 ‘पुमांसं दाहयेत पापं शयने तप्त आयसे। अभ्याद्दयुश्च काष्ठानि तत्र दह्येत पापकृत्य।।’ में मिलता है। इसका अर्थ है कि अपनी स्त्री (पत्नी) को छोड़कर जो पराई स्त्री से दुराचार या वैश्यागमन करे उस पापी पुरुष को लोहे के पंलग को अग्नि से तपा कर उस पंलग पर उस व्यभिचारी पुरुष को सुला या लेटा कर तथा उस पर लकड़ियां रख कर जिंदा ही अन्य पुरुषों के सामने भस्म कर देना चाहिये। हम कह सकते हैं कि यह कठोर दण्ड है परन्तु ऐसा होने पर नारियों पर अपराध बहुत कम हो जायेंगे। देश में शायद ही कभी ऐसे अपराध सुनने को मिलेंगे जो आजकल हो रहे हैं। मनुस्मृति में जिस अपराध का उल्लेख है उससे भी अधिक घृणित, जघन्य व क्रूर मनोवृत्ति के अपराध आज नारी जाति पर हो रहे हैं जिसे सुनकर ही आत्मा कांप जाती हैं। अतः हमें यहां अरब, ईरान व अमेरिका आदि देशों में ऐसे अपराधों के लिये व्यवहृत कानूनों को ध्यान में रखकर अपने यहां कठोर व्यवस्था करनी होगी। ऐसा न होने पर यह सिलसिला बन्द नहीं होगा। हम देश के लोकप्रिय प्रधानमंत्री जी से आशा करते हैं कि वह इस दिशा में कुछ सार्थक पहल करें जिससे नारी जाति पर अमानवीय अत्याचारों को रोका व कम किया जा सके।

हम यदि चाहते हैं कि नारी जाति पर अत्याचार न हों तो हमें वेदों की ओर लौटना होगा इसी में देश, समाज सहित सभी नारी व पुरुषों का भला होगा। वेद कोई साम्प्रदायिक ग्रन्थ नहीं है। वेद पूर्णतया मानवतावादी दृष्टि से रचे गये ग्रन्थ है जिनका उपदेष्टा इस सृष्टि को रचने वाला परमात्मा है। यह ज्ञान उसने सृष्टि की आदि में दिया था जिसमें संसार के सभी लोगों के पूर्वज सम्मिलित थे। वेद मनुष्यों को देवता अर्थात् दिव्य गुणों से युक्त पुरुष बनाने की योजना वेदों में प्रस्तुत करते हैं। नारी के विषय में वेद एवं वैदिक ग्रन्थों की कुछ महत्वपूर्ण कथनों व शिक्षाओं को हम अग्रिम कुछ पंक्तियों में प्रस्तुत कर रहे हैं। महाभारत के अनुसार आश्रमों में गृहस्थाश्रम की स्थिति सर्वोपरि है। गृहस्थ की स्थिति गृह से है तथा गृह की स्थिति गृहणी अर्थात् नारी से है। नारी का ही नाम गृहिणी है। भगवान व्यास ने महाभारत के 12-364-3 श्लोक में नारी की स्थिति इन शब्दों में उतारी है ‘न गृहं गृहमित्याहुः गृहिणी गृहमुच्यते। गृहं तु गृहिणी हीनमरण्यसदृशं मतम्।।’ ऋग्वेद 3/53/4 के अनुसार जाया अर्थात् नारी ही घर है। स्वामी दीक्षानन्द जी ने लिखा है कि विवाह-मण्डप में स्वयं प्रकृति वधूरूप में अपना साक्षात् दर्शन देती है। सब जगत् की धात्री, सर्वलोक-नमस्कृता, सबकी माता, उस देवी को नारीरूप में साक्षात् देखकर उसकी महिमा और यशोगान करने की अभिलाषा किसे न होगी? पारस्कर गृह्यसूत्र 1/7/2 में कहा किया है ‘जिसमें भूतकाल के प्राणियों ने जन्म पाया, जिसमें सारा जगत् आश्रित है, जो सबकी जननी है, वह नारी जिस उत्तम यश की पात्र है, उस यशोगाथा को आज हम गाते हैं।’

आचार्य डा0 रामनाथ वेदालंकार जी लिखते हैं ‘हे नारी! तू राष्ट्र के वीरों की जननी है, राष्ट्र के विद्वानों की जननी है, राष्ट्र के वैज्ञानिकों, शिल्पियों और कलाकारों की जननी है, राष्ट्र की बागडोर थामने-वाले राजाओं और राजपुरुषों की जननी है, राष्ट्र के उत्थान की प्रेरणा देनेवाले सर्वस्वत्यागी ब्राह्मणों की जननी है, राष्ट्र-रक्षा के लिए स्वयं को बलिदान कर देने वाले वीर क्षत्रियों की जननी है, राष्ट्र को समृद्धि के शिखर पर पहुंचाने वाले उद्योगी उद्योगपतियों की जननी है। तेरे जननी-रूप को हम प्रणाम करते हैं। वेदों में राष्ट्र के लिए जिस दिव्य सन्तान की कामना की गयी है, वह सन्तान तेरी ही कुक्षि से जन्म लेती है।’ ऋग्वेद मन्त्र 8/33/9 में कहा गया है कि ‘हे स्त्री! तू नीचे दृष्टि रख, ऊपर नहीं, पैरों को संश्लिष्ट रखकर चल। ऐसा वेश पहन कि अंग उधड़े न रहें। तू यज्ञ की ब्रह्मा है।’ शंकराचार्य जी ने कहा है ‘प्रसव के समय असह्य शूलवेदना होती है, खाने-पीने में रुचि न रहने से शरीर सूख जाता है और प्रसव के बाद सौर में मल-मूत्रवाली शय्या पर सोना पड़ता है, इन कष्टों को जाने भी दें तो भी गर्भभार को वहन करने में जो महान् क्लेश होता है अकेले उसी एक का बदला चुकाने में भी पुत्र असमर्थ है, चाहे वह कितना ही उन्नत क्यों न हो गया हो। उस माता को मेरा नमस्कार है।’ वसिष्ठ धर्मसूत्र 13/48 में बताया गया है कि ‘उपाध्याय से दस गुणा आचार्य का, आचार्य से सौ गुणा पिता का और पिता से हजार गुणा माता का गौरव अधिक होता है।’

वेदों में मनुष्य को मनुष्य बनने की प्रेरणा की गई है। मनुष्य तब बनता है जब वह दिव्य गुणों को धारण करता है। हम समझते हैं कि हमारे प्राचीन गुरुकुल व उनके आचार्य बालकों तथा युवाओं में दिव्य गुणों का आधान करने का ही कार्य करने के साथ उन्हें धर्म, ज्ञान, विज्ञान सहित सभी विषयों की शिक्षा देते थे। यदि देश में मनुष्यों के जीवन से दुरित व प्रदुषित विचारों, भावनाओं, पाप व अधर्म को हटाना है तो उसके लिये वेदों सहित वैदिक साहित्य से युक्त गुरुकुलीय शिक्षा प्रणाली को अपनाना होगा। वर्तमान शिक्षा प्रणाली मनुष्य को मनुष्य बनाने में विफल है। वेद ज्ञान विहीन धर्म गुरुओं व प्रचारकों सहित बड़े राजनेताओं व अधिकारियों को जब भ्रष्टाचार में जेलों में जाते देखते हैं तथा उन पर आरोपों की जांच से सामने आने वाले दुरितों की जब चर्चा सुनते हैं तो हमें इसका कारण माता, पिता व आचार्यों के दोष सहित उनके अनुचित लोभ ही विदित होते हंै। लेख को विराम देते हुए हम निवेदन करना चाहते हैं कि देश में सभी बच्चों को वेदों के ज्ञान को पढ़ाया जाना चाहिये। उन्हें कर्मफल सिद्धान्त, पुनर्जन्म सिद्धान्त, आत्मा की अमरता तथा ईश्वर के स्वरूप व उपकारों के बारे में भी बाल्यकाल से बताया जाना चाहिये। सामिष भोजन पर प्रतिबन्ध होना चाहिये। सभी देशवासी सात्विक व शाकाहारी भोजन करें। नशा तथा मांसाहार पूर्णतः प्रतिबन्धित होने चाहिये जैसा कि वैदिक काल में महाराज अश्वपति के समय में रहा है। ऐसा होने पर ही मनुष्य तामसी राक्षसी प्रवृत्तियों से दूर होकर देवता बन सकता है और जन्म-जन्मान्तर में अपनी आत्मा की उन्नति व मोक्ष को प्राप्त हो सकता है। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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