युवाओं व बच्चों को वेदों के सिद्धांत समझाने की आवश्यकता है : महात्मा चैतन्य स्वामी

ओ३म्
-आर्यसमाज धामावाला-देहरादून का 140वां वार्षिकोत्सव सोल्लास सम्पन्न-

आर्यसमाज धामावाला-देहरादून के 22 से 24 नवम्बर, 2019 तक तीन दिवसीय वार्षिकोत्सव का रविवार 24-11-2019 को सोल्लास समापन हुआ। समापन समारोह में हरिद्वार से पधारी बहिन श्रीमती मिथलेश आर्या जी के भक्तिरस एवं ऋषि भक्ति से भरे भजन हुए, मण्डी-हिमाचलप्रदेश से पधारे महात्मा चैतन्य स्वामी जी तथा सोनीपत-हरयाणा से पधारे आचार्य सन्दीप आर्य जी के ज्ञानवर्धक एवं प्ररेक प्रवचन हुए। इस लेख में हम श्रीमती मिथलेश आर्या जी के भजन एवं महात्मा चैतन्य स्वामी जी के सम्बोधन का विवरण प्रस्तुत कर रहे हैं। आचार्य सन्दीप आर्य जी का सम्बोधन हम एक पृथक लेख के द्वारा प्रस्तुत कर चुके हैं। बहिन श्रीमती मिथलेश आर्या जी ने भजनों का कार्यक्रम प्रस्तुत करते हुए एक भजन प्रस्तुत किया जिसके बोल थे ‘कौन कहे तेरी महिमा कौन कहे तेरी माया।’ बहिन जी ने दूसरा भजन प्रस्तुत किया जिसके बोल थे ‘मेरा मन शिव संकल्प वाला हो, दूर-दूर तक जो जाये हर पल वह शिव संकल्पों वाला हो’। भजनों की समाप्ति पर आर्यसमाज के मंत्री श्री सुधीर गुलाटी जी ने बहिन श्रीमती मिथलेश आर्या जी का धन्यवाद किया।

महात्मा चैतन्य स्वामी जी ने अपना सम्बोधन आरम्भ करते हुए अपने पूर्व वक्ताओं के विचारों की प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि बच्चों व युवाओं को आर्यसमाज के सिद्धान्तों को समझाने की आवश्यकता है। युवाओं को धर्म और अध्यात्म का ज्ञान नहीं है। मत-मतान्तर इतने अधिक हैं कि देश के युवा व अन्य लोग विक्षिप्त या नास्तिक हो गये हैं। आर्यसमाज को ऐसे लोगों के पास जाने और उन्हें समझाने की आवश्यकता है। स्वामी जी ने अपना एक संस्मरण सुनाया। उन्होंने कहा कि एक बार उन्होंने बच्चों के विद्यालय में व्याख्यान दिया था। वहां की एक छोटी बच्ची ने व्याख्यान सुना और स्वामी जी से कहा कि उन्होंने जो उपदेश किया है, उस बच्ची ने यह माना है कि वह उपदेश उसी के लिये ही किया गया है। उसने स्वामी जी को बताया था कि वह उपदेश के अनुरूप ही बनेगी। स्वामी जी ने बताया कि जीवन बदलता कैसे है? वह कन्या अब कनाडा में रहती है। वहां हमारे सीबीआई विभाग की तरह एक विभाग में वह उच्चाधिकारी है। स्वामी जी के व्याख्यान में की गई प्रेरणा से वह वहां पहुंची है ऐसा उसने स्वामी जी को बताया था। स्वामी जी की प्रेरणा से इंग्लैण्ड में कार्य कर रही एक अन्य कन्या ऋचा वर्मा ने स्वामी जी को बताया कि उसने वहां इंजीनियरिंग की एक परीक्षा में सर्वप्रथम स्थान प्राप्त किया है। वह अपनी इस सफलता को स्वामी जी की प्रेरणा का परिणाम मानती है। उसने एक आर्यसमाज में स्वामी जी का उपदेश सुना था जिसकी प्रेरणा से जीवन व्यतीत करते हुए वह इस सफलता को प्राप्त हुई है। एक अवसर पर उसने स्वामी जी को बताया कि उसने स्वामी जी का व्याख्यान नोट कर लिया था और संकल्प लिया था कि उसे जीवन में उस स्थान पर पहुंचना है। स्वामी जी ने कहा कि बड़ी व छोटी आयु के लोगों को विद्वान आचार्यों तथा आर्यसमाज के सत्संगों में जाने से लाभ मिलता है। स्वामी जी ने बताया कि वह भी लेखन के द्वारा प्रचार का काम करते हैं।

महात्मा चैतन्य स्वामी जी ने आर्यसमाज के छठे नियम का उल्लेख कर कहा कि संसार का उपकार करना आर्यसमाज का मुख्य उद्देश्य है। संसार का उपकार करने से पहले हमें अपने व्यक्तित्व का निर्माण करना आवश्यक है। यदि हमारे व्यक्तित्व का निर्माण नहीं होगा तो हमारे द्वारा किये जाने वाले प्रचार का प्रभाव नहीं होगा। स्वामी जी ने एक विदेशी लेखक का उल्लेख कर बताया कि उसकी डायरी के अनुसार युवावस्था में उसके अन्दर बड़े बलबले थे। उसने संसार को बदलने का संकल्प लिया था। उसने कार्य भी किया। वह प्रौढ़ हो गया। वह संसार नहीं बदल सका। स्वामी जी ने ऋषि दयानन्द जी के जीवन का उल्लेख कर बताया कि प्रचार करते हुए उन्होंने अनुभव किया था कि उनके प्रचार का प्रभाव नहीं हो रहा है। उन्होंने साधना की जिससे उनके अन्दर ओज व तेज उत्पन्न हुआ। उसके बाद जो कोई उनके पास आया वह उन्हीं का हो गया। महात्मा चैतन्य स्वामी जी ने कहा कि ऋषि दयानन्द ने देश हित व समाज सुधार सहित अनेकानेक काम किये। ऋषि दयानन्द ने प्रचार से पूर्व अपना निर्माण किया था। महात्मा चैतन्य स्वामी जी ने भक्त अमीचन्द जी के जीवन का उल्लेख कर कहा कि उनको उनकी पत्नी, मित्रों व अन्य परिवार जनों ने बुराईयां छोड़ने के विषय में अवश्य ही समझाया होगा परन्तु उनके परामर्शों का अमीचन्द जी के मन पर असर नहीं हुआ। वह झेलम-पाकिस्तान में ऋषि के सत्संग में गये थे और उनसे अनुमति लेकर एक भजन गाया था। स्वामी दयानन्द जी ने उनके भजन व गायन की प्रशंसा भी की थी। अमीचन्द जी बहुत अच्छा गाते थे और संगीत विद्या में निपुण थे। महात्मा चैतन्य स्वामी ने जयपुर के एक संगीत समारोह का उल्लेख कर बताया कि वहां के राजा ने आग्रहपूर्वक स्वामी दयानन्द जी को उस सम्मेलन में बुलाया था। वहां एक मुस्लिम गायक ने शास्त्रीय धुन पर आधारित गीत सुनाया था। गाायक ने स्वामी जी की मुख मुद्रा को देखकर अनुमान किया था कि स्वामी जी को संगीत का ज्ञान है और वह उसके गीत व संगीत की बारीकियो को समझ रहे हैं। यह मुस्लिम गीतकार उच्च कोटि का गायक था। उसने गीत समाप्ति के बाद अवसर मिलने पर स्वामी जी से पूछ लिया कि उनको उसका गीत कैसा लगा? स्वामी जी ने उसके गीत की प्रशंसा की और कहा कि यदि आप अमुक स्वर नाभि से उठाते तो अच्छा होता। उस गायक ने ऋषि को बताया कि उसको इस विषय में शंका थी परन्तु उसको बताने वाला कोई नहीं था। उसने मार्गदर्शन करने के लिये ऋषि दयानन्द की प्रशंसा की और उनका धन्यवाद किया। महात्मा चैतन्य स्वामी ने बताया कि ऋषि दयानन्द संगीत का भी उच्च कोटि का ज्ञान रखते थे। ऋषि जीवन के इस पक्ष पर विद्वानों द्वारा उचित ध्यान नहीं दिया गया।

महात्मा चैतन्य स्वामी जी ने लोगों को योग साधना करने की प्रेरणा की। उन्होंने कहा कि ईश्वर हमें क्या और कितना देता है इसका हम अनुमान भी नहीं कर सकते। इसके बाद स्वामी जी ने भक्त अमीचन्द का प्रकरण पूरा किया। ऋषि को झेलम के लोगों ने अमीचन्द की चारित्रिक बुराईयां बताई थी परन्तु उसके बाद भी ऋषि ने अमीचन्द को उनके सत्संग में भजन प्रस्तुत का करने का अवसर दिया। उनके भजन की समाप्ति पर ऋषि ने अमीचन्द के संगीत के ज्ञान व भजनों के गायन की प्रशंसा कर कहा था कि ‘अमीचन्द! तुम हो तो हीरे, पर कीचड़ में पड़े हुए हो।’ स्वामी जी ने कहा कि ऋषि की वाणी में शक्ति थी। इससे ऋषि दयानन्द द्वारा अमीचन्द को कहे शब्दों से उसका जीवन बदल गया। उसकी सारी दुर्बलतायें दूर हो गयी और वह एक महात्मा बन गया। महात्मा चैतन्य स्वामी जी ने कहा कि इमें अपने आप को आध्यात्मिकता से जोड़ने की आवश्यकता है। उन्होंने पूर्व में जिस विदेशी लेखक का प्रसंग प्रस्तुत किया है, वह संसार को नहीं बदल सका। उसने अपना लक्ष्य छोटा किया और अपने परिवार को बदलने का प्रयत्न करने लगा। वह बूढ़ा हो गया। वह अपने परिवार को भी नहीं बदल सका। वह अपनी डायरी में लिखता है कि यदि उसने स्वयं को बदला होता, स्वयं को योग्य बनाता तो वह लक्ष्य को पूरा कर सकता था।

महात्मा चैतन्य स्वामी जी ने अन्तःकरण चतुष्टय की चर्चा की। उन्होंने कहा कि अहंकार का अर्थ आत्मा का अपनी स्मृति में बने रहना है। चित्त व मन को स्वामी जी ने अलग-अलग बताया। योगाभ्यास करने से चित्त एवं मन को देखा वा ठीक ठीक जाना जा सकता है। योग दर्शन एवं ऋषि के ग्रन्थों का अध्ययन कर इन्हें समझने का प्रयत्न करना चाहिये। स्वामी जी ने कहा कि अन्तःकरण चतुष्टय को जानने पर अपना व समाज का कल्याण किया जा सकता है। स्वामी जी ने आगे कहा कि हमें अपने अन्तःकरण साधना है। चारों वेदों का ज्ञान मन में प्रतिष्ठित है। स्वामी जी ने कहा कि हमारे ऋषि अपने मन व अन्तःकरण को साधना से जानते थे। उनके ज्ञान का स्तर बहुत ऊंचा होता था। स्वामी जी ने मन को साधने व उस पर नियंत्रण करने की आवश्यकता बताई। हमें अपने मन को अपना मित्र बनाना है। अधिकांश लोगों का मन स्वामी और आत्मा नौकर की तरह कार्य करती है। हमारी आत्मा और मन में विवाद नहीं होना चाहिये। आज हमारी स्थिति यह है कि आत्मा का नौकर मन स्वामी बना बैठा है। नौकर अर्थात् मन आत्मा अर्थात् स्वामी की बातें नहीं मानता है। स्वामी जी ने यह भी बताया कि मन के दो कार्य हैं संकल्प एवं विकल्प करना। उन्होंने मन को संकल्पशील बनाने की सलाह दी। हमारा मन विकल्प प्रधान नहीं बनना चाहिये। मन के संकल्पशील बन जाने पर यह हमें आत्मा के साध्य ईश्वर के पास ले जायेगा। जिस मनुष्य की बुद्धि अनिर्णयात्मक होती है उसे इससे लाभ नहीं अपितु हानि होती है। हमें बुद्धि को निर्णयात्मक बनाना है। हम यदि वेदों के विद्वान आचार्यों के चरणों में बैठेंगे तो हमारी बुद्धि निर्णायात्मक बनेगी।

महात्मा चैतन्य स्वामी जी ने कहा कि अंग्रेजी शब्द माइण्ड संशयात्मक बुद्धि को कहते हैं। इन्टलैक्ट निर्णयात्मक बुद्धि होती है। चित्त वह है जिसमें अतीत, वर्तमान और भविष्य की स्मृतियों का संग्रह होता है। यह हमारी संकल्पनाओं का आश्रय स्थान है। स्वामी जी ने श्रोताओं को भूतकाल की गलतियों को न करने की सलाह दी। हमें अपने चित्त को वर्तमान काल के संकल्पों में लगाना है। ऐसा करके हम अपने जीवन को लक्ष्य पर पहुंच सकते हैं। स्वामी जी एक अच्छे लेखक हैं। आपने साहित्य की अनेक विधाओं पर रचनायें की हैं जिसमें ‘क्षणिकायें’ भी सम्मिलित हैं। क्षणिका 3 या 4 पंक्ति की होती है। स्वामी जी ने कहा जो मनुष्य अपने समय को बर्बाद करता है समय उस मनुष्य से डरता है। स्वामी जी ने अपनी एक क्षणिका बताई ‘अगला क्षण सहमा सहमा देहली पर खड़ा है। ये आदमी मुझे भी बर्बाद कर देगा, इस बात से डरा है।।’ स्वामी जी ने हिन्दी कवि अज्ञेय जी के उपन्यास ‘नदी के द्वीप’ की प्रशंसा की और उसके पात्रों के द्वारा कहे मृत्यु विषयक संवादों पर प्रकाश डाला। स्वामी जी ने कहा कि हमें अपने चित्त को वर्तमान में लगाने का प्रयास करना चाहिये। उन्होंने बताया कि योग चित्त की वृत्तियों के निरोध का नाम है। महात्मा जी ने आगे कहा कि जिसने अपने चित्त को ध्येय पर लगाना सीख लिया उसका ध्यान में प्रवेश हो जाता है। अपने स्वरूप में स्थित हो जाने को स्वामी जी ने समाधि अवस्था बताया। उन्होंने कहा ‘खुद की न की तलाश बड़ी भूल हो गई। यूं तो किये खराब खुदा की तलाश में।।’ यदि हम अपने आप को नहीं खोजते तो हमारे सभी साधन व कार्य व्यर्थ हैं। स्वामी जी ने कहा कि हमें पहले आर्यत्व को प्राप्त करना है। इसके लिये उन्होंने उपासना योग को अपनाने की सलाह दी।

महात्मा चैतन्य स्वामी जी ने कहा कि गृहस्थ मनुष्य को कम से कम एक घंटा प्रातः व सायं योगियों की तरह ईश्वर का ध्यान करना चाहिये। स्वामी जी ने जालन्धर में महिलाओं के सत्संग का उल्लेख कर उसकी विशेषताओं को बताया और कहा कि हमें निराश नहीं होना चाहिये। स्वामी जी ने कहा कि ‘खुद को बदलो संसार बदल जायेगा। विष कण्टक वन भी उपवन बन जायेगा। आदमी जिस दिन जीना सीख लेगा। उस दिन उसका जीवन सरगम बन जायेगा।’ इसी के साथ महात्मा चैतन्य स्वामी जी ने अपने सम्बोधन को विराम दिया। आर्यसमाज के मंत्री श्री सुधीर गुलाटी जी ने स्वामी जी के विचारों की प्रशंसा की और उनका धन्यवाद किया। इसके बाद विद्वानों का सम्मान, श्रीमती मिथलेश आर्या जी के भजन तथा महात्मा चैतन्य स्वामी जी द्वारा कुछ सदस्यों की शंकाओं का समाधान किया गया। मंत्री जी एवं प्रधान डा0 महेश कुमार शर्मा जी ने उत्सव में पधारे विद्वानों तथा श्रोताओं सहित प्रत्येक व्यक्ति का धन्यवाद ज्ञापित किया। शान्ति पाठ के साथ तीन दिवसीय आर्यसमाज धामावाला-देहरादून के उत्सव का समापन हुआ। इसके बाद सभी लोगों ने ऋषि लंगर ग्रहण किया। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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