संसार के आदि व्यवस्थापक महर्षि मनु और भारत की धर्मनिरपेक्ष राजनीति

हमारे वेदों के अनुसार सृष्टि के आदि व्यवस्थापक महर्षि मनु के संविधान अर्थात मनुस्मृति के अनुसार संपूर्ण संसार कभी व्यवस्थित , अनुशासित और मर्यादित रहा है । यह अलग बात है कि अपने इस महामानव के साथ हम आज भी अन्याय कर रहे हैं , और मनुवादी मनुवादी व्यवस्था कहकर व्यवस्था को कोसने का काम कुछ लोग कर रहे हैं । परंतु यदि निष्पक्षता से इस महान व्यक्तित्व के विषय में अनुसंधान किया जाए तो पता चलता है कि संपूर्ण मानवता महर्षि मनु की विचारधारा से प्रेरित रही है , और उनके आदि संविधान की न केवल प्रशंसक रही है अपितु आज भी ऋणी है।

डॉ सुरेंद्र कुमार लिखते हैं कि श्री पी० वी० काणे के अनुसार दक्षिणी वियतनाम में खुदाई में प्राप्त अभिलेखों में मनु के श्लोक उध्दृत मिलते हैं। इन्द्रवर्मा प्रथम (1799 ई०) के अभिलेख में राजधानी का वर्णन करते हुए लिखा है कि वहां निरुपद्रव वर्णाश्रम व्यवस्थिति थी। वर्मा का संविधान मनु पर आधारित था जिसका नाम ‘धम्मथट्’ अथवा ‘मनुसार’ था। बुद्धघोष ने सोलहवीं शाताब्दी में उसका पाली अनुवाद ‘मनुसार’ के नाम से किया था।

कम्बोडिया के लोग स्वयं को मनुवंशी मानते रहे हैं। राजा उदयवीर वर्मा के अभिलेख में वहां के संविधान का नाम ‘मानव नीतिसार’ दिया है। जय वर्मा प्रथम के अभिलेख से ज्ञात होता है कि वहां ‘मनुसंहिता’ को आदर से पढ़ा जाता था। जय वर्मा पंचम (668 ईस्वी) के एक अभिलेख में घोषणा की है कि उसने वर्णाश्रम व्यवस्था की स्थापना दृढ़ता से की। यशोवर्मा के “प्रसम कोमनप” नामक स्थान से प्राप्त अभिलेख में मनुस्मृति का २.१३६ श्लोक उध्दृत है जिसमें सम्मान व्यवस्था के मानदण्ड वर्णित हैं।

फिलीपीन के निवासी यह मानते रहे हैं कि उनकी आचार संहिता मनु और लाओत्से की स्मृतियों पर आधारित है। इसी कारण वहां की प्राचीन विधानसभा के द्वार पर इन दोनों की मूर्तियां स्थापित की गई थीं।

इंडोनेशिया के बालिद्वीप में आज भी वर्णव्यवस्था का व्यवहार है। वहां उच्च जातियों को ‘द्विज’ और शूद्रों को ‘एकजाति’ कहा जाता है। यही मनुस्मृति के १०.४ श्लोक में वर्णित है। वहां अब तक शूद्रों के साथ छुआछूत का भाव नहीं है, जो मनुस्मृति की मौलिक व्यवस्था में था।

ब्रिटेन और अमेरिका से प्रकाशित ‘इन्साइक्लोपीडिया’ ‘द कैम्ब्रिज हिस्ट्री आफ इंडिया’, श्री केवल मोटवानी द्वारा लिखित ‘मनु धर्मशास्त्र: ए सोशियोलोजिकल एण्ड हिस्टोरिकल स्टडी’, डॉ० सत्यकेतु विद्यालंकार द्वारा रचित ‘दक्षिण-पूर्वी और दक्षिण एशिया में भारतीय संस्कृति’ नामक पुस्तकों में मनुस्मृति के विश्वव्यापी प्रभाव का वर्णन है। उनके अनुसार एशिया, यूरोप, अमेरिका और आस्ट्रेलिया द्वीपों के अधिकांश देशों में मनु के नाम और प्रभाव के प्रमाण मिलते हैं। मनु वैवस्वत के समय घटी जलप्रलय की घटना का उल्लेख प्रायः सभी प्राचीन देशों के साहित्य में मिलता है। बाइबल और कुरान में मनु का नाम विकृत होकर ‘नूह’ हो गया है जबकि आदिम अर्थात् ‘ब्रह्मा’ आदम हो गया है। यह विश्वव्यापी उल्लेख विश्व के मानव समाज को किसी न किसी प्रकार मनु के स्मरण, उनकी संस्कृति और उनके योगदान से जोड़ता है। यहां प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि मनु के इस विश्वव्यापी स्मरण का आखिर कारण क्या है? उत्तर स्पष्ट है कि तत्कालीन समाज के लिए मनु का योगदान अप्रतिम था। वह कृतज्ञता ही विश्व के लोगों के मस्तिष्क पर अभिलेख बनकर अंकित हो गई है।

इसके उपरांत भी भारत की धर्मनिरपेक्ष राजनीति हमारे इस महामानव को न केवल लील जाने का काम कर रही है अपितु इसका नाम लेने तक से परहेज कर रही है । आज इतिहास के पुनर्लेखन की इसलिए भी आवश्यकता है कि संपूर्ण मानवता को अपनी विचारधारा से प्रेरित करने वाले महर्षि मनु जैसे लोगों को विश्व का आदि व्यवस्थापक स्थापित कर उन्हें उचित सम्मान दिया जाए । वोटों की राजनीति में मस्त राजनीतिज्ञों से ऐसी अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वह महर्षि मनु के व्यक्तित्व का सही सही मूल्यांकन कर उन्हें इतिहास में स्थान देने के लिए पहल करेंगे । इसके लिए तो समाज के जागरूक और भारतीय संस्कृति और धर्म से प्रेम करने वाले लोगों को ही आगे आना होगा । विशेष रूप से आर्य समाज को इस क्षेत्र में अधिक कार्य करने की आवश्यकता है।

डॉ राकेश कुमार आर्य

संपादक : उगता भारत

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