मनुष्य कितना विकास कर ले बिना गोवर्धन किए वह सुरक्षित नहीं

-गोवर्धन पर्व पर प्रस्तुत लेख-

-मनमोहन कुमार आर्य, देहरादून।
परमात्मा ने मनुष्य को अपने पूर्वजन्म के कर्मानुसार सुख व दुःख का भोग करने के लिये जन्म दिया है। मनुष्य को सुख भोगने के लिये स्वस्थ शरीर की आवश्यकता होती है। स्वस्थ शरीर का आधार युक्त आहार-विहार होता है। मनुष्य के स्वास्थ्य के तीन आधार भी बताये जाते हैं जो कि आहार, निद्रा, संयम वा ब्रह्मचर्य हैं। नवजात शिशु अपनी माता का दुग्ध पान कर ही वृद्धि को प्राप्त होता है। माता के दुग्ध पर उसकी शिशु रूपी सन्तान का अधिकार होता है परन्तु आधुनिकता के कारण आजकल की मातायें अपनी सन्तानों को स्तनपान कराने के स्थान पर बाजार में बिकने वाले पाउण्डर के दूध पर निर्भर रहती हैं। हमें लगता है कि इससे वह अपना व अपनी सन्तान का हित करती हैं। सृष्टि के आरम्भ से कुछ वर्ष पहले तक और आज भी अधिकांश महिलायें अपने शिशुओं को अपना ही दुग्ध पिलाना पसन्द करती आ रही हैं। इससे सन्तान सुखी रहती है। उसमें तीव्रता से अंग-प्रत्यंगों की वृद्धि होती है और वह अनेक प्रकार के रोगों से बचा रहता है। अपनी माता का दुग्धपान करने वाले छोटे बच्चों में रोगों से लड़ने की क्षमता बाजारी डिब्बों का दूध पीने वाले बच्चों से कहीं अधिक होती है। यह बात आज की आधुनिक माताओं को समझ में नहीं आती। माता के दुग्ध के बाद सन्तान के लिये भारतीय देशी गाय का दुग्ध होता है। यह दुग्ध भी लगभग माता के समान गुणों वाला होता है। राम, कृष्ण, हनुमान, भीष्म और भीम बाजारी दूध पीकर नहीं अपितु अपनी माताओं का दुग्ध पीकर ही बलवान एवं दीर्घायु बने थे। स्वामी विरजानन्द सरस्वती, स्वामी दयानन्द, नेताजी सुभाषचन्द्र बोस, चन्द्रशेखर आजाद, रामप्रसिद बिस्मिल तथा भगत सिंह जी आदि ने भी अपनी माता का ही दूध पीया था। आज भी इनके यश की गाथायें हम पढ़ते, सुनते व गाते हैं। रामचन्द्र जी के पूर्वजों के गोपालन सहित कृष्ण जी द्वारा स्वयं गोपालन की विशेष चर्चा हमें पौराणिक व इतिहास की कथाओं में पढ़ने को मिलती है। गोदुग्ध एवं इससे बने पदार्थों से शारीरिक बल की प्राप्ति आदि अनेक लाभ होते हैं। इस पर हमारे अनेक विद्वानों ने पुस्तकें भी लिखी हैं। ऋषि दयानन्द जी की गोकरुणानिधि सहित पं0 प्रकाशवीर शास्त्री की ‘गोहत्या राष्ट्र हत्या’, ‘गऊ माता विश्व की प्राण दाता’, ‘गोरक्षा राष्ट्ररक्षा’ आदि अनेक पुस्तकें आर्य विद्वानों ने लिखी हैं। इन पुस्तकों को पढ़कर गाय का मनुष्य के जीवन में महत्व जाना जा सकता है।

देशी गाय के दुग्ध के अभाव में मानव जीवन की रक्षा में अनेक प्रकार की अव्यवस्थाओं एवं कठिनाईयों के उपस्थित होने का भय है। गोदुग्ध के अपने गुण होते हैं। यह गुण अन्य किसी पशु के दुग्ध और खाद्यान्न आदि पदार्थों में नहीं हैं। यदि हमें गोदुग्ध नहीं मिलेगा तो हमारा शरीर गोदुग्ध के पौष्टिक गुणों से वंचित होने से उसके दुष्परिणाम हमें भोगने होंगे। आजादी से पहले देश में प्रचुर गोदुग्ध देश में सुलभ था। आज गांवों में तो इसका मिलना सम्भव हो सकता है परन्तु नगरों में देशी गाय का दुग्ध विलुप्त व दुर्लभ हो चुका है। गलत सरकारी नीतियों के कारण गोहत्या का आरम्भ सन् 1947 में आजादी के दिनों में ही हमारे अदूरदर्शी व अविवेकी शासकों के द्वारा किया गया। हमारे शासकों की शिक्षा-दीक्षा विदेशों में होने के कारण वह भारतीय प्राचीन इतिहास, परम्पराओं एवं वैदिक ज्ञान के महत्व से सर्वथा अनभिज्ञ थे। ऐसे विदेशी भाषा एवं पाश्चात्य-संस्कृति प्रेमियों का देश की राजनीति पर दबदबा था। उन्होंने विदेशियों का अन्धानुकरण किया और भारत की परम्पराओं की उपेक्षा की। इसी का परिणाम था कि देश में गोहत्या जारी रही और गोमांस का विश्व के देशों में निर्यात भी किया जाने लगा जो आज भी जारी है। हमारे नीति निर्धारक कभी यह महसूस करने का प्रयास नहीं करते कि इससे गाय की आत्मा को कितना कष्ट होता है? अपने शरीर में कहीं एक कांटा चुभे तो यह त्राहिमान या हायतोबा कर देंगे परन्तु गाय के प्रति इनमें दया व मानवीय संवेदना दृष्टिगोचर नहीं होती? देश का यह दुर्भाग्य है कि ऐसा कोई शासक नहीं हुआ जिसके हृदय में स्वामी दयानन्द जी जैसा हृदय व दिल रहा हो जो गाय के दुःखों से पीड़ित होता हो। यदि होता तो वह इस गोहत्या के कुकृत्य को जारी न रखता। संविधान बनाने वाले लोगों ने भी बहुसंख्यक हिन्दुओं की भावनाओं की अनदेखी की है। वह विदेशी अतार्किक विचारधारा से प्रभावित थे। इसी कारण यह कहा जाता है कि हमें अधूरी आजादी मिली थी। देश विभाजन स्वीकार किया गया जिसके कारण हमारे लाखों भाई हिंसा का शिकार हुए और असभ्य एवं हैवानियत से मारे गये।

जिस देश में निर्दोष व मूक मनुष्यों के लिए लाभकारी पशुओं की हत्या की जाती हो तथा मांस को आहार में सम्मिलित किया जाता हो, हमें लगता है कि यह कोई बुद्धिमत्ता कार्य नहीं है। गाय, घोड़ा तथा हाथी का ही उदाहरण लें तो यह शाकाहारी पशु अपना जीवन पूरे बल व निरोग रहकर जीवित रहते हैं और समाज का अनेक प्रकार से उपकार व हित करते हैं। मनुष्य घोड़े व हाथी के समान बलवान नहीं है। मांसाहारी पशु में न अधिक बल होता है न अधिक बुद्धि, इसके विपरीत वह भय से भी युक्त होते हैं। हम सुनते आये हैं कि शेर भी हाथी पर सामने से आक्रमण न कर पीछे से आक्रमण करता है। इसी से उसके बल का अनुमान होता है। घोड़ा घास खाता है और सबसे तेज दौड़ता है। वह शक्ति की ईकाई हार्सपावर का भी आधार है। शाकाहारी मनुष्य बल में मांसाहारी मनुष्यों से कम नहीं होता। आयु की दृष्टि से भी शाकाहारी मनुष्य की आयु अधिक होती है। महाभारत से ज्ञात होता है कि हमारे सभी पाण्डव व कौरव भी शाकाहारी थे। भीष्म जी 180 वर्ष की आयु के थे, युद्ध करते थे तथा बड़े बड़े वीरों को परास्त करते थे। अर्जुन व कृष्ण जी परस्पर मित्र थे और दोनों की आयु 120 वर्ष लगभग थी। ऐसे उदाहरणों से शाकाहारी जीवन का महत्व सुस्पष्ट हो जाता है। हमें शाकाहारी रहना है और शाकाहार के पक्ष तथा मांसाहार के विरोध में जन-जाग्रती का आन्दोलन कर सरकार को देश से मांसाहार को समाप्त करने के लिये अपनी प्रार्थना को मनवाना है। ऋषि दयानन्द ने तो परतन्त्रता के दिनों में ही अंग्रेज अधिकारियों के सम्मुख गोहत्या बन्द करने के लिये अनेक प्रयत्न किये थे। इसी के अन्तर्गत उन्होंने गोकरुणानिधि पुस्तक की रचना की थी। उन्होंने देश भर में गोहत्या अर्थात् पशु-हत्या को रोकने के लिये देश के करोड़ों लोगों का हस्ताक्षर-अभियान भी चलाया था। वह महारानी विक्टोरिया को गोहत्या निषेध कानून बनाने के लिये ज्ञापन भेजना चाहते थे। असामयिक मृत्यु ने उनके इस मनोरथ को पूरा नहीं होने दिया। यदि वह जीवित होते तो निश्चय ही इस काम को पूरा करने का प्रयत्न करते और इसे इसके परिणाम तक पहुंचाते। ऋषि दयानन्द के बाद भी आर्यसमाज और पौराणिक समाज ने गोरक्षा के प्रयत्न किये परन्तु शासकों की इस विषय में विरोधी नीति के कारण इसमें सफलता नहीं मिली। वर्तमान में आर्यसमाज ने इस विषय पर विचार करना प्रायः बन्द कर दिया है। अब आर्यसमाज के विद्वानों व संगठन द्वारा इस विषय पर विचार व चर्चा नहीं की जाती और इसके दुष्परिणामों से देशवासियों को अवगत नहीं कराया जाता। इसका परिणाम अच्छा नहीं होगा, यही कहा जा सकता है।

महाभारत युद्ध के बाद देश तथा विश्व में अन्धकार छा गया था। ऐसे समय में देश में धर्म एवं संस्कृति को सुरक्षित रखने के लिये अनेक परम्पराओं का शुभारम्भ हुआ था। हमें गोवर्धन पूजा भी ऐसे ही पर्वों में से एक पर्व प्रतीत होता है। इस पर्व का उद्देश्य लोगों में गोरक्षा के प्रति कर्तव्य भावना को उत्पन्न करना था। हम अनुमान कर सकते हैं कि जब गोभक्षक लोग भारत में आये और हमें पराधीन बनाया तो हमारे पूर्वजों को गोरक्षा में कितनी मुसीबतें एवं कठिनाईयां आई होंगी। अनेक लोगों ने अपने बलिदान भी दिये होंगे। हमारे पूर्वज अपने सनातन धर्म के प्रति जाग्रत थे। इसलिये उन्होंने धर्म की रक्षा करते हुए अपने प्राणों की परवाह नहीं की थी। आज हम उसी परम्परा का निर्वाह कर रहे हैं। यह बात आश्चर्यजनक है कि आजादी के बाद गोरक्षा करने वाले पूर्वजों की सन्तानों ने ही गोहत्या व गोमांस निर्यात का निन्दनीय कार्य किया है। गोरक्षा मनुष्य का कर्तव्य है। हमारे ऋषि मुनि आदि पूर्वजों ने गो के उपकारों के आधार पर इसे माता संज्ञा से विभूषित किया है। गाय वस्तुतः माता ही है। इसके इस स्वरूप को आर्य विद्वानों के ग्रन्थों के आधार पर समझा जा सकता है। वेद तो गाय को विश्व की माता तथा विश्व की नाभि बताता है। यदि हम गोरक्षा नहीं करते तो हम गोहत्या के पाप में कुछ न कुछ भागी अवश्य होते हैं। इसका अर्थ यह होता है कि हम गोरक्षा न कर ईश्वर की अवज्ञा के दोषी होते हैं। यही कारण है कि आज देश व विश्व में सर्वत्र अशान्ति है। गो हत्या पर पूर्ण प्रतिबन्ध लगना चाहियें। गोहत्या वैदिक धर्म तथा सनातन धर्म के सर्वथा विरुद्ध है। यह अनैतिक कार्य है जो किया जाता है। गोरक्षा होगी तो यह राष्ट्ररक्षा में भी अवश्य सहायक होगी।

गोवर्धन का अर्थ गो की संख्या में वृद्धि करने के साथ गो को सभी प्रकार के रोगों से बचाना व उनका अच्छे वातावरण में पालन करना है। हम गो के लिये अच्छे चारे की व्यवस्था करें जिससे हमें अच्छी गुणवत्ता वाला दुग्ध मिले और हमारे परिवार के सभी सदस्य सुखी व समृद्ध हों। हमें एलोपैथी की चिकित्सा के लिये डाक्टरों के पीछे न भागना पड़े। आजकल कैंसर, सुगर, रक्तचाप तथा हृदय रोगों सहित मनुष्य की इन्द्रियों की शक्ति व सामथ्र्य में कमी आ रही है। इसका एक कारण हमारा प्रदूषित पर्यावरण, प्रदूषित वायु व जल भी है। हमें गोरक्षा, गोवर्धन एवं गोसंवर्धन सहित पर्यावरण पर ध्यान देना चाहिये। हमें गो संरक्षण का कार्य करना है और इसके साथ साथ हमें बकरी जैसे एक अद्भुद गुणकारी प्राणी की रक्षा व उसके संवर्धन की ओर भी ध्यान देना है। बकरी का दुग्ध भी अनेक दुर्लभ गुणों व लाभों से युक्त होता है। आज यह दोनों दुग्ध ही संसार से दुर्लभ वा अनुपलब्ध होने के कगार पर हैं। आश्चर्य है कि आज हमारे सनातन धर्मी व आर्यबन्धु भी गोरक्षा, गोपालन, गोसेवा, गोपूजा आदि की उपेक्षा कर रहे हैं। यह स्थिति ईश्वर, वेद, धर्म, राम तथा कृष्ण को मानने वालों के लिये चिन्ताजनक होनी चाहिये। भौतिकवादी जीवन जीने के कारण गाय, बकरी तथा पर्यावरण का महत्व हमारी आंखों से ओझल है। ‘गोवर्धन पर्व’ के दिन गाय के महत्व को जानकर उसके संरक्षण एवं सवंर्धन पर हमें पूरा ध्यान देना चाहिये। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी को भी इस विषय में चिन्तन करना चाहिये और देश से गोहत्या का पाप सर्वथा दूर करने के लिये प्रयास करने चाहियें। देश को मोदी से आशा है कि वह इस समस्या पर पूरा ध्यान देंगे और गोहत्या बन्द कर गो के गोवर्धन को इसकी मंजिल तक पहुंचाने में सफल होंगे। ओ३म् शम्।
-मनमोहन कुमार आर्य
पताः 196 चुक्खूवाला-2
देहरादून-248001
फोनः 09412985121

1 thought on “मनुष्य कितना विकास कर ले बिना गोवर्धन किए वह सुरक्षित नहीं

  1. आपके लेख अत्यंत ज्ञानवर्धक होते है जी
    धन्यवाद

Comment:

betpark
mavibet giriş
betpark giriş
imajbet güncel
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
imajbet giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
imajbet güncel
imajbet güncel giriş
imajbet giriş
imajbet güncel
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
safirbet giriş
betsilin giriş
betsilin giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
savoycasino giriş
savoycasino giriş
savoycasino giriş
savoycasino giriş
betsilin giriş
betsilin giriş
betsilin giriş
betsilin giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
holiganbet giriş
betpark giriş
betpark giriş
betnano güncel
betnano güncel giriş
bettilt giriş
imajbet güncel
imajbet giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betgaranti
bettilt giriş
imajbet güncel
imajbet güncel giriş
bettilt giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
Grandpashabet giriş
safirbet giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
norabahis giriş
imajbet giriş
norabahis giriş
imajbet giriş
imajbet giriş
imajbet giriş
norabahis giriş
artemisbet giriş
artemisbet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
artemisbet giriş
norabahis giriş
artemisbet giriş
imajbet giriş
holiganbet güncel
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet
grandpashabet giriş
grandpashabet
safirbet giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
holiganbet giriş
vaycasino giriş
artemisbet giriş
artemisbet giriş
artemisbet giriş
artemisbet giriş
betpark giriş