स्वामी सानंद जी महाराज थे वर्तमान काल के भागीरथ

गंगा की अविरलता के लिए संघर्ष करने वाले स्वामी सानंद जी महाराज का आज निर्वाण दिवस है । उन्हें यदि आज के ‘ भागीरथ ‘ की संज्ञा दी जाए तो कोई अतिशयोक्ति न होगी । उन्होंने गंगा के लिए अपने प्राण त्यागे यदि ऐसा कहा जाए तो उनके व्यक्तित्व को कुछ कम करके आंकने वाली बात होगी । वास्तव में उन्होंने मानवता और प्राणीमात्र के हित चिंतन के लिए अपने प्राणों का त्याग किया क्योंकि गंगा भी प्राचीन काल से मानवता और प्राणी मात्र के लिए अपनी जलधारा को प्रवाहित करती आ रही है । जिसे वह निरंतर प्रवाहमान किए रखना चाहते थे , जिससे कि गंगा का प्राणियों के कल्याण का स्वरूप निरंतर बना रहे।

गंगा की अविरलता के लिए अपने प्राण त्यागने वाले स्वामी सानंद केवल एक संत ही नहीं थे, अपितु एक विश्व विख्यात प्रोफेसर भी थे। प्रख्यात पर्यावरणविद् और आईआईटी कानपुर के प्रख्यात प्राध्यापक रहे प्रो. जीडी अग्रवाल अर्थात स्वामी ज्ञान स्वरुप सानंद जी महाराज वर्तमान भारत की एक महान विभूति थे ।

स्वामी ज्ञानस्वरुप सानंद महात्मागांधी चित्रकूट ग्रामोद्योग विश्वविद्यालय(म.प्र.) में मानद प्रोफेसर भी थे। स्वामी सानंद 22 जून 2018 से गंगा एक्ट को लेकर अनशन पर चले गये थे । प्रो. जीडी अग्रवाल ने 2009 में भागीरथी नदी पर बांध के निर्माण को रुकवाने के लिए अनशन किया था और उन्होंने इसमें सफलता भी पाई थी ।

मातृ सदन में आमरण अनशन पर बैठे स्वामी को 10 अक्टूबर को प्रशासन ने जबरन अनशन से उठवाकर ऋषिकेश के एम्स में भर्ती करा दिया था। स्वामी ने मंगलवार को जल भी त्याग दिया था। वह गंगा अधिनियम को लागू कराने की मांग को लेकर 111 दिन से अनशन पर बैठे थे।

इसके बाबत कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने भी ट्वीट किया था। केन्द्रीय जल संसाधन, भूतल परिवहन और मंत्री नितिन गडकरी ने भी प्रो. अग्रवाल से अपना अनशन समाप्त करने की अपील की थी, प्रतिनिधि भेजकर भी आग्रह किया था, लेकिन अग्रवाल ने अनसुना कर दिया था।

अपने जीवन के महान उद्देश्य को सामने रखकर उसके लिए प्राण त्याग देना भारत के महापुरुषों की अनूठी और अनुपम परंपरा रही है । वास्तव में हमारे यहां पर इस ‘ दाधीच परंपरा ‘ की एक लंबी श्रंखला है। उसी की एक कड़ी के रूप में स्वामी सानंद जी महाराज ने अपने जीवन को जीने का प्रयास किया और एक उदाहरण प्रस्तुत कर दाधीच परंपरा के अनुपम हीरा बनकर संसार से कूच कर गए । आज हम उनकी पुण्यतिथि अर्थात निर्वाण दिवस पर उन्हें इसी रूप में अपने श्रद्धा सुमन अर्पित करते हैं कि उनकी दाधीच परंपरा को हम मिटने नहीं देंगे । जिस उद्देश्य के लिए समर्पित होकर उन्होंने जीवन जिया उसमें और भी अधिक गति लाने का प्रयास करते रहेंगे।

डॉ राकेश कुमार आर्य

संपादक : उगता भारत

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