Categories
धर्म-अध्यात्म

सत्य वैदिक सिद्धांत : ईश्वर ही जगत और सत्य विद्याओं का आधार

-मनमोहन कुमार आर्य, देहरादून।

संसार में हम सूर्य, चन्द्र तथा पृथिवी आदि लोकों तथा पृथिवी पर अग्नि, जल, वायु सहित वनस्पतियों एवं अन्यान्य प्राणियों की सृष्टि को देखते हैं। इनको उत्पन्न करने वाला अर्थात् इनका रचयिता कौन है, इसका निभ्र्रान्त ज्ञान हमें व हमारे अधिकांश बन्धुओं को नहीं है। इसका उत्तर महर्षि दयानन्द ने सन् 1875 में आर्यसमाज की स्थापना कर दिया था। उन्होंने आर्यसमाज के प्रथम नियम में घोषणा की है कि है ‘सब सत्य विद्या और जो पदार्थ विद्या से जाने जाते हैं उनका आदि मूल परमेश्वर है।’ ऋषि दयानन्द योग दर्शन के आधार पर ईश्वर की उपासना कर ईश्वर का साक्षात्कार किये हुए सिद्ध योगी थे। उन्होंने वेदों का अध्ययन कर ईश्वर को प्राप्त करने वा उसका साक्षात्कार करने की वह स्थिति प्राप्त की थी जिसे कोई मनुष्य, योगी, ज्ञानी व ऋषि परम पुरुषार्थ के द्वारा प्राप्त करता है। ऋषि दयानन्द ने इस नियम में जो कहा या बताया है, वह उनके निभ्र्रान्त ज्ञान पर आधारित है। इसमें न तो किसी प्रकार की अतिश्योक्ति है और न ही न्यूनोक्ति। उनका दिया हुआ यह सिद्धान्त सत्य की कसौटी पर पूरी तरह से सत्य व खरा है।

विज्ञान केवल भौतिक पदार्थों का ही अध्ययन करता है। भौतिक पदार्थ ईश्वर व आत्मा की तुलना में स्थूल हैं और हमारे सूक्ष्म दर्शी यन्त्रों की दर्शन व अध्ययन सीमा में आ जाते हैं। विज्ञान परमाणु को किसी भी पदार्थ की सूक्ष्मतम इकाई मानता है। इसमें भी वह क्रमशः ऋण आवेश युक्त, धन आवेश से युक्त तथा आवेश रहित इलेक्ट्रान, प्रोटान तथा न्यूट्रान तीन कणों को मानता है। इन तीनों कणों को किसी वैज्ञानिक यन्त्र सूक्ष्मीदर्शी माइक्रोस्कोप आदि के द्वारा वैज्ञानिकों ने देखा नहीं है, परन्तु अध्ययन से ही इनका अस्तित्व सिद्ध होता है। इसी आधार पर वह सभी तत्वों के परमाणुओं में इन कणों को स्वीकार करते हैं।

ईश्वर तथा जीवात्मा का अस्तित्व वेदों में वर्णित है। दर्शनों तथा उपनिषदों में भी ईश्वर व जीवात्मा पर विस्तार से चर्चा है। इन ग्रन्थों का अध्ययन करने पर कारण व कार्य सिद्धान्त की भांति इन मौलिक पदार्थों का ज्ञान होकर सृष्टि की उत्पत्ति व संचालन के रहस्य का शुद्ध तथा सन्देहों से रहित ज्ञान होता है। ईश्वर सच्चिदानन्दस्वरूप, सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञ, सृष्टिकर्ताकर्ता सत्ता वा शक्ति है। वह असंख्य वा अनन्त संख्या वाली अनादि व नित्य जीवात्माओं के पूर्वजन्मों में किये हुए कर्मों के आधार पर उन्हें सुख व दुःख प्रदान करने के लिए इस सृष्टि की रचना करती है व इस जगत का संचालन एवं पालन करती है। जीवात्मा की जन्म व मृत्यु की यात्रा मोक्ष प्राप्ति तक अविराम चलती रहती है। प्रलयावस्था में सभी जीवात्मायें मूर्छित अवस्था अथवा निद्रा अवस्था में होती हैं जिसमें उनको किसी प्रकार का सुख व दुःख नहीं होता। प्रलय से पूर्व जन्म धारण की हुई अवस्था में हुई मृत्यु के समय जीवात्मा के जो कर्म होते हैं, जिनके फलों का भोग करना शेष रहता है, उन कर्मों के भोग के लिये परमात्मा पुनः सृष्टि को बनाते व जीवात्माओं को उनके कर्मों के अनुसार जन्म देकर उन्हें सुख व दुःख रूपी भोग प्रदान करते हैं। यही सृष्टि चक्र, कर्म-फल भोग सिद्धान्त तथा जन्म व मृत्यु का रहस्य एवं कारण है।

सूर्य, चन्द्र, पृथिवी, ग्रह, उपग्रह तथा लोक-लोकान्तर के रूप में यह दृश्यमान जगत हमारे सम्मुख प्रत्यक्ष है जिसे हम अपनी आंखों से देखते हैं। यह जगत सत्य है मिथ्या नहीं है। इसकी रचना हुई है और वह रचना स्वतः व ईश्वरेतर किसी अन्य कारण से नहीं अपितु परमेश्वर के अनेक गुणों सर्वशक्तिमान व सर्वज्ञता आदि से सम्भव हुई है। परमात्मा ने ही सृष्टि को बनाया है। उसी ने सृष्टि के सब पदार्थों को बनाया है और वही इसका पालन व संचालन कर रहा है। जीवात्माओं को माता-पिता के द्वारा जन्म भी वही देता है। वही जीवन भर हमारी रक्षा करता करता और मृत्यु होने पर वह परमेश्वर ही हमारे शरीर से हमारी आत्माओं को सूक्ष्म शरीर के साथ निकाल कर इसे इसके कर्मानुसार माता-पिताओं के पास पहुंचाकर जन्म देता है। ईश्वर का कार्य आदर्श व्यवस्था एवं कुशलता से हो रहा है। हम भाग्यशाली हैं जो हम ऋषि दयानन्द जी की कृपा से वेद व ऋषियों के ग्रन्थों उपनिषद तथा दर्शनों आदि से परिचित हुए। उन्हीं की कृपा से हम परमेश्वर व जीवात्माओं के सत्यस्वरूप सहित इस सृष्टि के अनेक रहस्यों को न्यूनाधिक जानते हैं। हमें जीवात्मा के जन्म के उद्देश्य व मनुष्य जीवन के लक्ष्य सहित दुःख निवृत्ति के साधनों का भी ज्ञान है। दुःखों की निवृत्ति वा मोक्ष प्राप्ति के लिये सद्कर्म मुख्य कारण होते हैं। ईश्वर की उपासना तथा अग्निहोत्र आदि कर्मों सहित वेद ज्ञान की प्राप्ति मनुष्य के मुख्य कर्तव्य कर्म हैं जिनसे सुखों की प्राप्ति सहित मोक्ष प्राप्ति में लाभ होता है। हम ईश्वर के आभारी हैं कि उन्होंने हमें ऋषि दयानन्द प्रदान किये जिसके बाद उनकी शिष्य परम्परा में अनेक विद्वान हुए। इन विद्वानों ने भी ऋषि दयानन्द जी की ही तरह अज्ञान व अविद्या का नाश करने का भरसक प्रयत्न किया। इनके परिणामस्वरूप वर्तमान में वेद व ऋषियों द्वारा बनाये शास्त्रों का ज्ञान आज पूरी धरती पर उपलब्ध है। इन ग्रन्थों में मुख्य चारों वेदों का भाष्य, उपनिषदभाष्य, दर्शनभाष्य सहित सत्यार्थप्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, संस्कारविधि, आर्याभिविनय आदि ग्रन्थ हैं। पुस्तक रूप में इन ग्रन्थों तथा इण्टरनैट के माध्यम से भी यह ज्ञान आज विश्व में सर्वत्र सुलभ है। सम्पूर्ण मानव जाति पर ईश्वर का ऋण तो है ही, ऋषि दयानन्द जी का भी ऋण है जिन्होने ईश्वर के ज्ञान वेदों को जन सामान्य तक पहुंचाने का अथक प्रयास किया था और इसमें वह आंशिक रूप में सफल हुए थे।

संसार में परा व अपरा विद्यायें जिन्हें भौतिक तथा आध्यात्मिक विद्यायें कह सकते हैं, विद्यमान हैं। ईश्वर प्रदत्त वेद ज्ञान इन दोनो ही विद्याओं से युक्त सृष्टि का प्रथम ज्ञान है जो बाद में ग्रन्थ रूप में अस्तित्व में आया। ऋषि दयानन्द ने इस सिद्धान्त को अपने शब्दों वा सूत्र रूप में निरुपित कर कहा कि ‘वेद सब सत्य विद्याओं का पुस्तक है। वेद का पढ़ना पढ़ाना और सुनना सुनाना सब आर्यों (सब मनुष्यों) का परम धर्म (कर्तव्य) है।’ सभी प्रकार की सत्य विद्याओं का आदि स्रोत, परमात्मा का सृष्टि के आरम्भ में दिया हुआ वेदज्ञान, हमें सुलभ है। परमात्मा वेद ज्ञान का भी आदि मूल वा आदि स्रोत अथवा आदि कारण हैं। हम संसार में सूर्य, चन्द्र, पृथिवी, ग्रह-उपग्रह, लोक-लोकान्तरों सहित पृथिवी पर अग्नि, जल, वायु, विद्युत, आकाश, शब्द, इन्द्रियों के विषयों आदि पदार्थों को देखते हैं। इन सब अपौरुषेय पदार्थों का आदि मूल वा आदि स्रोत भी परमात्मा ही है। परमात्मा से इतर किसी अन्य सत्ता वा कारण से इनकी उत्पत्ति नहीं हो सकती और न ही संचालन हो सकता है।

सूर्य, पृथिवी और चन्द्र आदि ग्रह-उपग्रह इस अनन्त ब्रह्माण्ड की इकाईयां हैं। इन्हें अनादि कारण प्रकृति जो सत्व, रज और तम गुणों की साम्यावस्था होती है, उस स्थिति से दृश्यमान ग्रह-उपग्रह में परिवर्तित कर उन्हेें अनन्त आकाश में उनके भ्रमण वा गतिशील पथ में स्थापित करना व उनको बिना किसी उपद्रव व परस्पर संघातों से बचाते हुए चलाना सर्वशक्तिमान सच्चिदानन्दस्वरूप महान ईश्वर का ही कर्म है। अतः ऋषि दयानन्द ने आर्यसमाज को जो प्रथम नियम व सिद्धान्त दिया है वह पूर्णतः तर्कसंगत, बुद्धिसंगत होने सहित सत्य ज्ञान के अनुकूल, युक्तिसंगत तथा सर्वथा सत्य सिद्धान्त है। इसका चिन्तन करते हुए हम ईश्वर की महानता की एक झलक को पा सकते हैं। यह समस्त जगत् संसार में तीन अनादि व नित्य सत्ताओं ईश्वर, जीव व प्रकृति के होने से ही अस्तित्व में आया है। यदि इन तीन में से एक भी सत्ता न होती और यह ब्रह्माण्ड में जो आकाश है, इसका अस्तित्व न होता, तो यह संसार व जगत अस्तित्व में नहीं आ सकता था। हम जीवात्मा हैं और हमेशा जीवात्मा ही रहेंगे। हम जन्म व मरण के शाश्वत बन्धन में बंधे हुए हैं। इसी कारण से हमें सुख व दुःख होते हैं। दुःखों से निवृत्त होने के लिये हमें मनुष्य योनि प्राप्त कर श्रेष्ठ व सद्कर्मों को करना होगा। वेदानुकूल श्रेष्ठ व यज्ञीय सद्कर्मों को करके ही हम इस संसार से मुक्त होकर मोक्ष को प्राप्त कर सकते हैं। यही ज्ञान परमात्मा से वेद के द्वारा प्राप्त हुआ था जिसका तर्क व युक्ति के साथ ऋषि दयानन्द ने अपने जीवन में प्रचार किया और भावी पीढ़ियों के लाभार्थ इसे सत्यार्थप्रकाश आदि ग्रन्थों के माध्यम से भी हमें उपलब्ध कराया है।

हमारा कर्तव्य ईश्वर, जीवात्मा व जगत को इसके यथार्थ रूप में जानना व सद्कर्मों को करना है। ऋषि दयानन्द आज संसार में नहीं हैं परन्तु उनके ग्रन्थ आज भी हमारे लिये एक आचार्य की भूमिका में हमारा मार्गदर्शन कर रहे हैं। हमें उनके ग्रन्थों वा सहित्य से लाभ उठाना चाहिये और अपने जीवन को सत्पथ पर चलाते हुए देश व मानव जाति की उन्नति के लिये श्रेष्ठ कर्मों को करना चाहिये। ईश्वर की स्तुति, प्रार्थना व उपासना प्रत्येक मनुष्य वा स्त्री-पुरुष का मुख्य कर्तव्य वा धर्म है। इसका सबको पालन करना चाहिये। ओ३म् शम्।
-मनमोहन कुमार आर्य
पताः 196 चुक्खूवाला-2
देहरादून-248001
फोनः 09412985121

Comment:Cancel reply

Exit mobile version
Kuponbet Giriş
betgaranti giriş
Teknik Seo
vdcasino giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
betebet giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
betebet giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
parmabet giriş
grandpashabet giriş
betpas giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
pusulabet giriş
parmabet giriş
parmabet giriş
betnano giriş
betparibu giriş
grandpashabet giriş
betlike giriş
safirbet giriş
safirbet giriş
betparibu giriş
betlike giriş
parmabet giriş
betpark giriş
grandpashabet giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
parmabet giriş
betlike giriş
vaycasino giriş
betparibu giriş
klasbahis giriş
madridbet giriş
madridbet giriş
mariobet giriş
mariobet giriş
grandpashabet giriş
betlike giriş
parmabet giriş
grandpashabet giriş
betparibu giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
norabahis giriş
parmabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
betnano giriş
betebet giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş