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पश्चिमी इतिहासकारों के ऐतिहासिक षड्यंत्र और दृष्टि-दोष का परिणाम

अखिलेश आर्येन्दु
आर्य और द्रविण को लेकर ईसाई पादरियों द्वारा जाति, भाषा, सभ्यता, संस्कृति, क्षेत्र और धर्म के आधार पर काल्पनिक विभेद को विश्व इतिहास में सत्य साबित करने के लिए पिछले दो सौ वर्षों के अन्तराल में एक षड्यंत्र के तहत अभियान चलाया गया। भारत में ब्रिटिश सत्ता जब तक कायम रही तब तक भारतीय समाज को कई स्तरों पर ईसाई पादरियों ने ‘फूट डालो और राज्य करो’ नीति के तहत विभाजित करने के कुत्सित प्रयास किए। जिसका साथ ब्रिटिश सत्ता और विदेशी इतिहासकारों ने दिया जिसमें काफी हद तक वे सफल भी रहे। उदाहरण के लिए द्रविड़ शब्द की कल्पना 1856 में काल्डवेल नामक ईसाई पादरी ने ‘Comparative Philology of the Dravadian or South Indian Languages’ नामक पुस्तक में किया। इस पुस्तक से पहली बार द्रविड़ शब्द गढ़कर, इस सरारत का सूत्रपात किया गया। बाद में यह शब्द दक्षिण की भाषा, जाति और वहाँ के लोगों के लिए प्रचलित हो गया, जो बाद में रूढ़ हो गया। जब की एक अन्य विदेशी विद्वान और भाषा शास्त्री जार्ज ग्रीयरसन ने इसे (द्रविड़ शब्द) को संस्कृत शब्द ‘द्रमिल’ या ‘दमिल’ का बिगड़ा रूप बताया है और केवल तामिल के लिए प्रयुक्त होना बताया है। पादरियों का षड्यंत्र जारी था। षड्यंत्र के तहत एक नई जाति ‘द्रविड़’ भी खड़ी की गई। इतिहास का यह दिलचस्प घटनाक्रम यहीं नहीं रुका बल्कि जब काल्पनिक भाषा और जाति पादरियों द्वारा गढ़ लियेे गये तो इसे सिद्ध करने के लिए कुछ विदेशी विद्वानों, इतिहासकारों और भाषा शास्त्रियों को इसकी पुष्टि के लिए खड़ा किया गया, लेकिन कुछ ऐसे भाषाशास्त्री भी थे जो इस षड्यंत्र को समझा और इसका गहन विश्लेषण किया। उन विश्लेषणों में इस षड़यंत्र का विरोध ही नहीं किया गया बल्कि इसे मिथ्या भी सिद्ध किया गया। सर जार्ज कैम्पबेल जो कि एक नृवैज्ञानिक थे ने अपने विश्लेषण में कहा, ‘‘नृवंशशास्त्र के आधार पर उत्तर और दक्षिण के समाज में कोई विशेष भेद नहीं है।…द्रविड़ नाम की कोई जाति नहीं है। निस्सन्देह दक्षिण भारत के लोग शारीरिक गठन, रीति-रिवाज और प्रचार-व्यवहार में केवल एक आर्यसमाज है।’’ आर्य और द्रविड़, मूलनिवासी और विदेशी आक्रांता जैसी काल्पनिक बातें इतिहास में पढ़ाई जाती रही हैं और आज भी नई पीढ़ी को पढ़ाया जा रहा है। इसी तरह माक्र्सवादी इतिहासकारों ने अंगे्रजी इतिहास-दृष्टि को अपनी दृष्टि बनाया और उसे प्रमाणिक सिद्ध करने की पुरजोर कोशिशें कीं, जिसमें वे सफल रहे। यही कारण है, आज की नई पीढ़ी अपने इतिहास, संस्कृति, सभ्यता, भाषा और धर्म को लेकर भ्रमित और कुंठित है।
तत्कालीन भारत की स्थिति
अखण्ड भारत में अंगे्रजों के आने के पूर्व आर्यावर्त की धरती पर फ्रांसीसी, डच, मंगोल, तुर्क, अरबी मुसलमान, इरानी, इराकी आदि जैसे अनेक जातियाँ भारत की धरती पर राज्य कर चुकी थीं। अनेक मुसलमान वंश, पारसी वंश और विदेशी तुर्कों के वंश के बादशाह राज्य कर चुके थे। ईसाई और मुसलमानों के उदय के पूर्व आर्यावर्त की धरती पर वैदिक धर्म को मानने वाले आर्यों के अनेक वंश सकल धरा पर राज्य कर चुके थे। कुछ पुराणों की रचना हो चुकी थी और कुछ लिखे जा रहे थे। जैन, बौद्ध के सम्प्रदायों के अतिरिक्त हिन्दुओं के कुछ सम्प्रदायों-शाक्त, वैष्णव, शैव आदि सम्प्रदाय
पुराणों के मत के अनुसार भारतीय समाज पर अपना प्रभाव डाल रहे थे। जैन व बौद्धों के मतों का भी प्रभाव भारतीय समाज पर पड़ रहा था। माना यह भी जाता है कि जैनियों के द्वारा रचित पुराणों की रचना हो चुकी थी। इसी तरह बुद्ध के धम्मपद और उनके उपदेशों को उनके शिष्यों द्वारा संग्रहित किए गए ग्रंथ- त्रिपिटक, विनय पटक, सुत्तपिटक और अभिधम्मपिटक जो पालि भाषा में थे का प्रभाव भारतीय समाज पर पड़ रहा था। जिसका प्रभाव सामाजिक, धार्मिक, आध्यात्मिक, सांस्कृतिक, भाषाई और राजनीतिक क्षत्रों में गहराई से पड़ रहा था। कहा जाता है, जैन और बौद्ध ग्रंथों के प्रभाव से हिंदू समाज को बचाने के लिए हिंदू दर्शन के झंडाबरदारों ने पुराणों की रचना की। समाज में प्रचलित वैदिक गुण-कर्म-स्वभाव पर आधारित वर्ण-व्यवस्था धीरे-धीरे जाति-व्यवस्था में परिवर्तित हो रही थी। पौराणिक-सामाजिक और सांस्कृतिक चेतना का प्रभाव भारतीयों पर कई रूपों में पड़ रहा था। वेदों का पठन-पाठन बन्द हो चुका था और पुराणों पर आधारित कर्मकाण्ड जो अंधविश्वास, पाखण्ड, कुरीतियों और अमानवीय प्रथाओं से पूरित थे से हिन्दू समाज दिगभ्रमित और रूढ़िवाद में फंस चुका था। इतिहास में जो पढ़ाया जाता है वह संस्कृत, पाली, प्राकृत और अपभ्रंश भाषाओं में लिखे विविध प्रकार के ग्रंथों में वर्णित इतिहास या कल्पना के आधार पर है। अंगे्रज इतिहासकार और माक्र्सवादी इतिहासकारों ने एक दुराग्रह और नीति के आधार पर जो इतिहास लिखा वह इतिहास के रूप में अंगे्रजी कुनीति का दस्तावेज अधिक है। यही कारण है कि जब हम तथाकथित इतिहास पढ़ते हैं तो लगता है, भारतीय समाज, भारतीय संस्कृति, सभ्यता, धर्म और अध्यात्म के क्षेत्र में अत्यंत पिछड़े हुए थे जिसे अंगे्रजों ने सशक्त बनाने के कार्य किए। इसी क्रम में यह भी पढ़ाया जाता है कि भारत के मूल निवासी द्रविण या शूद्र थे उन्हें आर्यों ने परास्त करके यहाँ के प्रत्येक क्षेत्र में अपना वर्चस्व कायम किया और उनके साथ गुलामों जैसा व्यवहार किया। इसी तरह ईसाई इतिहासकार पादरी जो दुराग्रह और स्वार्थ के वसीभूत थे ने वेदों के सम्बन्ध में जो प्रचारित-प्रसारित किए, वह भी अत्यंत भ्रामक, प्रवंचनापूर्ण और सत्य से इतर है। इसी तरह, भाषा के स्तर पर भी अंगे्रज इतिहासकारों ने दिगभ्रमित किया। अंगे्रज इतिहासकारों ने भारतीय भाषाओं को मुख्यतः दो भाषाओं-आर्य और द्रविण भाषाओं में विभक्त किया। दक्षिण की मुख्य भाषाओं-तेलगू, कन्नड़, मलयालम और तमिल हैं। सामूहिक रूप से इन्हीं को द्रविण भाषा के अन्तर्गत रखा गया है। राजनीतिक स्वार्थ के वसीभूत होकर इतिहासकारों और लेखकों ने जोर-शोर से प्रचारित-प्रसारित किया कि संस्कृत जो आर्यों की भाषा है से द्रविण भाषा का कोई सम्बन्ध नहीं है। अंगे्रजों ने भारतीयों को:फूट डालो और राज्य करो’ की नीति के तहत तथाकथित द्रविण भाषाओं को आर्यों की भाषाओं से पूरी तरह भिन्न सिद्ध करने करने के लिए झूठे तर्क और प्रमाण देने के कुत्सित प्रयास किए, जिसे भारतीय माक्र्सवादी इतिहासकारों ने बिना किसी विवेचना या विश्लेषण के जस का तस स्वीकार किया और अंगे्रजी इतिहास को ही प्रमाणिक मान लिया। जब कि भारतीय और विदेशी भाषा शास्त्रियों ने अपने विश्लेषण के बाद यह पाया कि संस्कृत के 75 प्रतिशत शब्द बंगला और तेलगू में हैं और 90 प्रतिशत शब्द मलयालम में हैं। इसी तरह कन्नड़ में 80 प्रतिशत और तमिल में 50 प्रतिशत शब्द संस्कृत के हैं। जहाँ तक सांस्कृतिक और सामाजिक समानता का प्रश्न है, यह भी सर्वेक्षणों से वर्षों पूर्व हल कर लिया गया।
ध्यान देने की बात यह है कि उत्तर और दक्षिण के अधिकांश त्योहारों, पर्वों, उत्सवों, संस्कारों, कर्मकाण्डों और जीवन शैली में काफी समानता है। इसके अतिरिक्त स्वभाव, विचार, मान्यताओं और धारणाओं में किसी न किसी रूप में समानता दिखाई पड़ती है-वह चाहे धार्मिक हो या आध्यात्मिक, दार्शनिक हो या भौतिक।
मैंने भाषा, संस्कृति, सभ्यता, धर्म, अध्यात्म और कला पर विवेचनात्मक अध्ययन किया और पाया है कि उत्तर-दक्षिण या पूर्व-पश्चिम भारत के प्रत्येक वर्ग, जाति, सम्प्रदाय और समूह में अनेक बातों की गजब की समानता है। आर्य और द्रविण या ब्राह्मण और दलित का जातिगत भेदभाव सामाजिक रूप से आज जिस रूप में है, वह पिछले दो हजार वर्षों में अज्ञानता और अशिक्षा के कारण बढ़ता गया जिसका लाभ मुसलमान और ब्रिटिश शासन में शासकों ने मनमाने ढंग से उठाया। मनुस्मृति और अन्य स्मृतियों में मिलावट या प्रक्षेप पिछले दो हजार वर्षों में किये गए। उन प्रक्षेपों को लेकर ही मनुस्मृति और अन्य वैदिक ग्रंथों के विरोध में राजनीति के शूरमा अपनी रोटियाँ सेकते रहते हैं, जबकि महर्षि मनु के वचनों में जिस वर्ण-व्यवस्था और उसके कार्य-व्यवहार का वर्णन किये गए हैं वे सर्वथा मानवीय, मानव मूल्य परक और सर्वहितकारी हंै। इस सत्य और न्याय परक वर्णन को निष्पक्ष और तर्क के साथ स्वाध्याय करने और चिन्तन करने की आवश्यकता है। सर्वण-असवर्ण की बात ही पूरी तरह गलत और भ्रम है। सवर्ण का अर्थ न तो द्विज जाति परक है और न तो असवर्ण का अर्थ द्विज जाति इतर जाति ही। ये सारे शब्द भारतीय समाज के परतन्त्रता में हिंदू समाज को विघटित करने के मद्देनजर प्रचलित किए गए। आश्चर्य इस बात की भी होती है कि आज का पढ़ा लिखा वर्ग भी इस अज्ञानता को स्वीकृति देता द्रष्टव्य होता है। संस्कृत भाषा का शब्द ‘सवर्ण’ का अर्थ उसी वर्ण का होता है। इसके अनुसार ब्राह्मण ब्राह्मण का सवर्ण होता है और दलित दलित का। इसी तरह असवर्ण का अर्थ जो उस वर्ण का न हो न कि द्विज इतर जाति या वर्ण।
पश्चिमी इतिहासकारों द्वारा इतिहास की पुस्तकों में जो आर्य-द्रविण या ब्राह्मण-शूद्र को मनमाने ढंग से विश्लेषण किया उसका परिणाम यह हुआ कि अंगे्रजों के जाने के बाद पिछले सत्तर वर्षों में कांगे्रसी शासन में पले-बढ़े वामपंथी इतिहासकारों ने पश्चिमी इतिहासकारों की प्रत्येक बात को आँख मूंदकर मान ही नहीं लिया बल्कि उसके लिए अपने निरर्थक तर्क भी गढ़ लिए। आज सत्तर वर्ष के अन्तराल में इतिहास की पुस्तक में लिखे भारत के मूल निवासी और तथाकथित आक्रणकारी आर्यों की कहानियों को नई पीढ़ी पढ़कर यह समझती है कि दलित वर्ग ही भारत का मूल निवासी है और बाकी उच्च कही जाने वाली जातियां आक्रमणकारी आर्यों की सन्तानें हैं। पश्चिमी ईसाई इतिहासकारों के इतिहास के इस भयंकर षड्यंत्र को समझने की आवश्यकता है। जिससे सत्य और मिथ्या को समझा जा सके और पश्चिमी षड्यंत्र को आगे बढ़ने से रोका जा सके।

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