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धूला भंगी और हरवीर गुलिया

भारत के शौर्य की गाथा : मुगलकालीन भूले बिसरे हिंदू योद्धा

भारत की धर्म – राष्ट्र – परंपरा को बनाए रखने के लिए अपने रक्त और पसीने को बहाने में वाल्मीकि समाज के लोगों का भी बहुत महत्वपूर्ण योगदान रहा है। इन लोगों को भारत पर अवैध रूप से शासन करने वाले अलाउद्दीन खिलजी के शासनकाल में भंगी या मेहतर कहकर संबोधित करने की परंपरा आरंभ हुई।
भंगी या महतर शब्द का भी एक विशेष अर्थ है। वास्तव में अलाउद्दीन खिलजी ने जहां – जहां हमारे वीर सरदार योद्धाओं से अपने समक्ष आत्मसमर्पण करवाया वहां – वहां उसने उन्हें अपमानित करने के दृष्टिकोण से प्रेरित होकर उन वीर योद्धाओं से अपना और अपने सैनिकों का मल उठवाने का काम लिया।

इस प्रकार के हीन कार्यों को करने के उपरांत इन लोगों का मूल सनातन धर्म भंग हो गया, जिसके चलते इन्हें भंगी कहा जाने लगा। जबकि अलाउद्दीन खिलजी इन्हें हीन कार्यों को करने का आदेश देकर मेहतर के नाम से पुकारता था। मेहतर का अभिप्राय भी सरदार या योद्धा से ही होता है। वह मेहतर शब्द के माध्यम से इन लोगों को यह आभास कराता था कि तुम वास्तव में तो वीर योद्धा हो परंतु तुम्हारा महत्व मेरी दृष्टि में केवल इतना है कि तुम मेरे सैनिकों का मल उठाने का ही काम कर सकते हो।
ऐसी दीन हीन स्थिति में आकर भी इन लोगों ने इस्लाम को अपनाया नहीं और अपने मौलिक सनातन धर्म को छोड़ा नहीं।
सनातन वैदिक धर्म के प्रति इनकी इस प्रकार की निष्ठा को देखकर इनके प्रति सम्मान का भाव हमारे भीतर उत्पन्न होना चाहिए।

इसी वाल्मीकि समाज के एक वीर योद्धा की अप्रतिम देशभक्ति का वर्णन हम यहां करने जा रहे हैं। इस वीर योद्धा का नाम था धूला बाल्मीकि। हिसार के पास के कोसी गांव में इसका जन्म हुआ था। जब तैमूर लंग ने भारत पर आक्रमण किया तो उस समय वाल्मीकि समाज के लोगों ने भी सर्वखाप पंचायत के साथ कंधा से कंधा मिलाकर राष्ट्र रक्षा के लिए अपना महत्वपूर्ण और स्मरणीय योगदान देने का संकल्प लिया था। उस विदेशी आक्रमणकारी के विरुद्ध जब खाप पंचायत आयोजित की गई तो उसमें धूला को योगराज गुर्जर के साथ सेना का उप प्रधान नियुक्त किया गया था। यह बहुत महत्वपूर्ण निर्णय था। 80000 सैनिकों में से वाल्मीकि समाज के वीर योद्धा को देश सेवा का इतना बड़ा अवसर उपलब्ध कराना जहां हमारे समाज के लोगों की बाल्मीकि समाज पर अटूट विश्वास की भावना को व्यक्त करता है, वहीं यह भी स्पष्ट करता है कि उस समय तक हमारे देश में जातिवाद का विष बहुत अधिक नहीं था । लोग अपने वाल्मीकि भाइयों को अपने साथ बैठाकर और उनके साथ काम करने में आनंद की अनुभूति करते थे।

इस वीर योद्धा का भाग 53 धड़ी था। शत्रु की बड़ी धाड़ को रोकने की उसके भीतर क्षमता थी। इसलिए उसे धाड़ी भी कहते थे। गोरिल्ला युद्ध का उसे विशेष प्रशिक्षण प्राप्त था। अब से पहले वह 52 युद्ध लड़ चुका था। उसकी निर्भयता और वीरता सब देशवासियों को आनंदित करती थी। उसके नाम से ही शत्रु कांप उठता था। अनेक युद्धों को जीतकर उसने अपनी वीरता का परिचय दिया था। यही कारण था कि जब तैमूर के विरुद्ध नई सेना गठित करने का समय आया तो पंचायत के लोगों ने उसे खाप पंचायत की सेना का उप प्रधान बनाने का निर्णय लेकर अपनी सहमति और प्रसन्नता को अभिव्यक्ति दी।

उप प्रधान सेनापति के रूप में तब उस वीर योद्धा ने लोगों को संबोधित करते हुए कहा था कि ” वीरो ! आपने भंगी कुल का सम्मान करके आर्यों के मस्तक को ऊंचा किया है। मैंने अपनी सारी आयु में धाड़े मारे हैं । आपके सम्मान देने से मेरा रक्त उबल उठा है। मैं वीरों के सम्मुख यह प्रण करता हूं कि शरीर के रक्त की एक-एक बूंद देकर देश की रक्षा करूंगा । पंचायत सर्वखाप के भगवा झंडे को नीचे नहीं होने दूंगा। मैंने अनेक युद्धों में भाग लिया है । मैं भंगी कुलोत्पन्न पंचायत की मान मर्यादा पर सर्वस्व बलिदान कर दूंगा।”

धूला के शब्दों में ओज था। देशभक्ति थी । मातृभूमि के प्रति समर्पण था। धर्म की रक्षा के प्रति अनुराग था। उसने नपे-तुले शब्दों में अपने इन सभी अनुकरणीय भावों को अभिव्यक्ति प्रदान कर दी थी । उसके शब्दों पर पंचायत के लोगों ने ध्यान दिया और करतल ध्वनि से उसका अभिनंदन किया।
अन्त में धूला ने अपनी जंघा से रक्त निकालकर प्रधान सेनापति के चरणों में छींटे दिए । म्यान से तलवार बाहर निकाल कर कहा ” प्राण रहते – रहते यह तलवार शत्रुओं का रक्त पी जाएगी, म्यान में नहीं जाएगी।”
इस समय समस्त पंचायत में वीरों की हुंकार गूंज उठी। वीर रस के जिन भावों की अपेक्षा उस समय उप प्रधान सेनापति से की जा रही थी, उनको सुनकर लोगों ने हर्षातिरेक से जयकारे लगाने आरंभ कर दिए। हर हर महादेव की जय, कृष्ण कन्हैया की जय, गंगा माई की जय का उद्घोष सर्वत्र गूंजने लग गया।

उस पंचायत में देवी कौर राजपुत्री कन्या, चंद्रो ब्राह्मण कन्या, हरदेयी जाट पुत्री, रामप्यारी गुर्जर कन्या और रामदेयी तगा पुत्री नाम की पांच वीरांगनाओं को सेनापति के रूप में नियुक्ति प्रदान की गई । अपनी नियुक्ति पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए उन्होंने भी खाप पंचायत में उपस्थित लोगों को मातृभूमि की रक्षा के लिए अपने प्राण समर्पित कर देने का वचन दिया। उन्होंने उपस्थित लोगों को विश्वास दिलाया कि वह मातृभूमि की रक्षा के लिए आर्य वीरांगनाओं की भांति युद्ध क्षेत्र में काम करेंगी। यदि समर क्षेत्र में उन्हें अपना बलिदान भी देना पड़ा तो वह तनिक भी संकोच नहीं करेंगी।

उस समय जिन 10 उपसेनापतियों का मानो नयन किया गया था उनमें एक दुल्ला धाड़ी भी था। दुल्ला धाड़ी गुलिया का जन्म बादली में हुआ था। वह अपनी वीरता और शौर्य के लिए उस समय दूर-दूर तक विख्यात हो चुका था। दादरी हिसार से लेकर मुल्तान तक वह धाड़े मारता था। अपने शौर्य और पराक्रम के कारण उसे सुल्तान की नाड़ की गद्दी का प्रधान बनाया गया था। दुल्ला धाड़ी इसकी पदवी थी । इसका निज नाम रणवीर था।
जिसने 1398 ई तक अर्थात तैमूर लंग के आक्रमण से पूर्व तक कुल मिलाकर 100 युद्ध लड़े थे और तीन बार युद्ध में सेनापति पद पर नियुक्ति प्राप्त कर चुका था।

इस प्रकार के वर्णन से स्पष्ट होता है कि भारत शौर्य और पराक्रम का देश रहा है। यहां के शूरवीर सात्विक वीरता को धारण करने वाले होते थे। उन शूरवीरों की विशेषता यह होती थी कि वह अन्याय और अत्याचार के विरुद्ध अपनी शक्ति का प्रयोग करते थे। किसी भी प्रकार के आतंकवादी व्यक्ति का विरोध करना और उसे समाप्त करना इनके जीवन का उद्देश्य होता था। पंचायत में जब इन लोगों की नियुक्ति की जा रही थी तो इनके सात्विक बल की इसी विशेषता के कारण इन्हें मातृभूमि के लिए अपनी शक्ति का प्रदर्शन करने का अवसर दिया जा रहा था। जिसे यह भी अपना सौभाग्य समझ रहे थे। यही कारण था कि समय आने पर इन्होंने तैमूर लंग के साथ युद्ध कर उसकी सेना का विनाश करने में अपना महत्वपूर्ण सहयोग प्रदान किया था।
इन शूरवीर नायकों के नेतृत्व में पंचायती सेना ने पानीपत, दिल्ली, मेरठ, मुजफ्फरनगर तक फैलकर तैमूर की सेना से युद्ध किया। तैमूर उनकी वीरता से भयभीत हो गया था। 20000 की सेना जिस प्रकार छुप- छुप कर शत्रु के सैनिकों का विनाश कर रही थी, उसकी वास्तविकता को तैमूर समझ नहीं पाया था। इन देशभक्त वीरों ने सहारनपुर और हरिद्वार में भी तैमूर के साथ युद्ध किया था।

जब तैमूर दिल्ली में लूटपाट कर रहा था और सनातन धर्मी हिंदुओं का संहार कर रहा था, तब पंचायती सेना के 20000 वीरों ने रात्रि में 3:00 बजे दिल्ली में तैमूर की 52 हजार की सेना पर एक साथ भीषण हमला कर दिया। तैमूर को पहली बार सनातन धर्म के हिंदू वीरों की वीरता का पता चला। उसने अभी तक यही देखा था कि हिंदू बिना किसी प्रतिशोध और प्रतिरोध के चुपचाप गर्दन उतरवा लेता है , पर अब उसे यह ज्ञान हुआ कि हिंदू सर कलम करवाता ही नहीं है , अपितु सर उतार भी लेता है। यदि कोई उसकी अस्मिता के साथ खिलवाड़ करता है तो वह उसे उसी की भाषा में प्रति उत्तर देने में भी सक्षम है। तैमूर का यह भ्रम दूर हो गया कि हिंदू भेड़ की भांति चुप खड़ा होकर अपना मुंडन करवा लेता है। अब उसे पता चला कि हिंदू अपने सम्मान और अपने राष्ट्रीय गौरव के लिए दूसरों का मुंडन करने में भी संकोच नहीं करता।

धूला और उनके वीर देशभक्त शूरवीर नायकों ने मिलकर 9000 तैमूरी सेना को गाजर मूली की भांति काटकर जमुना की भेंट चढ़ा दिया । जितने शत्रुओं को वह काटते थे उतना ही उन्हें आत्म संतोष प्राप्त होता था इससे उन्हें लगता था कि ऐसा करके वह उन अपने अनेक सनातन धर्मी बलिदानी हिंदुओं के बलिदान का प्रतिशोध ले रहे हैं जिन्हें तैमूर अभी तक अपनी तलवार की भेंट चढ़ा चुका था। बहुत ही सुनियोजित ढंग से हमारे ये सनातन धर्मी हिंदू वीर तैमूर की शक्ति का विनाश करते जा रहे थे। ये सभी प्रातः काल होते ही नगर से बाहर चले जाते थे। दिन में इधर-उधर छुप कर कहीं आराम करते, फिर अगले दिन की युद्ध की योजना पर विचार करते। तत्पश्चात सही समय होने पर रात्रि में फिर शत्रु की सेना पर हमला कर देते थे। इसी प्रकार तीन दिन तक होता रहा। तैमूर लंग ने दुखी होकर दिल्ली को छोड़कर मेरठ की ओर बढ़ने का निर्णय लिया। इन तीन दिनों में दिल्ली में इसी प्रकार 15000 शत्रु काट डाले गए थे। यदि हमारे ये हिंदू वीर योद्धा इस प्रकार तैमूर की सेना पर धावा नहीं बोलते तो वह दिल्ली में और भी अधिक मारकाट करता । इस प्रकार अपने अनेक बहन भाइयों का जीवन बचाने में हिंदुओं की इस पंचायती सेना ने सफलता प्राप्त की।

जब तैमूर ने दिल्ली को छोड़कर मेरठ की ओर बढ़ना आरंभ किया तो हमारी इस पंचायती सेना ने उसका पीछा करना आरंभ कर दिया। वह आगे बढ़ता जाता था और पीछे से पंचायती सेना के देशभक्त वीर सैनिक अपनी राष्ट्रभक्ति का परिचय देते हुए उस पर हमला करते जाते थे। भारत के ये सैनिक अपने उप सेनापति धूला के नेतृत्व में आत्मघाती दस्ते के रूप में काम कर रहे थे। तैमूर की सेना रात्रि में जहां भी रुककर आराम करने का प्रयास करती वहीं पर पंचायती सेना के ये शूरवीर उस पर धावा बोल देते थे। इस युद्ध में अनेक पंचायती वीर भी वीरगति को प्राप्त हो चुके थे। जो भी वीर वीरगति को प्राप्त होता, उसके स्थान पर दूसरा देशभक्त वीर स्वयं स्थान प्राप्त कर लेता। हमारी वीर देवियों ने भी अपनी राष्ट्रभक्ति का परिचय दिया और अपने शूरवीर लड़ाके भाइयों के लिए खाद्य सामग्री पहुंचाने में किसी प्रकार की कमी नहीं आने दी। इन सबकी देशभक्ति ,शूरवीरता और शौर्य संपन्न व्यक्तित्व उस समय सबके लिए प्रेरणा का स्रोत बन चुका था। सर्वत्र देश भक्ति का रंग बिखेर चुका था बसंती होली खेलने में सबको आनंद की अनुभूति हो रही थी। सबका लक्ष्य केवल एक था कि जैसे भी हो शत्रु का विनाश किया जाए और उसे अपनी पवित्र भारत भूमि से यथाशीघ्र बाहर भगा दिया जाए।

हमारी वीरांगनाएं उस समय न केवल भोजन सामग्री पहुंचाने का काम कर रही थीं अपितु शत्रु की रसद को लूटने का काम भी करती थीं। 500 अश्वारोही इन सब बातों की सूचना पंचायत को देते रहते थे। वीरांगनाएं योद्धाओं को दूध गर्म करके देती और घायल सैनिकों को पट्टी बांधती थीं। भोजन बनाती और पहुंचाती थीं। कुछ पंचायती जर्राह भी घायलों का उपचार करने में लगे हुए थे। ब्राह्मण क्षत्रिय युवतियां भोजन के लिए शंख और घड़नावल नागफनी बजाती थीं। भंगियों की लड़की युद्ध के संकेत के लिए रणसिंहा तुरही ढोल बजाती थीं। विदेशी आक्रमणकारी तैमूर के लिए ऐसी स्थिति उत्पन्न कर दी गईं कि उसकी सेना के लिए कहीं से भी भोजन सामग्री पहुंचने न पाए । जिसके चलते तैमूर के सैनिक मारे भूख के बिलबिला रहे थे।

पिटते पिटते तैमूर की सेना किसी प्रकार हरिद्वार तक पहुंच गई। हरिद्वार से पांच कोश दक्षिण की ओर पंचायत के 25000 योद्धाओं ने तैमूर के घुड़सवार दस्ते पर भयंकर धावा बोल दिया। यहां पर तीरों और भालों का भयंकर युद्ध हुआ।
जिस समय तीरों और भालों का यह भयंकर युद्ध हो रहा था उस समय तैमूर भी युद्ध क्षेत्र में उपस्थित था। भारतीय पक्ष के एक वीर योद्धा हरवीर गुलिया का शौर्य और पराक्रम उस युद्ध में शत्रु के लिए कहर बरपा रहा था । हरवीर गुलिया बाल ब्रह्मचारी था। वह तेजस्विता से संपन्न शूरवीर योद्धा भारत के पराक्रम का प्रतीक बन चुका था। युद्ध क्षेत्र में उसने विदेशी आक्रमणकारी तैमूर को भली प्रकार पहचान लिया। जब तैमूर से उसका आमना सामना हुआ तो उसने अपने देश की अस्मिता के साथ खिलवाड़ करने वाले इस नीच आक्रमणकारी पर तीव्रता के साथ भाले का प्रहार किया। हरवीर गुलिया ने शेर की भांति गरज कर आगे बढ़कर तैमूर की छाती में ऐसा भाला मारा कि तैमूर घोड़े से गिरने लगा। तभी उसके सरदार खिजर ने उसे संभाल कर घोड़े से अलग किया। पंचायती वीर सैनिक हरबीर पर एक साथ 60 भाले और पांच तलवारें टूट पड़ीं । यह योद्धा भूमि पर गिर पड़ा। उस समय हरवीर को 52 घाव हुए थे। इसके उपरांत भी शत्रु के लिए उसका रक्त उबल रहा था । उसे स्वयं के धरती पर गिरने का इतना दुख नहीं था, जितना शत्रु के धड़ाधड़ धरती पर गिरते देखकर उसे प्रसन्नता की अनुभूति हो रही थी। बलिदान के अंतिम क्षणों में भी उसके चेहरे का तेज देखते ही बन रहा था। उसे इस बात पर अत्यंत प्रसन्नता हो रही थी कि उसने देश के सबसे बड़े शत्रु को अपने भाले का शिकार बना दिया था। उसे इस बात का भी पूर्ण विश्वास था कि उसका भाला शत्रु की छाती में इतना गहरा लग चुका है कि वह बच नहीं पाएगा।

हरवीर गुलिया बादली का जाट वीर उस समय मात्र 22 वर्ष का था। यह अवस्था संसार के विषय भोगों में जाकर फंसने की होती है, पर भारत का यौवन इस समय देशभक्ति की भावना से प्रेरित होकर अपने आर्य पूर्वजों की बलिदानी परंपरा को आगे बढ़ाने का निर्णय ले चुका था। यही उसके लिए सबसे बड़ा गौरव था। संसार का सबसे बड़ा सुख आज उसे इसी बात में अनुभव हो रहा था कि वह मां भारती के लिए अपना बलिदान दे रहा है। इस समय प्रधान सेनापति योगराज गुर्जर ने 22000 मल्ल योद्धाओं के साथ शत्रुओं पर प्रबल धावा बोलकर 5000 शत्रुओं को काट दिया। योगराज ने स्वयं अपने हाथों से इस अचेत जवान वीर को उठाकर यथा स्थान पहुंचाया, परंतु कुछ समय पश्चात वह वीरगति को प्राप्त हो गया। प्रधान सेनापति को इस महान योद्धा की वीरगति से बड़ा आघात पहुंचा।

हरवीर गुलिया ने अपना जीवन भारत माता की भेंट चढ़ाकर भारत के बड़े शत्रु को ऐसा मारा कि फिर वह भारत से अपनी जान लेकर भागता नजर आया था । धुला भंगी और दुल्ला धाड़ी सब देश पर बलिदान हो गए थे। फिर भी इन्होंने अपने शत्रु को वीरता का पाठ पढ़ा दिया था। जिसे मध्य एशिया में कोई लड़ने वाला नहीं मिला था, उसे तैमूर को इन देशभक्त वीरों ने यह बतला दिया था कि क्रूरता का सामना करने के लिए सात्विक बल कितना प्रबल होता है ? तैमूर पंचायत सर्वखाप हरियाणा के सेनापति योगराज को सपने में भी नहीं भूलता था। कई मुसलमान यात्रियों ने यह लड़ाई देखी थी। उन्होंने कहा था कि भारत कभी गैरों से नहीं हारा, जब हारा अपने देश के कपूतों ने उसे हराया और जब भारत में एकता आई तो कोई इन्हें हरा नहीं सका। (लेखक : मिरासी कद्दूसी )

(अक्षय प्रकाशन नई दिल्ली से प्रकाशित मेरी नई पुस्तक “भारत के शौर्य की गौरव गाथा” से, मूल्य डाक सहित 550 रुपए)

  • डॉ राकेश कुमार आर्य
    (लेखक सुप्रसिद्ध इतिहासकार और भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता हैं)

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