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बिहार की राजनीति में मुस्लिमों के चहेते बनते जा रहे हैं नीतीश कुमार

-मुरली मनोहर श्रीवास्तव

भारतीय राजनीति के परिपक्व खिलाड़ी हैं नीतीश कुमार, उनकी हर राजनीतिक चाल पर सभी राजनीतिक दलों की नजर बनी रहती है। राजनीतिक पंडित तो यहां तक मानते हैं कि नीतीश कुमार समयानुकूल अपनी राजनीतिक दिशा का निर्धारण करते हैं। अगले साल बिहार में विधानसभा चुनाव के मद्देनजर सूबे के सभी राजनीतिक दल नित्य नए प्रयोग कर रहे हैं। इन प्रयोगों के पीछे एक मात्र मकसद है कि किस तरह सत्ता की चाभी अपने पाले में आ जाए। इंदिरा गांधी ने जब देश में इमरजेंसी लगा दिया था उस दौर में इंदिरा के खिलाफ उपजे प्रतिरोध ने नीतीश-लालू-रामविलास पासवान सरीखे कई अन्य नेता देश को दिया। बिहार में भी राजनीति विकास पर ही होती थी, जातीय आधार चुनाव में काफी हावी रहा है। अब इसमें जो जिस तरह से समीकरण को सेट किया वही बाजी मारने में कामयाब रहे। इसमें लालू प्रसाद, नीतीश कुमार केंद्र की सत्ता से बिहार की सत्ता पर काबिज तो हुए मगर पासवान केंद्रीय राजनीति में चाहे किसी की सरकार बने वो मंत्री जरुर बनते रहे हैं।

मुस्लिमों का हिमायती कौन ?
बिहार की राजनीति देशभर में चर्चा का विषय बनी रहती है। वर्ष 2020 में बिहार में होने वाले चुनाव को लेकर सूबे में सबसे ज़्यादा बहस हो रही है कि बिहार में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ही विपक्षी दलों के मुस्लिम नेताओं की भी पहली पसंद बनते जा रहे हैं। दरअसल विपक्षी राजद और कांग्रेस के कुछ नेताओं के बीच सार्वजनिक रूप से नीतीश कुमार के कामकाज की तारीफ और फिर उनकी पार्टी में शामिल होने की प्रक्रिया लगातार जारी है। बिहार में नीतीश कुमार एनडीए की सरकार को नेतृत्व कर रहे हों मगर मुस्लिमों का पहली पसंद नीतीश ही हैं इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है। आपको एक बात याद दिला दूं कि कुछ दिन पहले
राजद सांसद मो. अली असरफ फातमी जदयू में शामिल हो गए थे। इतना ही नहीं अब्दुल बारी सिद्धिकी भी नीतीश कुमार को ही सूबे की राजनीति में तराणहार मान रहे हैं। जबकि अन्य मुस्लिम नेताओं को भी तेजस्वी के नेतृत्व पर भरोसा कम हो रहा है। बात चाहे जो भी हो लेकिन बिहार की राजनीति में सबसे चौंकाने वाली बात ये है कि राजद और कांग्रेस नेता भी सार्वजनिक रूप से नीतीश कुमार के कामकाज की तारीफ कर रहे हैं, इससे साफ जाहिर हो रहा है कि नीतीश का विकास मुद्दा कहीं न कहीं नीतीश के करीब अन्य नेताओं को ला रहा है।
लालू की गैरमौजूदगी का कितना असर
बिहार में एम-वाई (मुस्लिम-यादव) समीकरण को साथ लेकर राजनीति करने वाले लालू प्रसाद ने फर्श से लेकर अर्स तक का सफर तय किया। जनता दल से अलग होकर 1995 में जनता दल की नींव रखी और लगभग दो दशक तक देश की राजनीति में छाए रहे। मगर अपने कार्यकाल में किए गए कुछ गलतियों का नतीजा है कि आज की तारीख में वो जेल की सलाखों में जिंदगी गुजार रहे है। हलांकि इन्होंने अपने बेटों तेजस्वी और तेज प्रताप की जगह तो बनायी ही नीतीश की पाठशाला में राजनीति का गुर भी सीखाने की कोशिश की मगर वो ज्यादा दिनों तक नहीं चला और दोनों अलग-अलग हो गए। अब 2020 में होने वाले चुनाव में लालू यादव की गैरमौजूदगी का नीतीश कुमार को बड़ा फायदा हो सकता है। वह राजद से अल्पसंख्यक वोट बैंक को खिसकाकर अपने पाले में लाने में सफल हो सकते हैं। इतना ही नहीं नीतीश कुमार विकास के नाम पर मोदी सरकार के साथ और मुद्दों के नाम पर उनके विरोध की राजनीति करके बिहार में अपनी राजनीति को चमकाने में लगे हुए हैं।
आखिर मुस्लिमों की पसंद नीतीश क्यों !
जनता दल यू का यूएसपी उसका विकास मुद्दा रहा है, जिसके बल पर नीतीश सरकार अपनी राजनीति के चमकते स्टार बन चुके हैं। इधर चर्चा ये भी है कि कांग्रेस नेता सह पूर्व केंद्रीय मंत्री शकील अहमद जदयू की तरफ रुख कर लें तो चौंकने वाली बात नहीं है। कांग्रेस के विधायक शकील अहमद खान का बयान बिहार में नीतीश कुमार से अच्छा कोई प्रशासक नहीं है और तेजस्वी यादव के नेतृत्व में चुनाव लड़ने का अब कोई सवाल नहीं है नीतीश की राजनीति को बल दे रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो मुस्लिम नेता अगर अगले विधानसभा चुनाव में राजद के साथ गठबंधन करके चुनावी मैदान में जाएंगे तो उन्हें हार का सामना करने का भय जरुर सता रहा है, जबकि नीतीश के साथ हो जाते हैं तो उनकी नैया पार लग सकती है। एनडीए सरकार में सहयोगी होने के बावजूद नीतीश कुमार ने आर्टिकल 370 ही नहीं बल्कि तीन तलाक के मुद्दे पर भी मोदी सरकार के रुख का समर्थन नहीं किया, जिसका मुस्लिमों का असर बड़े पैमाने पर पड़ा। नीतीश कुमार जहां वह विकास के नाम पर वोट हासिल करने की पहल कर रहे हैं तो वहीं अपने परंपरागत वोट बैंक को बरकरार रखने की नीति भी कह सकते हैं।

एनडीए में रहकर भी मुस्लिमों के हिमायती
बिहारी मुस्लिमों की मानें तो नीतीश कुमार भले ही भाजपा के साथ सूबे की सरकार चला रहे हों, लेकिन इतना तो कहा ही जा सकता है कि मुस्लिम समुदाय के लिए अलग-अलग योजनाओं के अंतर्गत किए जा रहे कार्यों नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। अगर हम पिछले साल की रामनवमी के बाद दंगा भड़काने के आरोप केंद्रीय मंत्री अश्विनी चौबे के पुत्र अर्जित शाश्वत को जेल तक भेजवा चुके हैं। बात चाहे जिनको जो कहना है कह लें मगर इतना तो कहा ही जा सकता है नीतीश कुमार के बारे में कि वो किसी भी कीमत पर अपने अल्पसंख्यकों के वोट बैंक को अपने हाथ से खिसकने नहीं देना चाहते हैं। राज्यसभा से जदयू ने जिस तरह से तीन तलाक और आर्टिकल 370 के मामले पर वॉकआउट किया, उससे साफ झलक गया था कि नीतीश कुमार को हमेशा से अपने वोट बैंक की चिंता बनी रहती है।
(लेखक/ पत्रकार/ स्तंभकार)

पटना (बिहार)
मो.9430623520

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