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आओ कुछ जाने इतिहास के पन्नों से

प्रजापति गौतमी, जो चाह कर भी बौद्ध भिक्षुणी ना बन सकी

As a religious teacher Women’s religious and ritualistic rights are still limited in Buddhism, Christianity and Islam

लेखक – आर्य सागर 

प्रजापति गौतमी बुद्ध की मौसी थी ।बुद्ध की माता महामाया का अकस्मात निधन होने के पश्चात राजकुमार सिद्धार्थ जो आगे चलकर महात्मा बुद्ध कहलाए उनका लालन-पालन उनकी मौसी गौतमी ने किया। बौद्ध दर्शन को लेकर जब बुद्ध की ख्याति दूर-दूर तक फैल गई बुद्ध के जीते जी अनेक विहार स्तूप बनाए जाने लगे। बुद्ध अपने सैकड़ो भिक्षु शिष्यों की मंडली से घिरे रहते एक दिन उनकी मौसी बुद्ध के एक विहार में जाती है, जहां बुद्ध अपने शिष्यों से संवाद कर रहे थे। वहां जाकर उनकी मौसी बुद्ध से करबद्ध अनुरोध करती है कि मैंने तुम्हारा निस्वार्थ भाव से लाल-पालन किया ।मेरे हृदय की हार्दिक इच्छा है में भी इन भिक्षुओं की तरह भिक्षुणी बनना चाहती हूं, मुझे दृढ़ विश्वास है भगवन बुद्ध आप मुझे सहज स्वीकृति देंगे।

बुद्ध ने यह कहते हुए अपनी मौसी के अनुरोध को ठुकरा दिया स्त्रियां बौद्ध भिक्षुणी नहीं बन सकती। बुद्ध की मौसी गौतमी ने बहुत संघर्ष किया भिक्षुणी बनने के लिए लेकिन बुद्ध की दृढ़ निषेधाज्ञा के सामने उनकी एक न चली। बौद्ध इतिहासकार बताते हैं बुद्ध के जीते जी कोई भी महिला भिक्षुणी के रूप में बौद्ध मत में दीक्षित नहीं हो पाई। जैन बौद्ध इस्लाम इसाई जगत में धार्मिक अधिकारों जीवनचर्या को लेकर स्त्रियों के अधिकार सदैव ही सीमित नियंत्रित रहे हैं।

ईसाई मत में तो 21वीं सदी के इस युग में जहां महिलाएं अंतरिक्ष अभियानों में जा रही है छः महीने से अधिक अंतरराष्ट्रीय स्पेस स्टेशन में सफल अंतरिक्ष अभियानों को अंजाम दे रही हैं आज भी कोई भी ईसाई महिला ईसाइयों के चर्च में ईसाई कर्मकांड नहीं कर सकती अर्थात ईसाई महिलाओं को पादरी या प्राइस्ट बनने का अधिकार नहीं है उन्हें नन बनने का अधिकार है ननों के रूप में ईसाई मठों में ननो के शोषण की घटनाएं किसी से छुपी नहीं है । अभी कुछ दिन पहले ईसाइयों के सर्वोच्च धर्म गुरु पोप फ्रांसिस जो आठवीं शताब्दी के पोप ग्रेगरी तृतीया के बाद यूरोप से बाहर के प्रथम अमेरिकी दक्षिणी गोलार्ध से आने वाले पोप थे 12 वर्ष वेटिकेन सिटी में पोप रहे उन्होंने भी ईसाई महिलाओं को पादरी बनने का अधिकार नहीं दिया जबकि गर्भपात व समलैंगिकता को लेकर ईसाई मत विरोधी मानसिकता के विपरीत जाकर पोप ने समलैंगिकता को स्वीकारता प्रदान की वही स्त्रियों के धार्मिक कर्मकांड अधिकारों को लेकर पोप फ्रांसिस की भी वही मान्यता रही जो ईसाई जगत में ईशा के युग से चली आ रही है।

वही प्राचीन वैदिक धर्म की बात करें तो यहां महिलाओं के कर्मकांड करने संन्यासिनी के रूप में महिलाओं को बेहद गौरव पूर्ण रूपेण स्वतंत्रता प्रदान की गयी है वैदिक काल में रोमेशा,गार्गी, सुलभा , अपाला , घोषा जैसी विदुषीयों का वैदिक वांग्मय में उल्लेख मिलता है जो ऋषिका के पद को प्राप्त हुई और जिन्होंने संन्यास लिया ब्रह्मवादिनी कहलाई।

लेकिन ठीक इसके विपरीत मध्यकाल में हिंदू धर्म में स्त्रियों के अधिकार स्त्री विरोधी शक्तियों के द्वारा सीमित किए गए मनमाने कर्मकांड के ग्रंथ मूल वैदिक भावना के विपरीत रचे गए जिनमें महिलाओं को स्वतंत्र रूप से यज्ञ करने का अधिकार नहीं मिला तो कहीं-कहीं उनके वेद अध्ययन पर ही प्रतिबंध लगा दिया गया। विवाह संस्कार को छोड़कर अन्य सभी संस्कार स्त्री के लिए निषेध कर दिए गए ।

भारत के परिपेक्ष्य में 19वीं शताब्दी का काल महिलाओं के लिए स्वर्णिम काल रहा जब आर्य समाज जैसे संगठन का धार्मिक वैचारिक क्षेत्र मे आविर्भाव होता है ।आर्य समाज के संस्थापक महर्षि दयानंद ने महिला विरोधी साहित्य के वचनों को स्वार्थी स्त्री विरोधी लोगों की कपोल कल्पना कहा। उन्होंने मूल वैदिक धर्म के आधार पर जिसमें स्त्री को बहुत ऊंचा गौरवपूर्ण स्थान प्राप्त था उसके आधार पर महिलाओं के पढ़ने उनके यज्ञ करने यहां तक कि उन्हें संन्यासिनी बनने का भी अधिकार दिलाया। आज जग जाहिर है आर्य समाज ने जिस स्त्री शिक्षा के क्षेत्र में क्रांति की महिलाएं बड़ी संख्या में शास्त्री आचार्या बनी आज भी बन रही है, यह उसी का परिणाम है भारतीय समाज में आज महिलाएं मल्टीनेशनल कंपनियों के प्रबंधन से लेकर वह लड़ाकू जहाज उड़ा रही ।परिवार ,मीडिया, कानून, शिक्षा के क्षेत्र में महिलाओं की दमदार उपस्थिति है निर्णायक भूमिका है।

हिंदुत्व की सबसे बड़ी विशेषता यही है यह बहुत लचीला है ।क्योंकि इसके मूल में वैदिक धर्म है जिसके साथ हिंदुत्व को समय-समय पर अनेक महर्षि दयानंद जैसे सुधारको धार्मिक नेताओं ने रिफाइन किया है वही इस्लाम में ईसाइयत में ऐसा नहीं है वह आज भी आदम युगीन अपनी रुढ़िवादी मान्यताओं पर दृढ़ है देश काल परिस्थिति की प्रति वह संवेदी नहीं है। उदाहरण के लिए इस्लामी जगत में आज भी अधिकांश मुस्लिम मज़हबी गुरु उनकी संस्थाएं मुस्लिम महिलाओं के मस्जिद में प्रवेश व नवाज़ पढ़ने को लेकर सख्त खिलाफ है यही स्थिति मुस्लिम महिलाओं के इमाम, मौलवी,काजी उलेमा बनने को लेकर है ।

लेखक – आर्य सागर
तिलपता ग्रेटर नोएडा

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