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जीवन की मर्यादा है श्रीराम का जीवन

  • डॉ. वन्दना सेन

श्रीराम जीवन की मर्यादा हैं। सांस्कृतिक प्रेरणा है। समरसता का पर्याय हैं। भारतीय सांस्कृतिक दर्शन की धारा को प्रवाहित करने वाले भारतीय साहित्य में वसुधैव कुटुम्बकम का भाव सदैव समाहित रहा है। महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित रामायण और संत तुलसीदास द्वारा रचित रामचरितमानस ने सामाजिक समरसता के भाव का प्रवाहन बहुत ही गहनता से किया है। उदारता के भाव से अनुप्राणित भारतीय साहित्य निश्चित ही विश्व समुदाय को अहिंसा और सामाजिक समरसता का धरातलीय संदेश देता है। जिसकी वर्तमान में पूरे विश्व को अत्यंत आवश्यकता है।

वनवासी राम का सम्पूर्ण जीवन सामाजिक समरसता का अनुकरणीय पाथेय है। श्रीराम ने वनगमन के समय प्रत्येक कदम पर समाज के अंतिम व्यक्ति को गले लगाया। केवट के बारे में हम सभी ने सुना ही है, कि कैसे भगवान राम ने उनको गले लगाकर समाज को यह संदेश दिया कि प्रत्येक मनुष्य के अंदर एक ही जीव आत्मा है। बाहर भले ही अलग दिखते हों, लेकिन अंदर से सब एक हैं। यहां जाति का कोई भेद नहीं था। वर्तमान में जिस केवट समाज को वंचित समुदाय की श्रेणी में शामिल किया जाता है, भगवान राम ने उनको गले लगाकर सामाजिक समरसता का अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत किया है। सामाजिक समरसता के भाव को नष्ट करने वाली जो बुराई आज दिखाई दे रही है, वह पुरातन समय में नहीं थी। समाज में विभाजन की रेखा खींचने वाले स्वार्थी व्यक्तियों ने भेदभाव को जन्म दिया है।

वर्तमान में हम स्पष्ट तौर पर देख रहे हैं कि समाज को कमजोर करने का सुनियोजित प्रयास किया जा रहा है, जिसके कारण जहां एक ओर समाज की शक्ति तो कमजोर हो रही है, वहीं देश भी कमजोर हो रहा है। वर्तमान में राम राज्य की संकल्पना को साकार करने की बात तो कही जाती है, लेकिन उसके लिए सकारात्मक प्रयास नहीं किए जा रहे हैं। सामाजिक एकता स्थापित करने के लिए रामायण हम सभी को उचित मार्ग दिखा सकती है।

यह भी सर्वविदित है कि राम वन गमन के दौरान भगवान राम ने निषाद राज को भी गले लगाया, इसका यही तात्पर्य है कि भारत में कभी भी जातिगत आधार पर समाज का विभाजन नहीं था। पूरा समाज एक शरीर की ही तरह था। जैसे शरीर के किसी भी हिस्से में दर्द होता है, तब पूरा शरीर अस्वस्थ हो जाता था। इसी प्रकार समाज की भी अवधारणा है, समाज का कोई भी हिस्सा वंचित हो जाए तो सामाजिक एकता की धारणा समाप्त होने लगती है। हमारे देश में जाति आधारित राजनीति के कारण ही समाज में विभाजन के बीजों का अंकुरण किया गया। जो आज एकता की मर्यादाओं को तार-तार कर रहा है।

भगवान राम ने अपने वनवास काल में समाज को एकता के सूत्र में पिरोने का काम पूरे कौशल के साथ किया। समाज की संग्रहित शक्ति के कारण ही भगवान राम ने आसुरी प्रवृति पर प्रहार किया। समाज को निर्भयता के साथ जीने का मार्ग प्रशस्त किया। इससे यही शिक्षा मिलती है समाज जब एक धारा के साथ प्रवाहित होता है तो कितनी भी बड़ी बुराई हो, उसे नत मस्तक होना ही पड़ता है। सीधे शब्दों में कहा जाए तो संगठन में ही शक्ति है। इससे यह संदेश मिलता है कि हम समाज के साथ कदम मिलाकर नहीं चलेंगे तो हम किसी न किसी रुप में कमजोर होते चले जाएंगे और हमें कोई न कोई दबाता ही चला जाएगा। सम्पूर्ण समाज हमारा अपना परिवार है। कहीं कोई भेदभाव नहीं है। जब इस प्रकार का भाव बढ़ेगा तो स्वाभाविक रुप से हमें किसी भी व्यक्ति से कोई खतरा भी नहीं होगा। आज समाज में जिस प्रकार के खतरे बढ़ते जा रहे हैं, उसका अधिकांश कारण यही है कि समाज का हिस्सा बनने से बहुत दूर हो रहे हैं। अपने जीवन को केवल भाग दौड़ तक सीमित कर दिया है। यह सच है कि व्यक्ति ही व्यक्ति के काम आता है। यही सांस्कृतिक भारत की अवधारणा है।

पूरे विश्व में भारत एक सांस्कृतिक राष्ट्र के रुप में पहचाना जाता है, जब हम भारत को राष्ट्र बोलते हैं, तब हमें इस बात का बोध होना ही चाहिए कि राष्ट्र आखिर होता क्या है? हम इसका अध्ययन करेंगे तो पता चलेगा कि राष्ट्र की एक संस्कृति होती है, एक साहित्यिक अवधारणा होती है, एक आचार विचार होता है, एक जैसी परंपराएं होती हैं। भगवान राम के जीवन में इन सभी का साक्षात दर्शन होता है, इसलिए कहा जा सकता है कि राम जी केवल वर्ग विशेष के न होकर सम्पूर्ण विश्व के हैं। उनके आदर्श हम सभी के लिए हैं। हमें राम जी के जीवन से प्रेरणा लेकर ही अपने जीवन को उत्सर्ग के मार्ग पर ले जाने का उपक्रम करना चाहिए।

डॉ. वन्दना सेन, शिक्षाविद
(लेखिका शिक्षाविद एवं विभागाध्यक्ष हैं)

पीजीवी महाविद्यालय
लश्कर, ग्वालियर मध्यप्रदेश
पिन : 474001

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