‘अग्नि’ किस प्रकार हमारे मन, बुद्धि और बल के लिए लाभकारी है?

agnihotra-hawan

परमात्मा के प्रति समर्पण का क्या महत्त्व है?

का त उपेतिर्मनसो वराय भुवदग्ने शन्तमा का मनीषा।
का वा यज्ञैः परि दक्षं त आप केन वा ते मनसा दाशेम।।
ऋग्वेद मन्त्र 1.76.1 (कुल मन्त्र 823)

(का) क्या (ते) आपका (उपेतिः) उपाय, तरीका, पूजा (मनसः) मन का (वराय) वरण किया (सुधार के लिए) (भुवत्) हो (अग्ने) सर्वोच्च ऊर्जा, परमात्मा, ताप, अग्नि, अग्रणी, ऊर्जावान्, प्रकाशित, पवित्र एवं दिव्य (शन्तमा) शांति देने वाला (का) क्या (मनीषा) बुद्धि, दिव्यता पर चिन्तन करने वाला (कः) कौन (वा) निश्चित रूप से (यज्ञैः) कल्याणकारी कार्य, सामाजिकता की प्रक्रिया (परि) हर प्रकार से, हर कार्य के लिए (दक्षम्) बल, विशेषज्ञता, प्रगति (ते) आपका (आप) प्राप्त करते हो (केन) कैसे, किसके द्वारा (वा) निश्चित रूप से (ते) आपके (मनसा) मन, हृदय (दाशेम) देना, समर्पण।

व्याख्या:-
‘अग्नि’ किस प्रकार हमारे मन, बुद्धि और बल के लिए लाभकारी है?

आपका क्या उपाय है, मन के सुधार के लिए आपकी पूजा का कौन सा तरीका अपनाया जाना चाहिए?
बुद्धि तथा दिव्यता पर एकाग्र होने वाले के लिए शांति देने वाला कौन है?
कौन, कल्याणकारी यज्ञ कार्यों के द्वारा तथा सामाजिकता की प्रक्रिया के द्वारा हर प्रकार से और हर कार्य के लिए आपका बल, विशेषज्ञता और प्रगति प्राप्त करता है?
किस मन और हृदय के साथ निश्चित रूप से हम आपके प्रति समर्पण कैसे करें?

जीवन में सार्थकता: –
परमात्मा के प्रति समर्पण का क्या महत्त्व है?

इस मन्त्र में हम ‘अग्नि’ से तीन लाभ मांगते हैं:-
1. मन का सुधार,
2. दिव्यताओं पर ध्यान एकाग्र करने के साथ-साथ शान्त बुद्धि,
3. बल।
इन तीन प्रार्थनाओं के साथ हम सर्वोच्च ऊर्जा से प्रश्न करते हैं कि किस मन के साथ और किस प्रकार हम उसके प्रति समर्पित हों।
जिस प्रकार बिना भुगतान किये हमें कुछ प्राप्त नहीं होता, उसी प्रकार समर्पण किये बिना हम अपने मन का सुधार नहीं कर सकते, अपनी बुद्धि में शांति प्राप्त नहीं कर सकते और भिन्न-भिन्न प्रकार के बल प्राप्त नहीं कर सकते। इसलिए आत्मा की यात्रा पर प्रगति प्राप्त करने के लिए परमात्मा के प्रति आत्म समर्पण सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण है।

सूक्ति:-
(केन वा ते मनसा दाशेम – ऋग्वेद 1.76.1)
किस मन और हृदय के साथ निश्चित रूप से हम आपके प्रति समर्पण कैसे करें?

सूक्ति:-
(शन्तमा का मनीषा कः – ऋग्वेद 1.76.1)
बुद्धि तथा दिव्यता पर एकाग्र होने वाले के लिए शांति देने वाला कौन है?

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अपने आध्यात्मिक दायित्व को समझें

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