वैदिक संपत्ति 271 वेदमंत्रों के उपदेश

वेदमंत्रों के उपदेश

(ये लेखमाला हम पं. रघुनंदन शर्मा जी की ‘वैदिक सम्पत्ति’ नामक पुस्तक के आधार पर सुधि पाठकों के लिए प्रस्तुत कर रहें हैं)

प्रस्तुतिः देवेन्द्र सिंह आर्य
(चेयरमैन ‘उगता भारत’)

आर्यों की कामसम्बन्धी नीति

संसार का अनुभव बतलाता है कि व्यक्ति, समाज और राष्ट्र को समय समय पर सन्तति अर्थात् जनसंख्या की आवश्यकता, आवश्यकता और अत्यावश्यकता होती ही रहती है। जिस समय राष्ट्र और समाज में शान्ति रहती है उस समय मोक्षमार्गियों के अतिरिक्त शेष समस्त समाज को मृत्यु के परिमाण से सन्तान की आवश्यकता रहती है। परन्तु जिस समय युद्ध जारी हो जाता है अथवा समाप्त हो जाता है उस समय संतान की आवश्यकता बेहद बढ़ जाती है। इसी तरह शान्ति के समय सुख-शान्ति के कारण सन्तान बेहद बढ़ जाती है उस समय सन्तान के कम करने की भी आवश्यकता हो जाती है। ऐसी दशा में इच्छानुसार अधिक सन्तति उत्पन्न करने या कम सन्तति करने या बिलकुल ही सन्तति उत्पन्न करना बन्द कर देने की शक्ति उसी में हो सकती है जिसकी सामाजिक शिक्षा की दीवार अखण्ड ब्रह्मचर्य व्रत की नींव पर उठाई गई हो। आर्यों ने अपनी सभ्यता की इमारत अखण्ड ब्रह्मचर्य पर ही खड़ी की है, इसीलिए आर्यसभ्यता के अनुसार आर्यों को ब्रह्मचर्य, वानप्रस्थ और संन्यास आश्रम के पचहत्तर वर्ष अखण्ड ब्रह्मचर्य-दशा में ही बिताने के लिए जोर दिया गया है और गृहस्थ को भी अधिक रति से बचने के लिए यज्ञोपवीत-संस्कार से ही सन्ध्योपासन प्राणायाम, शृङ्गारवर्जन, सादगी, तपस्वी जीवन और मोक्षमार्ग का ध्येय बतलाकर अमोघवीर्यत्व सम्पादन करने का उपदेश किया गया है। क्योंकि सन्ततिनिरोध की शक्ति अमोधवीर्य पुरुष में ही हो सकती है और वही आवश्यकतानुसार एक, दो अथवा दस सन्तान उत्पन्न कर सकता है और वही चाहे तो सन्तानका उत्पन्न करना एकदम बन्द भी कर सकता है। आर्यसभ्यता के इतिहास में इस प्रकार के प्रजोत्पत्तित्तम्बन्धी तीन सिद्धान्त और तीनों के ऐतिहासिक प्रमाण मिलते हैं, अतः हम यहाँ तीनों का सारांश रूप से वर्णन करते हैं।

पहिला प्रमाण उन व्यक्तियों का मिलता है जो क्षीणदोष उत्पन्न होते हैं और जन्म से ही मोक्षमार्ग में लग जाते हैं। वे कभी प्रजा की इच्छा नहीं करते। बृहदारण्यक उपनिषद् में लिखा है कि ‘ पूर्व विद्वासः प्रजां न कामयन्ते कि प्रजया करिष्यामः’ अर्थात् पूर्व समय में विद्वान् सन्तान की कामना नहीं करते थे। वे कहते थे कि प्रजा को क्या करेंगे । ऐसे आजीवन ब्रह्मचारी इस देश में हजारों लाखों हो चुके हैं। मनुस्मृति में लिखा है कि-

अनेकानि सहस्राणि कुमारब्रह्मचारिणाम् ।
दिवं गतानि विप्राणामकृत्वा कुलसन्ततिम् ।।

अर्थात् हजारों ब्राह्मण ब्रह्मचारी विना सन्तति के कुमार अवस्था से ही मोक्षगामी हो गये। इतना ही नहीं कि पूर्वकाल में पुरुष ही इस प्रकार के होते थे, प्रत्युत उस समय की कन्याएँ भी कुमारी रहकर आजन्म ब्रह्मचारिणी रहकर मोक्षभागिनी होती थीं। महाभारत में लिखा है कि लोमशऋषि युधिष्ठिर से कहते हैं कि-

अत्रैव ब्राह्मणी सिद्धा कौमारब्रह्मधारिणी ।
योगयुक्ता दिवं याता तपःसिद्धा तपस्विनी ।
बभूव श्रीमती राजन् शांडीलस्य महात्मनः ।
सुता धृतवती साध्वी नियता ब्रह्मचारिणी ।
सा तु तप्त्वा तपो घोरं दुश्वरं स्त्रीजनेन च ।
गता स्वर्ग महाभाग देवब्राह्मणपूजिता । (महा० शल्य० अ० 54)

अर्थात् इसी स्थान पर शांडिल्य ऋषि की कन्या धृतवती ने आजन्म ब्रह्मचारिणी रहकर और विद्वानों से सत्कृत होकर मोक्ष लाभ किया था। वहीं पर अध्याय 49 में फिर लिखा है कि-

भारद्वाजस्य दुहिता रूपेणाप्रतिमा भुवि ।
श्रुतावती नाम विभो कुमारी ब्रह्मचारिणी ।।
साहं तस्मिन् कुले जाता भर्तर्वसती मद्धिधे।।
विनीता मोक्षधर्मेषु चराम्येका मुनिव्रतम् ।।

अर्थात् भारद्वाज की पुत्री श्रतावती ने भी आजन्म ब्रह्मचर्यव्रत पालन किया था। इतना ही नहीं प्रत्युत याज्ञवल्क्य और मैत्रेयी ने विवाह करके भी कभी सन्तान उत्पन्न नहीं किया। इन ऐतिहासिक प्रमाणों से पाया जाता है कि पूर्वकाल में आर्य लोग बिना सन्तति के आजीवन ब्रह्मचारी रहकर मोक्ष प्राप्त करते थे।
क्रमशः

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