चक्रवर्ती सम्राट कनिष्क गुर्जर वंश से थे – भाग 4

Kanishka gurjar king

वैदिक आर्यों की ही संतान थे गुर्जर सम्राट कनिष्क और उनके वंशज। कई इतिहासकारों ने ऐसा माना है कि गुर्जर शासकों का धर्म मिहिर अर्थात सूर्य था । जिन लोगों ने अपनी ऐसी धारणा व्यक्त की है उन्हें यह ज्ञात होना चाहिए कि मिहिर या सूर्य कोई धर्म नहीं होता , अपितु यह एक देवता है । क्योंकि यह संसार को प्रकाश प्रदान करता है । हम पूर्व में यह स्पष्ट कर चुके हैं कि भारत में क्षत्रियों का एक ही सूर्यवंश प्राचीन काल से चला आ रहा था , इसलिए आर्यों की क्षत्रिय परम्परा के लोग जहाँ – जहाँ भी रहे या विश्व में जहाँ – जहाँ भी गए वहीं – वहीं वे सूर्योपासना करना नहीं भूले । सूर्योपासना का अभिप्राय है – :तमसो मा ज्योतिर्गमय ‘ – की पवित्र भावना को साथ रखकर और उसी को अपना आदर्श बनाकर संसार के उपकार और कल्याण के लिए कार्य करना । कुछ कालोपरान्त यह परंपरा रूढ़िगत हो गई और लोग जड़ता में फंस गए । अतः हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि मिहिर कोई धर्म नहीं है । धर्म तो मनुष्य का केवल मानवता है और मानवता को क्योंकि वैदिक धर्म ही उत्तमता से प्रदान कर सकता है इसलिए सबका मूल वैदिक धर्म ही है ।

गुर्जरों के महान शासकों में कनिष्क का नाम भी बड़े सम्मान के साथ लिया जाता है। कनिष्क प्रथम या कनिष्क महान के नाम से विख्यात कुषाण राजवंश का एक महान शासक हुआ है। उसने अपने महान कार्यों , उत्तम कार्य शैली और जनहितकारी नीतियों के कारण भारत के ही नहीं बल्कि एशिया के महानतम शासकों में अपना स्थान सुरक्षित किया ।

उसके शासनकाल का अवलोकन करने से हमें पता चलता है कि वह भारतीय इतिहास में अपनी विजय , धार्मिक प्रवृत्ति ,साहित्य तथा कला का अनन्य प्रेमी होने के कारण अपने जीवन में महान यश को प्राप्त हुआ। उसने अपनी कार्यशैली और राजनीति को भारतीय संस्कारों के अनुसार ढालकर चलाने का सराहनीय प्रयास किया । यह तभी संभव होता है जब कोई शासक राजनीति के सूक्ष्म संस्कारों को अंगीकार करने की इच्छा शक्ति रखता है । निश्चित रूप से कनिष्क ने भारत की प्राचीन राजनीतिक संस्कार शैली को अपना कर यह सिद्ध किया कि वह उसके सूक्ष्म संस्कारों से हृदय से प्रभावित था और जनकल्याण के लिए भारतीय वैदिक राजनीतिक संस्कारों को ही उचित मानता था। जिन विद्वानों ने कनिष्क को आज के शासकों की भांति ‘धर्मनिरपेक्ष’ बताते हुए कई धर्मों का सम्मान करने वाला मानकर यह सिद्ध करने का प्रयास किया है कि उसने उन सबका सम्मान किया इसलिए वह किसी एक धर्म के प्रति बंधा हुआ नहीं था , उन्हें यह पता होना चाहिए कि सभी सम्प्रदायों का सम्मान वही शासक कर सकता है जो मौलिक वैदिक सिद्धांतों और राजनीतिक कार्यशैली को अपना कर चलने में विश्वास रखता हो। यद्यपि कनिष्क के समय तक आते-आते मूर्ति पूजा और पाखंडवाद का राजनीति में भी प्रवेश हो चुका था । जिसका प्रभाव उसकी कार्यशैली पर पड़ना भी निश्चित था ,परंतु यहाँ पर हम इस बात पर चिन्तन न करके केवल इतना बताने का प्रयास कर रहे हैं कि कनिष्क ने भारतीय राजनीतिक सिद्धांतों और जनहितकारी नीतियों सम्बन्धी भारत के महान ऋषियों के चिन्तन को अपनाकर चलना ही उचित समझा था। कुषाण भी प्राचीन आर्यों की ही संतान थे – राहुल सांकृत्यायन जी ‘मध्य एशिया का इतिहास’- खंड – 1 ,पेज 159 , पर लिखते हैं कि यूची , कुषाण, तुखार , बुसुन , श्वेत हूण , आभीर , पार्थ , खश , सरमात आदि शकों की प्रमुख शाखाएं थीं । जबकि खंड 1 के पेज 138 पर वह यह भी लिखते हैं कि शकों की विचरण भूमि सप्तनद थी । जहाँ तुखारी प्राकृत भाषा और भारतीय लिपि की प्रधानता थी। अनेक पुराणों में शक गुर्जरों का विशद वर्णन हुआ है। ‘हरिवंश पुराण’ में उल्लेख है कि नरिष्यन्त के पुत्रों का नाम शक है । पंडित रघुनंदन शर्मा विभिन्न पुराणों एवं महाभारत से उद्धरण प्रस्तुत कर यह स्पष्ट करते हैं कि शक नरिष्यन्त के ही पुत्र थे। ‘वैदिक संपत्ति’ के खंड – 3 में पंडित रघुनंदन शर्मा जी हमें यह भी बताते हैं कि यह शक लोग राजा सगर से हारने पर जम्बूद्वीप छोड़कर चले गए थे । जहाँ जाकर वह बसे उस स्थान का नाम कालान्तर में शक द्वीप हो गया। राहुल सांकृत्यायन जी कहते हैं कि – ” ईसा पूर्व 7वीं – 8वीं शताब्दी से देखते हैं कि सारे मध्य एशिया में हिंद – यूरोपीय वंश की शक आर्य शाखा का ही प्राधान्य है । मध्य एशिया में उन्होंने मुण्डा द्रविड़ के प्राधान्य को नष्ट किया और स्वयं उनका स्थान लेकर आगे उत्तरापथ और सिक्यांग में शक और दक्षिणापथ में आर्य के रूप में अपने को प्रकट किया ।’ पंडित रघुनंदन शर्मा लिखते हैं कि – ”जहां से सारी मनुष्य जाति संसार में फैली है , उस मूल स्थान का पता हिंदुओं , पारसियों , यहूदियों और क्रिश्चियनों की धर्म पुस्तकों से इस प्रकार लगता है कि वह स्थान कहीं मध्य एशिया में था । इस प्रकार सच्चे आर्यों की प्रधान ईरानी शाखा ने हिमालय का इशारा किया है।” इस प्रकार इन विद्वानों के प्रमाणों से यह स्पष्ट होता है कि शक , कुषाण आदि बाहरी जाति न होकर आर्यों की ही शाखा थीं। हमें यहाँ पर यह बात भी ध्यान में रखनी चाहिए कि जिस समय की बात हम कर रहे हैं उस समय का भारतवर्ष आज के भारत वर्ष जितना नहीं था । ध्यान रहे कि 1857 की क्रांति के समय भी भारतवर्ष 83 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में फैला हुआ था । उससे पहले तो इसका क्षेत्रफल और भी अधिक था । जबकि आज यह लगभग 32 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल का ही देश है। उपरोक्त वर्णन से स्पष्ट होता है कि हिंदू कुश कभी हमारे देश की सीमा हुआ करती थी और उससे पहले जाएं तो और भी अधिक विस्तार भारतवर्ष का देखने को मिलता है।

एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका ( खंड 2 , पृष्ठ 513 , लंदन ) के अनुसार मध्य एशिया का दक्षिणी भाग तिब्बत तक फैला हुआ था । तिब्बत व भारत की भौगोलिक व सांस्कृतिक अस्मिता निकटता सदियों से रही है। तिब्बतियों और भारतीयों के बीच आपसी व्यापार के लिए दोनों देशों की सीमाएं सदा खुली रही हैं तथा पारस्परिक अधिग्रहण भी रहा है। एक अन्य विद्वान बिलांची महोदय के अनुसार मध्य एशिया, आर्मीनिया , इरान , बैक्ट्रिया व सोगदियाना का क्षेत्र है। निश्चित ही यह क्षेत्र आर्यवर्त क्षेत्र में ही आते थे। इस प्रकार गुर्जरों को यदि मध्य एशिया से आने वाली जाति भी मान लिया जाए तो भी यह ‘मध्य एशिया’ जैसा शब्द आज के सन्दर्भ में ही लागू होता है । प्राचीन काल में क्योंकि मध्य एशिया भारत का ही एक अंग था , इसलिए वहाँ से आने वाले किसी भी व्यक्ति या जातीय समूह को विदेशी नहीं माना जा सकता। कुषाण वंश का प्रारंभिक काल – प्राचीन भारत के राजवंशों में कुषाण राजवंश का बहुत महत्वपूर्ण स्थान है । चीन के यूएझी लोगों के मूल से इतिहासकार इस राजवंश की उत्पत्ति पर अपनी सहमति व्यक्त करते हैं । यूएझी लोगों के इस कबीले के बारे में यूरोप के अनेकों इतिहासकार इस बात पर सहमत हैं कि यह कबीला प्राचीन काल के भारत के आर्यों की ही एक शाखा थी। ऐसे इतिहासकारों में प्रोफेसर वीएस स्मिथ और कनिंघम का नाम विशेष रूप से लिया जा सकता है । जिनका मानना है कि यूएझी लोग उन्हीं आर्य कबीलों में से थे जो कि कई चरणों में भारत आये । कुषाण लोग अपने आरम्भिक काल में स्वयं को ‘कोसानो’ लिखते थे तथा ‘गुसुर’ कबीले के थे । ‘गुसुर’ शब्द ‘गुर्जर’ के कितना समानार्थक है ? यह तो नहीं कहा जा सकता , परंतु कुषाण लोगों ने जिस प्रकार भारत के गुर्जर समाज की सभी क्षत्रिय और सांस्कृतिक परम्पराओं को स्वीकार कर आत्मसात किया है उससे यह कहा जा सकता है कि ये लोग आर्यों की ही संतानें थे । जिन्हें आर्यों की संतान गुर्जरों के साथ मिलने में कोई कष्ट नहीं हुआ। स्पष्ट है कि ऐसा तभी सम्भव होता है जब दो समुदायों के मूल संस्कार एक जैसे ही होते हैं। इन मूल संस्कारों के निर्माण में जातीय संस्कार भी सम्मिलित होते हैं। इन्हीं संस्कारों से व्यक्ति या उसके समुदाय की मूल चेतना का निर्माण होता है । वह चेतना उसे उसी चेतना के साथ जोड़ती है जिसके गुण , कर्म , स्वभाव समान होते हैं। इस बात को हमें यूएझी लोगों और गुर्जर समाज के सन्दर्भ में गहराई से समझना चाहिए। राबातक के अभिलेखों से उपरोक्त मत की पुष्टि होती है। इससे यह स्पष्ट होता है कि देर – सबेर इस कबीले ने अपने आपको गुर्जरों के कषाणा/कसाणा कबीले में आत्मसात कर लिया होगा। सम्राट कनिष्क ने अपना नाम पूर्णतया भारतीयकरण कर लिया था। कुछ विद्वान लेखकों का मानना है कि सम्राट कनिष्क ने अपनी राजकीय भाषा भी बैक्ट्रीयन आर्य भाषा कर ली । बैक्ट्रियन भाषा के बारे में हमारा मानना है कि यह भाषा अपने आप में भाषा न होकर एक बोली मात्र थी । हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि अनेकों भाषाओं के मतिभ्रम में न फंसकर हमें यह स्वीकार करना चाहिए कि मूल रूप में संपूर्ण भूमण्डल की एक ही भाषा थी । जिसे आर्यभाषा संस्कृत कहा जाता है । सम्पूर्ण भूमण्डल के निवासी एक अर्थात आर्य , उनका धर्म शास्त्र वेद एक और उनकी जाति (अर्थात मानव ) भी एक थी । ऐसे में स्वभाविक है कि उनकी भाषा भी एक ही रही होगी । इस भाषा से बिगड़ – बिगड़ कर जो नवीन भाषाएं बनीं वे भाषा न होकर बोलियां थीं । जैसा कि हम आज भी देखते हैं। 1947 में देश के स्वतंत्र होने के समय भारतवर्ष में भी 1652 कथित भाषाएं थीं । वस्तुतः यह 1652 भाषाएं न होकर आंचलिक या क्षेत्रीय बोलियां थीं । जो आज भी देश में ज्यों की त्यों मिलती हैं । हमारे लिए समस्या उस समय उठ खड़ी होती है जब हम प्राचीन काल से ही भाषाओं का स्वतंत्र अस्तित्व खोजने लगते हैं । वास्तव में प्राचीन काल से ही मनुष्य की अनेकों भाषाएं होने का यह सारा गुड़ गोबर पश्चिमी विद्वानों ने किया है । जिससे विश्व की एक संस्कृति , एक धर्म और एक भाषा की ओर लोगों का ध्यान न जाए और आर्य संस्कृति या वैदिक संस्कृति की प्रधानता या प्रमुखता लोगों की दृष्टि में न आए। भाषा के बारे में समझने योग्य तथ्य – यह तो माना जा सकता है कि देश ,काल , परिस्थिति के अनुसार बैक्ट्रियन या किसी भी भाषा / बोली की अपनी लिपि या थोड़े बहुत शब्द अलग हो सकते हैं , परंतु आम बोलचाल में ही यह अन्तर दिखाई देता होगा। विद्वान लोग तो वैसे ही संस्कृत को परस्पर समझते होंगे जैसे आज अनेकों बोलियों को बोलने वाले लोग भी हिंदी को बड़ी सहजता से समझ लेते हैं और पढ़ भी लेते हैं। निश्चित रूप से बैक्ट्रियन और संस्कृत में कोई विशेष अन्तर नहीं था । इसलिए किसी भी काल्पनिक भाषाई समस्या पर हमें कुषाणों और तत्कालीन भारतीय लोगों के बीच संवादात्मक दूरी का आभास नहीं करना चाहिए। इसके स्थान पर यह समझना चाहिए कि यह सब एक ही परिवार के लोग थे , एक ही भाषा , एक ही धर्म और एक ही संस्कृति को मानने वाले लोग थे। भौगोलिक परिस्थितियों के अनुसार थोड़ा बहुत भूषा में और दूर – दूर बसे होने के कारण कुछ भाषा में परिवर्तन आना स्वाभाविक था , परन्तु यह सब भी सांस्कृतिक मूल्यों को मिटाने वाला नहीं होता। हमें ध्यान रखना चाहिए कि सांस्कृतिक मूल्यों की निकटता से ही लोग परस्पर एक दूसरे को अपना मानने के भाव से बंधे रहते हैं। कुषाणों की मुख्य बोलचाल की भाषा ( वास्तव में बोली ) गुर्जरी/गांधारी थी । अत: यहाँ एक प्रमाण और मिल जाता है कि वे कषाणा समुदाय में सम्मिलित हुए और इस प्रकार आर्य संस्कृति में कुषाण अपने आपको आत्मसात करके आर्य्यावर्त्त में शासन करने लगे। अफगानिस्तान के इतिहासकारों के अनुसार वो कोसाना(गुज्जर) कबीले से सम्बंध रखते हैं।

हमें एक बात यह भी ध्यान रखनी चाहिए कि जब कोई विदेशी आक्रामक भारत में तुर्क और मुगलों के रूप में या अंग्रेजों के रूप में आया तो यहाँ की जनता ने भी उन्हें कभी अपना शासक स्वीकार नहीं किया। यही कारण रहा कि तुर्कों , मुगलों और अंग्रेजों के शासनकाल में उनके विरुद्ध यहाँ की जनता सदैव आक्रामक और विद्रोही बनी रही। इसका एक ही कारण था कि यह विदेशी आक्रमणकारी शासक भारत की जनता के साथ प्रेमपूर्ण बर्ताव नहीं करते थे और उसके मौलिक अधिकारों का हनन करने वाले थे। दूसरे इन सबके धर्म और संस्कृति भी अलग थे। जिन्हें यहाँ के लोगों ने स्वीकार करना अपनी हत्या के समान समझा। जबकि कुषाण जब भारत में कथित रूप से आए तो उनके विरुद्ध यहाँ की जनता के किसी विद्रोह की सूचना हमें नहीं मिलती। स्पष्ट है कि यहां की जनता ने उन्हें अपना मानकर स्वीकार किया। भारत के लोगों के द्वारा उन्हें अपना मानने का एक कारण यह था कि वे लोग मूल रूप से भारतीय धर्म व संस्कृति से प्यार करने वाले थे और यहां के लोगों को अपना मानने वाले थे। इसके अतिरिक्त हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि कोई भी विदेशी शासक अपनी राजधानी वहीं पर बनाता है जहां पर वह उसे सबसे अधिक सुरक्षित समझता है । यदि कुषाण वंश के शासकों ने अपनी राजधानी पेशावर (पुरुषपुर ) बनाई तो निश्चय ही यह तभी संभव हुआ होगा जब उन्होंने इस स्थान को अपने लिए सबसे अधिक उपयुक्त और सुरक्षित समझा होगा अर्थात यह भी समझ लिया होगा कि भारत के लोग उनका विरोध नहीं करेंगे। यूएची लोगों का प्रारंभिक काल – यूएची लोगों का सामना ह्युगनु कबीलों से होता रहता था । ह्युगनु एक बलशाली कबीला था । जिसने अपने बल से यूएझी लोगों को इनके क्षेत्र से मार भगाने में सफलता प्राप्त की। बताया जाता है कि ह्युगनु के राजा ने ह्यूची के राजा की हत्या कर दी। ह्यूची राजा की रानी के नेतृत्व में ह्यूची या यूएझी लोग वहाँ से पश्चिम दिशा में अपने लिए सुरक्षित स्थान या देश खोजने के उद्देश्य से निकल पड़े। उस समय संपूर्ण संसार संक्रमण काल से गुजर रहा था। यह वह समय था जब आर्यों के विशाल साम्राज्य का पतन हो चुका था और वह इधर – उधर या तो बिखरे पड़े थे या फिर सिमटकर तत्कालीन भारतवर्ष की सीमाओं तक रह गए थे। संक्रमण के उस काल में कभी आर्यों के शासन के अधीन रही खाली पड़ी भूमि पर लोग कब्जा करने के लिए भागते थे। इस प्रसंग में हमें ध्यान रखना चाहिए कि अंग्रेजों और उनसे पूर्व मुगलों के काल में भारत के लोगों ने भी बड़ी मात्रा में मुगलों के जजिया कर और अंग्रेजों के भी मालगुजारी आदि के कठोर कानूनों के चलते अपनी जमीन को जोतना बोना छोड़ दिया था । उनके द्वारा छोड़ी गई वह भूमि सरकारी भूमि हो गई । आजादी के बाद देश के बहुत से स्थानों पर देश की सरकारों ने खेती को बढ़ावा देने के उद्देश्य से लोगों को इस जमीन को फिर से उपजाऊ करने के लिए पट्टे पर देना आरम्भ किया। इतना ही नहीं कितने ही स्थानों पर जिन किसानों ने जमीन को तोड़ लिया अर्थात जोत बो करके अपने खेत में मिला लिया , उस जमीन को सरकार की ओर से उन्हीं की मान लिया गया। कहने का अभिप्राय है कि जैसे उस सरकारी जमीन को अपनी जोत में मिलाने की आपाधापी आजादी के समय के एकदम बाद हमारे देश के किसानों में मची थी , वैसी ही आर्यों के द्वारा छोड़ी गई भूमि , क्षेत्र , प्रांत या प्रदेश को असामाजिक तत्व या कबीले वैध या अवैध रूप से कब्जाने के कार्य में लगे हुए थे ।

संक्रमण के इसी काल में यूएझी लोग भी अपने मूल स्थान से भगा दिए गए । तब वह संक्रमण के उस काल में अपने लिए भूमि खोजने हेतु दूसरे स्थान की खोज में चले। रास्ते में ईली नदी के तट पर इनका सामना व्ह्सुन नामक कबीलों से हुआ। व्ह्सुन इनके भारी संख्याबल के सामने टिक न सके और परास्त हुए। ह्यूची लोगों ने उनके उपर अपना अधिकार कर लिया। यहाँ से ह्यूची दो भागों में बंट गये, ह्यूची का जो भाग यहाँ रुक गया वो लघु ह्यूची कहलाया और जो भाग यहाँ से और पश्चिम दिशा में बढा वो महान ह्यूची कहलाया। महान ह्यूची का सामना शकों से भी हुआ। शकों को इन्होंने परास्त कर दिया और वे नये निवासों की खोज में उत्तर के दर्रों से भारत आ गये। ह्यूची पश्चिम दिशा में चलते हुए अकसास नदी की घाटी में पहुँचे और वहां के शान्तिप्रिय निवासियों पर अपना अधिकार कर लिया। सम्भवतः इनका अधिकार बैक्ट्रिया पर भी रहा होगा। इस क्ष्रेत्र में वे लगभग 10 वर्ष ई0पू0 तक शान्ति से रहे। चीनी लेखक फान-ये ने लिखा है कि यहाँ पर महान ह्यूची 5 शाखाओं में विभक्त हो गये। जिनके नाम ह्यू मी , चांगमी , हीथुन , कुवेई-च्वांग तथा काऊफू थे। इस विभाजन के लगभग 100 वर्ष पश्चात कुई-च्वांग ने क्यु-तिसी-क्यो के नेतृत्व में अन्य चार शाखाओं पर विजय प्राप्त की और उन्हें अपने अधीन कर लिया। क्यु-तिसी-क्यो को राजा बना दिया गया। क्यु-तिसी-क्यो ने लगभग 80 वर्ष तक शासन किया। उसके पश्चात उसके पुत्र येन-काओ-ट्चेन ने शासन सम्भाला। उसने भारतीय प्रान्त तक्षशिला पर विजय प्राप्त की। चीनी साहित्य में ऐसा विवरण मिलता है कि, येन-काओ-ट्चेन ने ह्येन-चाओ (चीनी भाषा में जिसका अभिप्राय है – बड़ी नदी के किनारे का प्रदेश जो सम्भवतः तक्षशिला ही रहा होगा)। यहां से कुई-शुआंग की क्षमता बहुत बढ़ गयी और कालान्तर में उन्हें कुषाण कहा गया। कुवेई-च्वांग से कुवेईशांग बना और कुवेईशांग से कुषाण शब्द प्रचलित हुआ। इतिहासकारों ने सिक्कों व शिलालेखों का मिलान करने पर यह भी सिद्ध किया कि चीनियों ने जिस कबीले या उपजाति को अपनी भाषा में कुवेईच्वांग लिखा है वह कुषाण अथवा कुशान और उसका नेता या प्रथम सम्राट कुजुलकदफिस था।
– डॉ राकेश कुमार आर्य (उगता भारत)

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