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स्वामी दयानंद सरस्वती के जीवन और कार्यों की प्रमुख विशेषताएँ

  • भावेश मेरजा

1. परंपरागत शैव और ब्राह्मण परिवार में जन्म लेने के बावजूद, केवल चौदह वर्ष की आयु में मूर्तिपूजा का खोखलापन समझ लेना और इससे पूर्ण रूप से विरक्ति हो जाना।

2. अपनी बहन और चाचा की मृत्यु को देखकर जीवन और मृत्यु के बारे में गंभीर चिंतन करना और युवावस्था में वैराग्य के भाव को धारण कर गृहत्याग करना।

3. मृत्यु के दुःख से मुक्ति पाने के लिए योग की आवश्यकता को समझना और सच्चे शिव या ईश्वर के दर्शन-साक्षात्कार करने के संकल्प के साथ अनेक वर्षों तक उच्च कोटि के योगियों और विद्यागुरुओं के अन्वेषण के लिए निरंतर और कष्टसाध्य यात्रा करना।

4. मथुरा में स्वामी विरजानंद सरस्वती जैसे अद्भुत प्रज्ञाचक्षु और ज्ञानी वैयाकरण के पास पहुँचना, और 35 वर्ष की आयु में एक संन्यासी होते हुए भी एक नियमित छात्र के रूप में उनसे अष्टाध्यायी, महाभाष्य आदि ग्रंथों का अध्ययन करना।

5. अपने गुरु की इच्छा के अनुसार अपने सम्पूर्ण जीवन को वैदिक धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए, आर्ष ग्रंथों के उद्धार के लिए और पाखंड मतों तथा अनार्ष नवीन ग्रंथों के अविद्या अंधकार को दूर करने के लिए दृढ़ प्रतिज्ञा लेकर उसे पूरी निष्ठा और पुरुषार्थ से निभाना।

6. वर्षों तक अनेक छोटे-बड़े ग्रामों, नगरों और तीर्थों के स्थानों पर पैदल चलकर धर्मप्रचार करना, अंधविश्वासों और पाखंडों का निर्भीकता से खंडन करना और अपना नाम प्रसिद्ध करना।

7. कुम्भ आदि मेलों में उपस्थित होकर पाखंड मतों का खंडन करना और वेद धर्म की व्याख्या करना।

8. काशी के प्रसिद्ध पंडितों के साथ हजारों पौराणिक लोगों के बीच मूर्तिपूजा जैसे विषयों पर एकाकी शास्त्रार्थ करना और यह सिद्ध करना कि वेदों में मूर्तिपूजा के लिए कोई स्थान नहीं है।

9. विज्ञापनों के माध्यम से अपने प्रतिपक्षी विद्वानों को शास्त्रार्थ के लिए बार-बार ललकारना।

10. पौराणिक और तांत्रिक ग्रंथों के उपरांत जैन, ईसाई, इस्लाम आदि मत-मजहबों के मान्य ग्रंथों को पढ़ना-समझना और उनकी मिथ्या बातों का खुलकर खंडन करना।

11. देशभर में निरंतर यात्राएं करना और अधिकाधिक जनता तक अपनी बातें पहुंचाने के लिए शास्त्रचर्चा, प्रश्नोत्तर, संवाद, शास्त्रार्थ और प्रवचन करते रहना।

12. “सत्यार्थ प्रकाश” जैसे अनेक ग्रंथों की रचना करना और आर्ष ग्रंथों का आधार लेकर वेदों का संस्कृत और हिंदी दोनों में भाष्य करना।

13. एक संन्यासी के रूप में अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए विरोधियों द्वारा की जाने वाली उपेक्षा, अपमान, तिरस्कार, धुत्कार, निंदा, कष्ट, पीड़ा, आक्रमण, विषपान आदि को सहन करना और अंततः इसी मार्ग पर चलते हुए अपने जीवन को समर्पित करना, मृत्यु का वरण करना।

14. आर्य समाज, परोपकारिणी सभा, गोकृष्यादिरक्षिणी सभा, वैदिक यन्त्रालय आदि की स्थापना करके वैदिक धर्म को विश्वभर में फैलाने के लिए पुरुषार्थ करना।

15. महान तपस्वी, ब्रह्मचारी, योगी, ज्ञानी, कर्मठ, परोपकारी, देशोपकारी, वाग्मी, समाज सुधारक होते हुए भी स्वयं को केवल एक संन्यासी, उपदेशक और ईश्वर-उपासक समझना और अपने अनुयायियों और प्रशंसकों को भी यह शिक्षा देना कि मैं केवल एक संन्यासी, उपदेशक और ईश्वर-उपासक हूँ, मेरी अनावश्यक स्तुति या पूजा न करना, केवल एक ईश्वर ही उपास्य हैं – उनकी यह अमूल्य शिक्षा आज भी प्रासंगिक है।

इन्हीं गुणों और कार्यों के कारण वे महर्षि कहलाए।

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