Categories
व्यक्तित्व

आर्यसमाज के महाधन महात्मा दीपचन्द आर्य

चंचला लक्ष्मी को वैदिक धर्म के प्रचार द्वारा श्री व यशस्वी रुप में बदलने का सत्कार्य करने वाले महात्मा दीपचन्द आर्य

भारत में मध्यकाल में देश में अविद्या छा जाने के कारण जो नाना अन्धविश्वास एवं कुरीतियां उत्पन्न हुईं उससे कई मत-मतान्तर उत्पन्न हुए और इनसे परस्पर वैर भावना में वृद्धि हुई। ऋषि दयानन्द ने अपने अथक परिश्रम से इसका कारण जाना और पाया कि वेदों में निहित सत्यज्ञान को भूल जाने के कारण ऐसा हुआ। उन्होंने लोगों को उपदेश, विधर्मियों से शास्त्रार्थ एवं सत्यार्थप्रकाश आदि ग्रन्थों के लेखन द्वारा विलुप्त सत्यज्ञान को पुनः प्रकाशित किया जिससे देश पुनः उन्नति की ओर अग्रसर हुआ। ऋषि दयानन्द ने अपने लक्ष्य की पूर्ति के लिए 10 अप्रैल, 1875 को मुम्बई में आर्यसमाज की स्थापना की थी। इसके माध्यम से आर्यसमाज के अनुयायियों ने वेदप्रचार सहित अविद्या नाश एवं समाजसुधार के उल्लेखनीय कार्य किये। आर्यसमाज के प्रचार से प्रभावित होकर दिल्ली के ऋषि-भक्त लाला दीपचन्द आर्य जी ने मानव-जाति की उन्नति तथा ऋ़षि के स्वप्नों को साकार करने के लिए वैदिक साहित्य के प्रकाशन एवं इसके प्रचार-प्रसारार्थ आर्ष साहित्य प्रचार ट्रस्ट की स्थापना की और उसके माध्यम से वैदिक धर्म की अविस्मरणीय सेवा की।

लाला दीपचन्द आर्य जी का जन्म हरियाणा राज्य के गुड़गांव जिले के धारुहेड़ा ग्राम में दिन बुधवार, माह भाद्रपद के कृष्ण पक्ष की द्वितीया तिथि विक्रमी सम्वत् 1976 (13-8-1919) को एक वैश्य परिवार में हुआ था। दिल्ली में साबुन उद्योग को आपने अपने व्यवसायिक कार्य के लिए चुना और इसमें आशातीत सफलता प्राप्त की। दिल्ली में आपने पं. रामचन्द्र देहलवी सहित अनेक विद्वानों के प्रवचन सुनकर आर्य सामाजिक साहित्य को पढ़ा और आर्यसमाज, नयाबांस, दिल्ली के सदस्य बन गये। एक बार आपने दिल्ली के खारीबावली क्षेत्र में एक पुस्तक विक्रेंता को सड़क पर रखकर सस्ते मूल्य पर ईसाई मत की पुस्तकों को बेचते देखा। बड़ी सुख्या में लोगों को उन पुस्तकों को खरीदते देख कर आपने यह निष्कर्ष निकाला कि यदि साहित्य सस्ता हो तो जनता उसे खरीदती व पढ़ती है। इस घटना से प्रेरित होकर आप आरम्भ में अन्य प्रकाशकों से महर्षि दयानन्द के प्रमुख ग्रन्थ सत्यार्थप्रकाश को बड़ी संख्या में खरीद कर उसे सस्ते मूल्य पर वितरित करने लगे। ऐसा करके आपकी सन्तुष्टि नहीं हुई। आपने सन् 1966 में अपनी स्वोपार्जित पूंजी से दिल्ली में ‘‘आर्ष साहित्य प्रचार ट्रस्ट” की स्थापना की। इस ट्रस्ट का उद्देश्य आर्ष साहित्य का अन्वेषण, रक्षा, सम्पादन, शुद्ध मुद्रण एवं प्रकाशन तथा लागत से भी कम मूल्य पर इसका पाठकों में वितरण करना था व अब भी है। इस दिशा में ट्रस्ट ने लाला दीपचन्द आर्य जी के जीवन काल में अपूर्व सफलता के साथ कार्य किया और एक इतिहास रचा।

ट्रस्ट के प्रकाशनों में सत्यार्थप्रकाश मुख्य ग्रन्थ है। इसके ट्रस्ट ने अनेक संस्करण प्रकाशित किये हैं। इस ग्रन्थ के अब तक 90 से अधिक संस्करण व लगभग 14 लाख से अधिक प्रतियां प्रकाशित हो चुकी हैं। यह प्रकाशन ऋषि दयानन्द के जीवनकाल में तैयार संशोधित सत्यार्थप्रकाश जो उनकी मृत्यु के कुछ महीनों बाद प्रकाशित हुआ था, उस द्वितीय संस्करण को प्रामाणिक मानकर किया गया। यह उल्लेखनीय है कि स्वामी दयानन्द की उत्तराधिकारिणी परोपकारिणी सभा अजमेर के द्वारा सत्यार्थप्रकाश के अब तक 39 संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं जिसमें बड़ी मात्रा में पाठान्तर हैं। लाला दीपचन्द आर्य जी ने पहले ‘सत्यार्थप्रकाश’ एवं ‘ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका’ के प्रथम संस्करणों की फोटो प्रतियों को ग्रन्थ रूप में प्रकाशित किया और उसके पश्चात उनसे मिलान कर आगामी संस्करण प्रकाशित किए। इस प्रकार स्वामी दयानन्द जी की पुस्तकों के पाठों के संरक्षण का अतीव महत्वपूर्ण कार्य लाला दीपचन्द आर्य जी वा उनके ट्रस्ट द्वारा किया गया। ट्रस्ट ने अन्य जो महत्वपूर्ण ग्रन्थ प्रकाशित किये उनमें ऋषि दयानन्द के लघु ग्रन्थों का संग्रह, यजुर्वेद भाष्य भास्कर, यजुर्वेद-भाष्य भाषानुवाद, ऋग्वेद भाष्य भास्कर के कुछ खण्ड, ऋषि दयानन्द के पं. लेखराम और पं. गोपाल राव हरि द्वारा लिखित जीवन चरित, पं. राजवीर शास्त्री द्वारा लिखित विशुद्ध मनुस्मृति, डा. सुरेन्द्र कुमार जी द्वारा सम्पादित मनुस्मृति जिसमें प्रक्षिप्त श्लोकों की विस्तृत समीक्षा भी है, वेदार्थ कल्पद्रुम, ऋषि दयानन्द के शास्त्रार्थों का संग्रह, दयानन्द वेदार्थ प्रकाश, उपनिषद-प्रकाश आदि अनेक ग्रन्थ सम्मिलित हैं।

ट्रस्ट की गतिविधियों का आर्य जनता को परिचय देने, वैदिक साहित्य पर शोधपूर्ण एवं सामयिक तथा पाठकोपयोगी प्रचारात्मक लेखों का प्रकाशन भी वेदों के प्रचार प्रसार में सहायक होता है। इस दिशा में ट्रस्ट ने सन्, 1972 में ‘दयानन्द सन्देश’ नाम से एक मासिक पत्रिका का प्रकाशन आरम्भ किया जो अद्यावधि जारी है। इस पत्रिका का आर्यजगत की सभी पत्र-पत्रिकाओं में गौरवपूर्ण स्थान है। यह पत्रिका आर्यजगत के लब्ध प्रतिष्ठित विद्वान पं. राजवीर शास्त्री के सम्पादन में प्रकाशित होती रही। शास्त्री जी की मृत्यु के पश्चात दयानन्द सन्देश मासिक का सम्पादन विख्यात विद्वान श्री धर्मपाल आर्य जी कर रहे हैं। समय-समय पर इस पत्रिका ने गवेषणा एवं शोध से पूर्ण विशेषांकों का प्रकाशन भी किया है। वेदार्थ समीक्षा, वैदिक मनोविज्ञान, जीवात्म-ज्योति, अद्वैतवाद एवं त्रैतवाद, काल अकाल मृत्यु, आर्य मान्यतायें, युगपुरुष राम, योगेश्वर कृष्ण, योग मीमांसा आदि अनेक महत्वपूर्ण विशेषांक प्रकाशित किये गये जिनका आज भी महत्व है और भविष्य में भी रहेगा। दयानन्द सन्देश अन्य लेखों के साथ सरिता व लोकालोक पत्रिकाओं में वैदिक मान्यताओं के विरुद्ध प्रकाशित लेखों का भी युक्तियुक्त एवं प्रमाण पुरस्सर उत्तर वा खण्डन प्रकाशित करती रही है।

ट्रस्ट ने अनुसंधान के क्षेत्र में अनेक कार्य किए हैं। ऋषि दयानन्द के यजुर्वेद एवं ऋग्वेद भाष्य पर आर्यजगत के दो प्रसिद्ध विद्वानों पं. सुदर्शन देव आचार्य एवं पं. राजवीर शास्त्री से भास्कर नाम से विस्तृत टीकायें प्रकाशित की जिन्हें ट्रस्ट की ओर से भव्य साज-सज्जा के साथ प्रकाशित किया गया। यजुर्वेद का कार्य तो पूरा हो गया परन्तु किन्हीं कारणों से ऋग्वेद पर आरम्भ किया गया कार्य ग्रन्थ के दो या तीन भाग प्रकाशित होने के बाद आगे नहीं बढ़ सका। यदि लाला दीपचन्द आर्य जी की 28 दिसम्बर, 1981 को आक्समिक मृत्यु न हुई होती तो सम्भवतः यह कार्य आगे भी जारी रहता। इनके अतिरिक्त ट्रस्ट ने पं. राजवीर शास्त्री जी के सम्पादन में विशुद्ध मनुस्मृति का एक अत्यन्त महत्वपूर्ण संस्करण भी प्रकाशित कराया। इस संस्करण से लाला जी व ग्रन्थ के सम्पादक पं. राजवीर शास्त्री दोनों अमर हो गये। इसके नये संस्करण की हम आवश्यकता अनुभव करते हैं जिसमें इसी सामग्री का प्रकाशन हो। यह संस्करण साधारण पाठकों के लिए अति उपयोगी है। इसकी प्रति हमारे पास है जिसका हमने वर्षों पहले आद्योपान्त अध्ययन किया और उसे अत्यन्त उपयोगी पाया। ट्रस्ट ने मनुस्मृति का एक विस्तृत वृहद संस्करण भी डा. सुरेन्द्र कुमार जी के सम्पादन में प्रकाशित किया है। इस संस्करण में प्रक्षिप्त श्लोकों को भी सम्मिलित किया गया है और उनके प्रक्षिप्त होने पर प्रमाण प्रस्तुत किये हैं।

वैदिक साहित्य के प्रचार हेतु लाला दीपचन्द आर्य जी ने एक वाहन भी खरीदा था और इसके लिए एक प्रचारक और ड्राइवर नियुक्त कर उन्हें देश के अनेक भागों में प्रचारार्थ भेजा था। इससे महर्षि दयानन्द के ग्रन्थों का अपूर्व प्रचार हुआ। यह वाहन उनके जीवनकाल में एक बार जब देहरादून आया तो हमने उसे देखा था। उसमें साहित्य भरा होता था। क्या गांव क्या शहर, इस वाहन से सर्वत्र सत्यार्थप्रकाश का बड़ी मात्रा में प्रचार हुआ। काशी में शास्त्रार्थ शताब्दी के अवसर पर आपने काशी के विद्वानों का स्वामी दयानन्द की मान्यताओं के विरुद्ध आक्षेपों का युक्तियुक्त समाधान किया जिससे लाला दीपचन्द आर्य जी के गहन स्वाध्याय एवं वैदुष्य का लोगों को ज्ञान हुआ था। इस शास्त्रार्थ में आपने ‘भोगसाधनमिन्द्रयम्’ के आधार पर वेदों से मूर्तिपूजा सिद्ध करने पर बड़ी आर्थिक राशि पुरस्कार के रुप में देने की घोषणा की थी। दिल्ली में पौराणिक विद्वान पं. सुरेन्द्र शर्मा एवं आर्य विद्वान् पं. वेदव्रत मीमांसक के बीच सृष्टि संवत् विषय पर सम्पन्न हुए शास्त्रार्थ के आप संयोजक थे।

लाला दीपचन्द आर्य जी में अनेक विशेषतायें थीं। उन्होंने कभी कहीं किसी विद्वान को अपने सम्मान अथवा प्रशंसा में कुछ कहने का अवसर नहीं दिया। यदि कभी किसी विद्वान ने कुछ कहा अथवा किसी ने लेख में उनके नाम का उल्लेख किया तब भी आपने अपनी पत्रिका दयानन्द सन्देश में उसे छपने नहीं दिया। यही कारण है कि आर्यजगत के दो शीर्ष विद्वान पं. राजवीर शास्त्री और पं. सुदर्शन देव आचार्य आपके साथ जुड़े रहे। आपकी सफलता का एक प्रमुख कारण इन दोनों विद्वानों का आपको सहयोग करना रहा। सत्यार्थप्रकाश के प्रचार में आपकी रुचि का एक प्रेरक उदाहरण तब मिला जब दिल्ली के निकट के किसी स्थान के एक व्यक्ति द्वारा दूरभाष पर पूछताछ की गई। आप ने उस व्यक्ति से उसका पता पूछा और सत्यार्थप्रकाश की उस व्यक्ति की आवश्यकता से अधिक प्रतियां अपनी गाड़ी में डालकर कुछ ही समय में उसके निवास पर जा पहुंचें। ऐसा करते हुए आपने अपने व्यवसाय की किंचित चिन्ता नहीं की और काफी देर तक उससे बातें करते रहे। इन पंक्तियों के लेखक को भी 48 वर्ष पूर्व जून, 1976 में आपने सत्यार्थप्रकाश पढ़ने की प्रेरणा करते हुए अनेक सुझाव दिए थे। 28 दिसम्बर, सन् 1981 की रात्रि को नौ बजे दिल्ली में आप दिवंगत हुए। आपकी मृत्यु आर्यजगत की अपूरणीय क्षति थी। आर्यसमाज आपकी सेवाओं सहित ट्रस्ट से मिलने वाले अनुसंधानपूर्ण नवीन वैदिक साहित्य से वंचित हो गया।

लाला दीपचन्द आर्य जी की मृत्यु पर पं. राजवीर शास्त्री ने अपनी श्रद्धांजली में उन्हें महात्मा दीपचन्द आर्य के नाम से स्मरण किया। वेद विज्ञानाचार्य प. वीरसेन वेदश्रमी के अनुसार लाला जी आर्ष ग्रन्थों के दीवाने थे। डा. भवानीलाल भारतीय लाला जी ने लाला दीपचन्द आर्य जी की विनयशीलता, अतिथि सत्कार, गुण-ग्राहकता एवं विद्वानों के सम्मान को आदर्श एवं अनुकरणीय बताया है। जयपुर के डा. सत्यदेव आर्य ने लाला जी को अत्यन्त सरल, सौम्य एवं स्नेहिल स्वभाव वाला पुण्यात्मा एवं वैदिक सिद्धान्तों में अटूट आस्था रखने वाला सच्चा आर्य कहा है। संस्कृत के प्रकाण्ड विद्वान पं. युधिष्ठिर मीमांसक जी ने उनको श्रद्धांजलि देते हुए लिखा कि लाला दीपचन्द आर्य जी ने अपनी चंचला लक्ष्मी को श्री एवं यशस्वी रुप में बदलने का जो सत्कार्य किया है उससे वह भी उन्हें सदा अमर रखेगी। आर्य विद्वान प्रा. राजेन्द्र जिज्ञासु जी ने आर्ष साहित्य प्रचार ट्रस्ट को लाला दीपचन्द आर्य जी की आर्यसमाज को सबसे बड़ी देन कहा और ट्रस्ट को ही लाला जी का स्मारक बताया। हम लाला दीपचन्द आर्य जी को आर्यसमाज के महाधन पुण्यात्माओं से बनी माला का एक मूल्यवान मोती समझते हैं। हम ऋषि दयानन्दभक्त, आर्ष साहित्य के अनन्य प्रेमी एवं प्रचारक महात्मा दीपचन्द आर्य जी को अपनी श्रद्धांजली अर्पित करते हैं। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

Comment:Cancel reply

Exit mobile version
Kuponbet Giriş
betgaranti giriş
Teknik Seo
ikimisli giriş
grandpashabet giriş
bonus veren siteler
grandpashabet giriş
betnano giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet
grandpashabet giriş
betlike giriş
betlike giriş
ikimisli giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betnano giriş